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श्री क्रुश्नावातर का उद्देश

Swatantra Vaartha  Wed, 1 Sep 2010, IST

श्री क्रुश्नावातर का उद्देश

सपूण पवी दुाें एव पतितों के भार से पीडित थी। उस भार को न करने के लिए भगवान विणु ने एक मुख अवतार गहण किया जो कणावतार के नाम से सपूण ससार में सि हआ। उस समय धम, यज्ञ, दया पर राक्षसों एव दानवों ारा आघात पहचाया जा रहा था।

पवी पापियों के बोझ से पूणत दब चुकी थी। समत देवताआें ारा बारबार भगवान विणु की ाथना की जा रही थी। विणु ही ऐसे देवता थे, जो समय समय पर विभि अवतारों को गहण कर पवी के भार को दूर करने में सक्षम थे योंकि येक युग में भगवान विणु ने ही महवपूण अवतार गहण कर दु राक्षसों का सहार किया वववत मवतर के अटठाइसवें ापर में भगवान विणु के अवतार श्रीकण अवतरित हए।

भगवान ने देखा कि सपूण विव शूयमय ह। कहीं कोइ जीवजतु नहीं ह। जल का भी कहीं पता नहीं ह। सपूण आकाश वायु से रहित आर अधकार से आवा हो घोर तीत हो रहा ह। वक्ष , पवत आर समु आदि शूय होने के कारण विकताकार जान पडता ह। मूति, धातु, शय तथा तण का सवथा अभाव हो गया ह। इस कार जगत को शूय अवथा में देख अपने दय में सभी बातों की आलोचना करके दूसरे किसी सहायक से रहित एकमा वेछामय भु ने वेछा से ही इस स की रचना ारभ की।

सवथम उन परम पुष श्रीकण के दक्षिण पाव से जगत के कारण प तीन मूतिमान गुण कट हए। उन गुणों से महव अहकार पाच तमााए प, रस, गध, पश आर शद ये पाच कमश कट हए। इसके उपरात ही श्रीकण से साक्षात भगवान नारायण का ादुभाव हआ। जिनकी अगकाति याम थी, वे निय तण पीताबरधारी आर विभि वनमालाआें से विभूषित थे। उनकी चार भुजाए थी, उन भुजाआें में कमश शख, चक, गदा आर प विराजमान थे। उनके मुखारविंद पर मदमद मुकान की छटा छा रही थी। वे रनमय आभूषणों से विभूषित थे। शागधनुष धारण किए हए थे।

कातुभमणि उनके वक्षथल की शोभा बढा रही थी। श्रीवसभूषित वक्ष में साक्षात लमी का निवास था। वे श्रीनिधि अपूव शोभा को तुत कर रहे थे। शरतकाल की पूणिमा के चमा की भा से सेवित मुखच के कारण वे मनोहर जान पडते थे। कामदेव की काति से यु पलावूय उनके सादय आर भी बढा रहा था। नारायण श्रीकण के समक्ष खडे होकर दोनों हाथों को जोडकर उनकी तुति करने लगे।

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