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कल्याण के तीन सुगम मार्ग

Swatantra Vaartha  Wed, 8 Sep 2010, IST

कल्याण के तीन सुगम मार्ग

श्रीमदभवीता में कण अजुन से कहते है‘अपना कयाण चाहने वाले मनुयों के लिये मने तीन योग बताये हज्ञानयोग, कर्मयोग आर भक्तियोग। इन तीनों के सिवाय दूसरा कोइ कयाण का माग नहीं है।’

ज्ञानयोग का माग:मनुुय मा को ‘म है’ इस प में अपनी एक साा का अनुभव होता ह। इस साा में अहम (‘म’) मिला हआ होने से ही ‘ह’ के प में अपनी एकदेशीय साा अनुभव में आती है। यदि अहम न रहे तो ‘है’ के प में सवदेशीय साा ही अनुभव में आयेगी। वह सवदेशीय साा ही मनुय का वातविक वप है । उस साा में अहम (जडता) नहीं है। जब मनुय अहम को वीकार करता है, तब वह बध जाता है आर जब साा (‘है’) को वीकार करता है, तब वह मु हो जाता है।

ससार का वप हकिया आर पदाथ। किया आर पदाथदोनों ही आदिअतवाले (अनिय) ह। येक किया का आरभ आर अत होता है। येक पदाथ की उपा आर विनाश होता है। मा जड वतु मिली ह आर तिक्षण बिछुड रही है। जो मिली है आर बिछुड जायेगी, उसका उपयोग केवल ससार की सेवा में ही हो सकता है। अपने लिये उसका कोइ उपयोग नहीं है। कारण कि मिली हइ आर बिछुडने वाली वतु अपनी नहीं होतीयह साित ह। जो वतु अपनी नहीं होती, वह अपने लिये भी नहीं होती। अपनी वतु वह होती ह, जिस पर हमारा पूरा अधिकार हो आर अपने लिये वतु वह होती ह, जिसको पाने के बाद फिर कुछ भी पाना शेष नहीं रहे।

मिली हइ आर बिछुडने वाली वतु को अपनी आर अपने लिये न मानने से मनुय निमम हो जाता ह। निमम होते ही उसके ारा मिली हइ वतुआें का सदुपयोग सुगमता से होने लगता ह। कारण कि निमम हए बिना ा वतुआें का सदुपयोग नही हो सकता। ममता वाले मनुय के ारा ा वतुआें का दुपयोग ही होता ह। भोग आर सगह करना ही ा वतुआें का दुपयोग ह आर उनको दूसरों की सेवा में लगाना ही उनका सदुपयोग ह। ा वतुआें के दुपयोग से समाज में सघष पदा होता ह आर सदुपयोग से समाज में शाति की थापना होती है।

निमम होना येक साधक के लिये बहत आवयक है, योंकि ममता को मिटाये बिना साधक की उति नहीं हो सकती। इतना ही नहीं, जिसमें ममता की जाती ह, वह वतु भी अशु हो जाती ह आर उसकी उति में भी बाधा लग जाती ह। ममता से मनुय में अनेक दोषों की उपा होती है। निमम मनुय का शरीरनिवाह बहत बढिया रीति से होता ह। निमम मनुय के ारा ही परिवार, समाज आदि की वातविक सेवा होती ह। जिसकी अपने शरीर में ममता है, वह परिवार की सेवा नहीं कर सकता। जिसकी अपने परिवार में ममता ह, वह समाज की सेवा नहीं कर सकता। जिसकी अपने समाज मे ममता है, वह देश की सेवा नहीं कर सकता। तापय ह कि ममता के कारण मनुय का भाव सकुचित एकदेशीय हो जाता ह। वह सेवा से विमुख होकर वाथ मे बध जाता ह। इसलिये साधकमा के लिये ममता का याग करना अयत आवयक ह। जब साधक से दय से ससार से विमुख होकर परमामा की ओर चलना चाहता ह, तब सपूण ससार तथा वय परमामा भी उसकी सहायता करने के लिये तपर हो जाते ह। इसलिये साधक को कभी भी अपने उेय की पूति से निराश नहीं होना चाहिये। वह कमसेकम आयु में तथा कमसेकम सामय में भी अपने उेय की पूति कर सकता ह। कारण कि अपने उेय की पूति के लिये ही भगवान ने अपनी अहतुकी कपा से उसको मानव शरीर दिया ह।

