
इस युग को कृष्ण की जरुरत है
इस युग को कण की जरत है। अहकार पक गया है। सकप पगाढ हआ है। मनुय के हाथ में बडी ऊजा है। यह ऊजा नक को ले जाएगी। यह ऊजा पवी को हिरोशिमा आर नागासाकी में बदल देगी। अगर जदी ही इस ऊजा का पातरण न हआ, अगर यह ऊजा सकप से हटकर समपण की तरफ न बही, तो यह रेगितान में खो जाएगी।
कणचेतना के नाम से आज कितने ही आदोलन चल रहे है, लेकिन कणचेतना का अथ न तो छापातिलक ही है आर न भजनसकीतन ही। वह वविक चेतना है अतिव के साथ तदाकार की थिति आर अतिव जिसका नाम है वह सवगाही, सवागी है एकागी नहीं। वहा राग आर विराग, जय आर पराजय, जम आर मयु, योग आर भोग, भातिकता आर आयामिकता सभी का समवय है।
कण ही वह चेतना है जहा बासुरी आर पा#ाजय, मोरपख आर राजदड, परिगह आर अपरिगह सभी एकाकार हो गए है। वहा पगपग पर समवय के साथ विरोध भी ह। इसलिए कणचेतना को समगत गहण करना अथवा उसके साथ एकाकार हो जाना अयत दुकर ह। श्रीमगवीता पर जब मेंने देश के विभि थानों पर वचन दिए तब एक मि ने मुझसे न पूछा कि,‘ गीता में कण का जोर समपण, भ, श्रा पर ह,लेकिन आज की विव थिति में लोग बुकेिति आर सकपकेति ह। इस थिति में गीता का माग किस कार माजू बठता है ?
जवाब में मने कहा कि,‘ इसलिए ही माजू बठता ह। लोग जब अतिबुकेिदित होते है, तब बु एक घाव की तरह हो जाती है। बु का उपयोग तो उचित ह, लेकिन बु के ारा सचालित होना उचित नहीं ह। बु उपकरण रहे तो उपयोगी ह, बु मालिक बन जाए, घातक है। चूकि युग बु केति ह, बु एक घाव बन गइ ह। उससे न तो जीवन में आनद फलित होता ह, न शाति का आविभाव होता ह, न जीवन में पसाद बरसता है। जीवन केवल चिंताआें से भर जाता ह। विचार आर विचारों की विक्षि तरगें य को घेर लेती ह। बु अगर मालिक हो जाए, तो विक्षिता ताकिक परिणाम ह। बु अगर सेवक हो तो अनूठी ह। उसके ही सहारे तो सय की खोज होती ह। फक यही यान रखना कि बु तुहारी मालिक न हो, मालिक हइ कि बु उपाधि हो गइ। इसलिए कण का उपयोग ह। उनकी समपण की आषधि बन सकती है।
यह युग बु का युग ह आर सकप का, सकप यानी अहकार का। इसलिए म कहता ह कि अगर पचिम धम की तरफ मुडा, जसा कि मुड रहा ह तो पूरब को मात कर देगा, योंकि ऊजा उसके पास ह। अभी उसने बडे भवन बनाने में लगाइ ह ऊजा, तो सा आर डेढ सामजिल के मकान खडे कर दिए ह। अभी उसने चादतारों पर पहचने में ऊजा लगाइ ह, तो चादतारों पर पहच गया है। अगर कल उसके जीवन में काति आइ। आएगी ही ! योंकि चादतारे त नहीं कर रहे ह।
डेढ सा मजिल के मकान भी कहीं नहीं पहचाते, अधर में लटका देते ह। विराट धनसपदा पदा हइ है। ऊजा है, सकप ह, बल है। अगर ये बलशाली लोग कल धम की तरफ लगेंगे, तो इनके मदिर तुहारे मदिरों जसे दीनहीन न होंगे। ये अगर चाद पर पहचने के लिए जीवन को दाव पर लगा देते ह, तो समाधि में पहचने के लिए भी जीवन को दाव पर लगा देंगे। ये तुम जसे काहिल सि न होंगे, सुत सि न होंगे। इस बात को मरण रखो कि जिसके पास बडा सकप ह, उसी के पास बडा समपण होगा, जिसके पास पका हआ अहकार ह, वही तो चरणों में झुकने की क्षमता पाता ह। इसलिए म नही कहता कि तुम अहकार को काटो, गलाओ। म कहता ह, उसे पकाओ,खर करो, तेजवी करो, तुहारा अहकार जलती हइ एक लपट बन जाए, तभी तुम समपण कर सकोगे। जब सकप ने ही बता दिया कि यही माग ह, जब अहकार ने ही पककर कह दिया कि अब फल को गिरना चाहिए, पक गया, पक गया, अब कोइ का नहीं है, तब गिरा।
इसलिए कहता ह, इस युग को कण की जरत है। अहकार पक गया है। सकप गाढ हआ है। मनुय के हाथ में बडी ऊजा है। यह ऊजा नक को ले जाएगी। यह ऊजा पवी को हिरोशिमा आर नागासाकी में बदल देगी। अगर जदी ही इस ऊजा का पातरण न हआ, अगर यह ऊजा सकप से हटकर समपण की तरफ न बही, तो यह रेगितान में खो जाएगी। मथल में खो जाएगी। इसके साथ आदमी भी खो जाएगा। एक महाअ होगी, महाविफोट होगा, मनुय की ाढता पकी है आर कण के सदेश की ऐसे क्षण में जरत है।
