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कर्मो का सर्वथा अभाव ही जीव की मुक्ति है

Swatantra Vaartha  Wed, 8 Sep 2010, IST

कर्मो का सर्वथा अभाव ही जीव की मुक्ति है

कम तीन कार के होते है‘सचित’,‘प्रारब्ध ’ और ‘कियमाण’। अयत ाचीन काल से लेकर अब तक के जो कम सगहीत है, उनका नाम ‘सचित’ है। वे अनत है आर उनमें नयेनये कम जाजाकर एक होते रहते ह। इन सचित कमा] में से कुछ कम फल दान कराने के लिये पथक कर लिये जाते है आर किसी एक जीवन में उनका निचित फलभोग ारभ हो जाता है। इन फल देने में वा कमा] का नाम ‘ारध’ है। एव हम जो नवीन कम कर रहे है, उनका नाम ‘कियमाण’ है। ये तुरत सचित में चले जाते है। मनुय जो कुछ भी अछेबुरेकम करता है, वे सचित में चले जाते है। इन नये कमा] में कुछ कम ऐसे भी बल हो सकते है, जो सचित से तुरत ारध बनकर फल भुगता देते है। कइ बार यह भी होता है कि वतमान कम किसी पुराने ारध का फल भुगताने में निमाि बन जाता ह आर यह वतमान कम सचित में ही रह जाता है।

अछेबुरे कमा] का फल तीन तरह से भोगा जाता ह(१) तुरत ारध बनकर इसी जीवन में अनुकूल या तिकूल भोग के प में (यह भी सभव है कि पूरे कम का तुरत ारध न बने,आशिक ही बने आर शेष कम सचित में रह जाय), (२) वग आर नरक लोकों में सुखदुख भोगप में एव (३) अछी बुरी योनियों में सुखदुख भोगप में। वगनरक लोक भी सय है। सभी शााें में इनका वणन है। सवमाय गीता में प कहा गया है

ते पुूयमासा सुरेलोक

मश्रति दियादिवि देवभोगान।।

ते त भुवा वगलोक विशाल

क्षीणे पुूये मयलोक विशति।

‘वे अपने पुूयों के फलप इलोक को ा होकर वग में दिय देवताआें के भोग भोगते है।’ आर ‘वे उस विशाल वगलोक को भोगकर पुूय क्षीण होने पर पुन मयुलोक में चले आते ह।’

नरकेऽनियत वासो भवतीयनुशुश्रुम।।

‘उनको अनियत काल तक नरक में निवास करना पडता है, यह हमने सुना है।’

सा कामभोगेषु पतति नरकेऽशुचा।।

‘वे विषयभोगों में अयत आस लोग अपवि नरकों में गिरते ह।’

पुराणों में नरकों के वणन तथा नरकयणा भोगने वाले ाणियों के बहत स आये है, जो सय है।

इसी कार अछी बुरी योनियों में भी कमफलभोग होता है। पुूय कम करने वालों को अछी योनि मिलती है, पापकम करने वालों को बुरी योनि। इसका वणन पप से छादोयोपनिषद में यों आया ह

‘त इह रमणीयचरणा अयाशो ह यो रमणीया योनिमापेरन बाणयोनिं वा क्षयियोनिं वा वययोनि वाथ य इह कपूयरणा अयाशो ह यो कपूया योनिमापेरवयोनिं वा सूकरयोनिं वा चडालयोनि वा।’

अथात ‘उन जीवों में जो अछे आचरण वाले होते है, वे शीघ ही श्रे योनि को ा होते ह आर जो बुरे आचरणवाले होते ह, वे तकाल अशुभ योनि को ा होते ह। वे कुाे की योनि, सूकरयोनि या चडालयोनि काेे ा करते है।

भगवान ने गीता में भी कहा है

तानह षित कूराससारेषु नराधमान।

क्षिपायजमशुभानासुरीवेव योनिषु ।।

अथात ‘उन ेष करने वाले पापाचारी निदय नीच मनुयों को म ससार में बारबार आसुरी (सूकरकुकरादि) योनियों में ही गिराता हू।’

आसुुरी योनिमापा मूढा जमनि जमनि।

अथात वे मूढ जमजम में आसुरी योनि को ा होते है।

ाय पुूयकता लोकानुषिवा शावती समा।

शुचीना श्रीमता गेहे योगभोऽभिजाते।।

अथात वह योगभ पुष पुूयवानों के (वगादि) उाम लोगों को ा होकर आर बहत काल तक वहा निवास करके फिर पवि श्रीमानों के घर जम लेता है।

अथवा योगिनामेव कुले भवति धीमताम।।

अथात अथवा बुमािन योगियों के कुुल में जम लेता है।

इससे वगनरकादि लोकों में तथा उामनिक योनियों में सुखदुख का भोग होना सि है।

मनुययोनि उाम हैह आर पशुु आदि योनिया निक। परतु उाम योनि में भी बुरे कम के फलवप जीव दुख ा कर सकता है जसे सवथा रोगी तथा नितात दरि मनुय, आर निक योनि में भी अछे कम के फलवप सुख को पा कर सकता ह जसे राजघराने का घोडा, से गोपूजन की गाय, शाकीन बाबुआें के ारा पाला हआ कुाा आदि।

उपयु तीनों कमा] ने ‘ारध’ (जो कम फल देने में वा हो गये है) का भोग तो अवय ही भोगना पडता है, परतु से भाव से भगवान का मडलविधान मान लेने पर या ज्ञान के ारा भोव बु मिट जाने पर सुखदुख नहीं होते। ‘सचित’ का नाश ‘ज्ञाना’, भ’ से आर ‘निकाम कम’’ से ही हो सकता है आर ‘कियमाण’ का अभाव भी ज्ञान के ारा कतवबु न रहने पर, केवल भगवीयथ भगवान की पूजा के प में कम करने पर अथवा कमो में सकामभाव न रहने पर हो सकता ह। कर्मो का सवथा अभाव ही जीव की मु है।


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