येक साधक के लिये निकाम होना बहुत आवयक है, योंकि निकाम हए बिना साधक अपने कतय का पालन नहीं कर सकता। इतना ही नहीं, कामना के कारण वह सायप भगवान को भी कामनापूति का साधन बना लेता है। तापय है कि वह कोइ भी कामना रखकर भगवान का भजन करता ह तो उसका साय तो वह काय पदाथ होता ह आर भगवान उसकी ा के साधन होते ह। जब तक कामना रहती है, तब तक मनुय पराधीन रहता है। पराधीन मनुय न तो याग कर सकता ह, न सेवा कर सकता ह आर न ेम ही कर सकता ह। वह न तो ज्ञानयोगी बन सकता है, न कमयोगी बन सकता है आर न भयाेिगी ही बन सकता ह। अत पराधीनता को मिटाने के लिये निकाम होना बहत आवयक है।

कामना की पूति में तो सब मनुय पराधीन ह, पर कामना का याग करने में सबकेसब मनुय वाधीन आर समथ ह। येक मनुय वाधीनतापूवक वाधीनता (मु) की ा कर सकता ह। परतु जब तक मनुय के भीतर कामना रहती ह, तब तक वह वाधीन नहीं हो सकता। पराधीनता का सवथा नाश निकाम होने पर ही सभव ह। निकाम होने पर साधक ससार पर विजय ा कर लेता ह।

जप, तप, वत, तीथ, वायाय आदि कियासाय साधनों से कामना का नाश नहीं होता। कारण कि कोइ भी किया (अयास) करने के लिये शरीर की सहायता लेनी पडती ह आर शरीर के सबध से ही कामनाआें की उपा होती ह। अत कामना का नाश किसी किया से नहीं होता, युत सवथा कियारहित होने से तथा विवेक को महव देने से होता ह। कियारहित होते ही शरीर से सबध विछेद होकर वप में थिति वत होती ह। वप में निममता आर निकामता व सि ह। अत शरीर ससार केे सबध से होने वाले ममता, कामना आदि दोषों का करने के लिये किया आर पदाथ से सबधविछेद करना आवयक ह।

जब साधक निमम आर निकाम हो जाता ह, तब उसकी अहता मिट जाती ह। अहता मिटने पर फिर उसके लिये कुछ भी करना शेष नहीं रहता।

जब तक साधक में अपने लिये कुछ भी करने का भाव रहता ह, तब तक उसका सबध कमसामगी के साथ अथात शरीरइयाि मन बु के साथ बना रहता है। जब तक शरीर के साथ सबध रहता ह, तब तक मनुय में न तो निवाथभाव आता ह आर न वाधीनता आती ह अथात वह न तो कमयोग का अधिकारी होता है, न ज्ञानयोग का। जो मनुय वाथभाव आर पराधीनता से रहित नहीं हो सका, वह भगवान का ेमी भी कसे हो सकता ह? इसलिये ‘किया’ के आश्रय का याग करने विश्राम (कुछ न करने) को अपनाना आर ‘पदाथ’ के आश्रम का याग करके वाश्रम अथवा भगवदाश्रय को अपनाना येक साधक के लिये बहत आवयक है।

विवेक की जागति किसी किया से नहीं होती, युत कियारहित होने से होती ह। विवेक को महव देने से विवेक ही तवज्ञान में परिणत हो जाता है। तापय है कि तवज्ञान किसी किया या पदाथ के ारा नहीं होता, युत अपने ही ारा होता ह। जिसकी ा अपने ारा होती ह, उसके लिये किसी अयास की आवयकता नहीं होती। अयास से तो उलटे वह दूर होता ह! मनुय जिन कारणों (मनबुइयाेिं) से ससार को देखता ह, उनसे अपनेआपको (करणरहित साामा वप को) नहीं देख सकता। अपने आपको तो वह अपने आप से ही देख सकता ह। तापय ह कि अपने आपको किसी कारण के ारा नहीं देखा जा सकता, युत करणों से याग से ही देखा जा सकता ह।

कमयोग का माग :जब साधक अपने जीवन में से बुराइ का याग कर देता ह, तब कमयोग की सि हो जाती ह। बुराइ का याग तीन बातों से होता ह(१) किसी का भी बुरा न करना(२) किसी को भी बुरा न समझना आर (३) किसी का भी बुरा न चाहना। बुराइ का याग किये बिना मनुय कतय परायण नहीं हो सकता।

