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योगेशवर कृष्ण की ऐतिहासिकता

Swatantra Vaartha  Wed, 1 Sep 2010, IST

योगेशवर कृष्ण की ऐतिहासिकता

या गीता को हमारे देश में अधिकारिक प से राीय गथ घोषित किया जा सकता है ? हम गीता यों पढे ? या योगीराज श्रीकण का हमारी सकति में इतना महवपूण थान ह कि उनका आदश हम सबके लिए अनुकरणीय है? या वतमान समय में उनके जीवन की वााि, वीरता, कूटनीति, योगी उावल, निमल एव ेरणादायक पक्ष को उपेक्षित करना उचित होगा । या कण हमारे इतिहास के अभि अग है अथवा मा आथा के तीक या कापनिक आर आलकारिक चरि या किवदति के हिसे रहे है ? इस तरह के सशय को बढावा देना भी एक ऐतिहासिक युगपुष की अवमानना आर अपने इतिहास को दूषित करने की वा कही जा सकती है। आज की नइ खोजों व सायों के परेिय में या यह माना जाए कि कुक्षे का यु ३०६७ इपूहआ था, जब कण की आयु ५५ वष थी ? अथवा यह तिथि मा अनुमानित ह, कालकमों के अनुकूल व तयामक नहीं ? या ५ वीं सदी इपू के महान गणितज्ञ आयभटट के अनुसार महाभारत यु की तिथि लगभग ३१०० वष इपू थी ? डा पीवी वतक ने योतिष तथा खगोल शाीय अनुसधान के आधार पर महाभारत यु का ारभ १६ अूबर ५५६१ इपू में हआ माना था। इस तरह के नों के उार आज निचित प से विज्ञान, खगोल शा की अनेक शाखाआें एव नक्षों की गति एव थिति के वज्ञानिक अययन ारा दिए जा रहे है। इस ऐतिहासिकता आर वचारिक यापकता के आधार पर ही कुछ दिनों पहले कदाचित इलाहाबाद उ यायालय के एक वरि यायाधीश ने गीता को एक राीय गथ की मायता देने की अनुशसा की थी। इसी तरह हाल ही में इलड में आणविक आषधि के क्षे में कायरत डाटर मनीष पडित ने अपने शोध के आधार पर कहा है कि कण किसी दतकथा के नायक नहीं थे, बकि उनका अतिव अभिलेखित किया जा सकता ह आर इस विषय पर एक वाचि भी बनाया है, जिसका शीषक है ‘कण इतिहास अथवा मिथक।’ पुराताविक, भाषायी आर खगोल शाीय सायों के आधार पर उहोंने अपने निकषा] को वज्ञानिक प में तुत करते हए अय वािनों के अययनों का भी सहारा लिया, जिनमें ाेसीवीव, ाे आटे आर श्री कोटा वेंकटाचलम मुख ह।मजे की बात यह ह कि ऐसे शिलालेख भी मिले है, जिनमें ापर के अत, कलियुग के ारभ, सधि काल आर तकालीन राजवशों के कालकमों का भी उेख ह। इनमें चालुय समाट पुलकेशिन के ऐहोल थित मदिर का शिलालेख, देवसेना का हिसे बोराला शिलालेख आर यहा तक कि सि गीक राजदूत मेगथनीय का वह शिलालेख भी समिलित ह, जिसमें कहा गया ह कि कण एव चगु माय के बीच १३८ पीढिया बीत चुकी थी। इस तरह गीक याी लीनी के अनुसार बकस आर सिकदर के बीच के अतराल मे १४५ पीढिया बीत चुकी थी। यह बकस वही ‘बकासुर’ था, जिसे भीमसेन ने मारा था आर यह काल लगभग ६७७१ इपू वष का आता ह। डा वतक के अनुसार इस कार महाभारत का समय ५००० इपू से ६००० इपू तक का आता है।

जहा तक योतिष शा के अनुसार वज्ञानिक प से तिथि निणय का न ह, सि वािन जीएससपत आयगर एव जीएस शेषगिरी कण जम की तिथि २७ जुलाइ ३११२ इपू मानते ह, जिसकी वितत गणना उनके शेष पों में अकित ह। डा मनीष पडित ने हाल ही में अपने एक वय में वय २००४ एव २००५ में डा नरहरि आचाय नामक मेफिस विववािलय, टेनेसी के भातिकी के यायाता के शोध पर हषमिश्रित विमय कट किया ह। खगोल शाीय अययन के आधार पर उहोंने महाभारत यु की सही कालगणना का दावा किया ह। इस शोध को आगे बढाते हए वय डा पडित ने अपने ‘लेनेटेरियम साटवेयर’ पर इसे सयापित किया। वे वय कहते ह कि उनके मत में आज जो कुछ भी ाचीन भारतीय इतिहास के बारे में वािथियों को पढाया जा रहा ह, वह सरासर झूठ ह। उनका यह भी कहना ह कि ाचीन भारत में लोग कालकमों के बारे में लापरवाह थे, यह भी पूण प से असय ह।

प ह कि मासवादी इतिहास लेखन तयों पर नहीं, राजनीति के तहत निधारित होना ह। उदाहरण के लिए वामपथी इतिहासकार रोमिला थापर का कहना कि भारतीयों में इतिहास बोध नहीं था, वे दतकथाआें को ऐतिहासिक जामा पहनाने में सिहत थे, वह पूरा का पूरा कालखड जिसे ‘हिदू युग’ कहा जाता ह, महवहीन था। पुणे में जमे डा मनीष पडित मानते ह कि महाभारत का यु ३०६७ इपूमें हआ था आर उनकी गणना के अनुसार कण का जम ३११२ इपू में हआ था तथा कुक्षे के उस यु के समय वे ५४५५ वष के रहे होंगे। डा मनीष पडित श्रीराम की ऐतिहासिकता व ेतायुग के कालावधि पर भी वितत शोध कर रहे ह आर उस पर भी एक वाचि बना सकते है।

वे मानते है कि वय महाभारत के मूल पाठ में गहनक्षों की गति व थिति के १४० सदभ आए ह आर जो सभी गणना करने पर एक दूसरे के सदभ में खरे उतरते है। यहा तक चाहे अमावया हो या सूय अथवा च गहण या पुछल तारे का उेख अथवा उनकी गणना के घटनाकमों से जुडना हो, वह सब खरा उतरता है। इसलिए कण की ऐतिहासिकता पर सदेह करना अपने समग अतीत को ही नकारना होगा। इसीलिए परवर्ती लेखकों, कवियों एव भों की कणलीला की अपेक्षा महाभारत में वणित कण के निमल चरि को अधिकतर वािन गा मानते है।

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