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कभी योगी तो कभी छलिया

Swatantra Vaartha  Wed, 1 Sep 2010, IST

कभी योगी तो कभी छलिया

कहया, कण, पीताबर, देवकी नदन, वासुदेव,यशोदानदन, जो मर्जी कहिये पर कण सिफ कण है। सारी दुनिया के लिये एक कभी भी खम न होने वाला आकषण। ऐसा आकषण, जो हर पल हर प में पूरापूरा सुख देता ह। कण कभी कमयोगी लगते है तो कभी छलिया, कभी उनमेें भगवान के दशन होते ह तो कभी वे एक साधारण से मानव नजर आने लगते ह। कण को समझने में बडेबडे तपवी लाेिक दर्शी, ज्ञानी जहा ‘नतिनति’ करने को मजबूर हो जाते है वहीं अनपढ आर गवार समझे जाने वाले वाले, गोपिया उहें पा जाते है। यदि सच कहा जाए तो कण कभी भी समझ में न आने वाले ऐसे तव ह जिहें समझने के लिये सारे पोथी, पुतक, गथ अपया रह जाते है, आर ेम के ढाइ अक्षर से वे वश में हो जाते है।

जगत में चराचर के वामी , दुनिया को कम, अकम का पाठ पढाने वालेे, गोपियों से लेकर ज्ञानियों तक सबको ममुध आर अपने वश में कर लेने वाले, तीनों लोकों में एकछ राय करने वाले, दुाें के भय आर भों के बल,कण का नाम मरण मा से ही जम मरण के बधन से मु कर देता है। कण सचमुच कण ह, आर सारी दुनिया को अपने आकषण में ऐसा बाधते ह कि बधन में बधने वाला वय ही उनके बाधे बधन में बधा रहना चाहता है।

कण मानव के प में भी उतना ही लुभाते ह जितना कि इवर के प में। उनका एक एक काय मन में घर कर जाता ह। उनका यशोदा को रिझाना, गोपियों को तडपाना, सुदामा की मदद करना, विदुर के घर दुर्योधन के पकवान ठुकराकर साग रोटी खाना, अजुन आर दुर्योधन दोनों को ही सतु करते हये कूटनीतिक तरीके से एक तरफ खुद को, तो दूसरी तरफ अपनी सेना को दे देना कण का दोनों हाथों में लू रखने की रणनीति को दशाता है। कण यु में साम, दाम, दड, भेद सबको ही अपने यि पाडवों की जीत के लिये आजमाते है। वहा वे न उचित देखते है आर न अनुचित, बस एक ही लय साधते ह, जीत का लय। आर अततोगवा उसमें सफल भी होते ह। सच कहा जाये तो कण सफलता का ही दूसरा नाम है।

कण पदा होते ही लीला करने का दूसरा नाम ह। उहें आते देख रा प में बहने वाली यमुना वयमेव ही उतर जाती ह तो इसमें कोइ न कोइ बात तो जर ह। कण देवकी की आठवीं सतान के प में जम लेते ह तो यह भी एक पूव निधारित योजना ही होती ह योंकि यदि वे ऐसा नहीं करते तो श्रापगत उन सात वतुआें का या होता जो न जाने कब से उनके जम लेने का इतजार कर रहे थे, आर यदि वे पहली ही सतान के प में पदा होकर आनन फानन में कस का वध कर देते तो सारी दुनिया उस सुदर ललाम लीला सेे वचित ही रह जाती जिसे सुनकर आज इस मयुलोक के चराचर मोक्ष धाम के भागी बन जम मरण के बधन से मु हो श्रीभगवान के चरणों मेें जगह पा जाते है।

कण जिस तरह का आचरण करते ह उसे देखकर शायद ही उहें कोइ भगवान का दजा दे पाये, पर फिर भी मजेदार बात ये ह कि कण आज भी अपने भों के बीच भगवान का दजा पाये हये ह आर उहें इस दर्जे से शायद ही कभी कोइ हटा पाये । कण अपने जम से ही दिय लगते ह।

कस के तमाम यासों के बावजूद वे न केवल कस की पकड से बाहर हो जाते ह। बकि उसके ही घर में जाकर उसके ही राय में उसका वध कर डालते ह। कण मा के प में आइ पूतना का दूध पीकर उसे मा का समान देते ह तो उसकी दुवा के लिये उसका वध करने में भी देर नहीं लगाते। कण जहा ऋषि मुनियों अपने रहय को जानने में छकाते, तडपाते ह, वहीं निरक्षर आर भोलेभाले गोकुलवासियों को, वजवासियों को वालों को बिना किसी तप के ही अपने दशन देकर उहें धाम बुला लेतेे है।

कण बधन भी ह आर मु भी। वे बाधते भी है आर बधते भी है। कण जहा अपने भों को अपने आकषण में बाधते ह, वहा वे उहें माया मोह के बधन से मु भी करते ह, कण ही अपने चाहने वालों को जम आर मयु के झझटों से मु दिलाने वाले परम भु है। वे हर कदम पर अपने चाहने वालों का पूरापूरा याल रखते ह। कण जहा कइ बार लीला करते, तडपाते सताते लगते ह वहीं उचित अवसर पर वे बिना देर किये अपने भ की रक्षा के लिये कभी सुदशन चक लेकर, तो कभी मान भग होने से बचाने के लिये अपनी उगली पर बरसो पहले बाधी गइ पी का चीर लिये सदव तपर, सदव हाजिर मिलते ह यानि कण अपने भों का मानभग तो कतइ ही नहीं होने देते है।

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