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इशवरोपासना की तरफ मोडें अपने जीवन की संध्या बेला

Swatantra Vaartha  Wed, 8 Sep 2010, IST

इशवरोपासना की तरफ मोडें अपने जीवन की संध्या बेला

मगतणा की थिति देखेंमदेश रेगितान। जेठ की तपती दोपहरी, ऊपर से सूय की अविषा, नीचे भडभूजे के भाड की बालुका की तिताि करती अपार बालुका राशि । न कहीं वक्ष की छाया, न कहीं जल का लेश। बडी उणता, भयकर ताप, तीव पिपासाहरिणों का यासा झुड दाडता जा रहा है। ाणों की श परों में आ गयी है, पूरी श से छलाग लगाते हए मग दाड रहे हएक आशा आर एक विवास के साथ कि आगे समु की अपार जलराशि लहरा रही है, वहा पहचने भर की देर है, ताप शात हो जायेगा, यास बुझ जायेगी। आमा त आर ठडी हो जायेगी सपूण काया। एक नहीं अनेक झुड मगों के है आर वे दाडते ही जा रहे है , सिफ दाडते ही जा रहे ह।

येक यूथ अपने आगे के झुड को देखता है आर सोचता है कि त हो जायगे , सुुखी हो जायगे । यह दाड, यह गति, यह तिۧताि, यह ताप , वाला उाराेार भीषण होती जा रही है। येक अपने आगे के झुड को देखते हए बडी तपरता, शीघता आर पूरी श से दाड रहा है। लेकिन जलवह तो आगे आर आगे ही दीखता ह। लहराती किरणों मे दीखता जल (काश आर बालुका से सयु ) आगे ही आगे भाग रहा है, योंकि वहा जल है ही नहीं तो मिलेगा कसे? कसे यास बुझेगी, कसे शीतलता त आर शाति ा होगी ? वहा ह तडपन, मूछा आर मयु, जो दाड समा कर थककर गिरने पर येक मग को ा होती है।

ासदी यह ह कि मग ह पशु आर ससार के भोगों में आस मानव भी पशु ही है , जिसे उसकी तणा भटका रही हसुखशाति के लिये। ीसुख, धनसुख, जनसुख, मानताि के सुख,वासना के सुख के लिये दाड रहा ह मानवमग यासा, थका हारा, अशात आर लात। मगमरीचिका की भाति भोगों का समु मानव के समुख लहरा रहा है । मभूमि की बालुका तो शायद रात में कुछ ठडी भी हो जाती ह, लेकिन भोगों की वाला अहनिश धधक रही है। एक मनुय दूसरे को देखकर सोचता है कि वे सुखी है, सप है, सम आर सपाशाली आर हमें भी वहा पहचना ह, तभी हम सुखी होंगे। मतलब येक मगमानव अपने से आगे देखता है, वहा तक पहचने का महवाकाक्षा पूण यास करता है।

सब असतु ह, अधिकाधिक भोग सामगी ा करने में यासरत हबढी ह तणा , बढी ह यास, अशाति आर सघष , बढा ह ۧफद, बढी ह चोरी, बेइमानी, शतानी अपने साथ दुखों का पहाड लेकर न जिसका आदि ह आर न अत। भोग का सेवन बढाता ह रोग, सघष , भय, कलह आर अशाति , ेष, कटुता, हिंसा, वर आर छीनाझपटी, योंकि जहा सुख ह ही नहीं , वहा मिलेगा कसे ? वहा तो निराशा, दुख, अशाति, अवसाद, चिंताए ही मिलती ह। मगतणा के पीछे दाडते मग मूछित होते ह, गिरते ह तडपते ह आर मरते ह, लेकिन ससार के भोगों में आस मगमानव जीवनभर अशाति, दुख, निराशा भोगने के बाद मयु का गास बनता ह। वह भी हजारोंहजार बार दाण मयु की यातना को भोगते हए मरता है, योंकि भोग ा करता ह पाप से आर पाप का परिणाम ह बारबार जम आर मयु।

य को मोह ह अपनी सम, सपा आर सबधों परअपनी सतानों से सुखसम पा की याशापी मगमरीचिका रातदिन उसे अभिभूत किये रहती ह, जबकि विडबना यह ह कि सपूण जीवन भर, तनमनधन से समपित अपनी ही सतानें बुढापें में य को एकाकी, निराश्रित आर असहाय बना देती ह, योंकि पु अपने कायथल, देशविदेश में नाकरी , यवसाय के सबध में मातापिता से दूर चला जाता ह आर फिर वहीं बस जाता है। पुयाि अपनी ससुराल में रहती ह आर व मातापिता अपने घर पर ही रहते ह एकाकी आर बेसहारा। यदि पतिपनी दोनों में से किसी एक की मात हो जाती है, जो होनी ही है, तब फिर वही य अकेला हो जाता ह।

वातव में धनसचय, परिवार का पालनपोषण, मकान,दूकान, राय, श आर सपा के यागने की आवयकता नहीं ह। आवयकता ह यागभावना की आर ा सुखसुविधाआें को यागभावना से ही गहण करने की वा से, जिससे मानसिक सुख शाति आर वचारिक समरसता को बनाये रखा जा सकता ह। इस सबध में हमें भरत के चिकूटथान का सग मरण करना चाहिये। जहा राम से मिलने के लिये जाने के पूव भरत राय की यवथा को गभीरता से लेते हए विचार करते ह कि सपाराय आदि सब राम का है। वे वामी है, म सेवक है। मेरा धम वामी की सपा की सुरक्षा आर देखभाल है, ऐसा न करने का परिणाम मेरे लिये भला नहीं होगा। अतएव मुझे यन पूवक इसकी सयक यवथा आर साजसभाल करनी चाहिये। काश ! ऐसा हमलोग भी सोच पाते।

अपने को कता आर मालिक न मानकर मा देखरेख करने वाला ही मानना चाहिए , जिससे पक्षपात नहीं होगा, कतयों का सयक पालन होगा आर आवयकतानुसार सब कर्मो का उचित निवहन करना सभव होगा। यागयु भोगभावना य को ही नहीं समाज को भी उपकत करती है, जबकि मोह य ही नहीं समाज को भी सकटगत बनाता है। देखें कारागार में बदी कदी ा व आर बतनों को अपना मानते हए उनकी सुरक्षा करते हए उसे साफसुथरा रखता है आर जब कारागार से मु होता ह, तब वह अपनी कोठरी, कबल, बतन से मोह रखते हए भी उससे लिपटकर रोता नहीं ह, योंकि वातव मे उसने कभी से अथा] में इहें अपना समझा ही नहीं था। यह ह याग से भोग करने का अभािय।

हमें यह शावत वज्ञानिक साित नहीं भूलना चाहिए कि कोइ भी पदाथ पहले उप होता ह, तब युवा होता ह आर फिर बूूढा होने लगता है, उसकी श न होने लगती है आर अत में उसकी समा हो जाती है।(समा)

श्री कहयासिंहजी विसेन


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