मनुय किसी का भी बुरा तब करता है, जब वह वाथवश खुद बुरा बनता ह। खुद को बुरा बनाये बिना मनुय किसी का भी बुरा नहीं कर सकता। कारण कि जसा कता होता है, वसे ही कम होते हयह साित है। कम काा के अधीन होते ह। इसलिये सबसे पहले मनुय को चाहिये कि वह अपने को साधक वीकार करे। जब कता साधक होगा तो फिर उसके ारा साधक के विपरीत कम कसे होंगे? साधक के ारा किसी का बुरा नहीं होता। इतना ही नहीं , वह अपने ति बुराइ करने वाले का भी बुरा नहीं करता, युत उस पर दया करता ह। बुराइ के बदले बुराइ करने से तो बुराइ की व ही होगी, बुराइ की निवा कसे होगी? बुराइ के बदले बुराइ न करने से तथा भलाइ करने से ही बुराइ की निवा हो सकती है।

कोइ भी मनुय सवथा बुरा नहीं होता आर सभी के लिये बुरा नहीं होता। मनुय सवथा भला तो हो सकता है, पर सवथा बुुरा नहीं हो सकता। कारण कि बुराइ कमि , आगतुक, अवाभाविक है। बुराइ की वत साा नहीं है। इसलिये बुराइ को न दुहराने से बुराइ सवथा मिट जाती है। बुराइ को न दुहराना साधक का खास काम ह।बुराइ को न दुहराने से मनुय बुरा नही रहता, युत भला हो जाता है।

मनुय को किसी को भी बुरा समझने का अधिकार नहीं ह। दूसरे में जो बुराइ दीखती ह, वह उसके वप में नहीं ह, युत आगतुक ह। मनुय के वभाव में यह दोष रहता ह कि वह अपने ति याय करे आर दूूसरेेे के ति क्षमा करें। भगवान का अश होने के नाते मनुुयमा वप से निर्दोष ह। इसलिये किसी भी मनुय में बुराइ की थापना नहीं करनी चाहिये। आगतुक बुराइ के आधार पर किसी को बुरा समझना अनुचित है। दूसरा चाहे बुरा हो या न हो, पर उसको बुरा समझने से अपने में बुराइ आ ही जायेगी। दूसरे को बुरा समझेंगे तो अपने भीतर बुरे सकप पदा होंगे, कोध पदा होगा, वरभाव पदा होगा, विषमता पेदा होगी, पक्षपात पदा होगा। इनके पदा होने से कम भी अशु होने लगेंगे। अत बुराइ की थापना न तो अपने में करनी चाहिये आर न दूसरों में ही करनी चाहिये। बुराइ की थापना करने से न अपना हित होता ह, न दूसरे का। किसी को बुरा समझना अथवा किसी का बुरा चाहना बुराइ करने से भी बडा दोष ह।

मनुय किसी का बुरा चाहता ह तो उसका बुरा तो होता नहीं, पर अपना बुरा अवय हो जाता ह। कम की अपेक्षा भाव सूम आर यापक होता ह। अत दूसरे का बुरा चाहने में अपना ही बुरा निहित ह। इसलिये साधक को किसी का भी बुरा चाहने का, बुरा समझने का अथवा बुरा करने का अधिकार नहीं ह। उसको समानप से सबके हित का भाव रखते हए सबकी सेवा करने का ही अधिकार ह। सेवा करने से ही वह कमयोग का अधिकारी होता ह।

भलाइ करना तो परिश्रमसाय है, पर बुराइ न करने में कोइ परिश्रम नहीं होता तथा कोइ खचा भी नहीं होता। इसलिये बुराइ का याग करने में सब वत तथा समथ है।

कमयोगी अपने कतय का पालन करते हए दूसरे के अधिकार की रक्षा करता ह। जो दूसरे का अधिकार होता है, वही हमारा कतय होता ह। अपना अधिकार चाहने वाला मनुय अपने कतय का पालन नहीं कर सकता। इसलिये कमयोग का साधक अपने अधिकार का याग करता है। अपनेे अधिकार का याग करने से नया राग पदा नहीं होता आर दूसरे के अधिकारों की रक्षा करने से पुराना राग मिट जाता ह आर साधक सुगमतापूवक रागरहित हो जाता है। (जारी)

वामी रामसुखदासजी महाराज


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