
द्वन्द से मुक्त हो जाओ
किसी ने ओशो से पूछा कि पिछले चार वषा] से म यान कर रहा है । यान में कइ बार ऐसे क्षण आते ह जब म वय को परम आनद की थिति में पाता ह आर महसूस होता है कि सय इसके अतिरि आर कुछ भी नहीं। लेकिन फिर जीवन की बहत सी घटनाए उदास आर दुखी भी कर जाती है । इसका या कारण है ?
जवाब में ओशो ने कहा कि शिखर जब तक है , तब तक घाटिया भी होंगी। शिखर की आकाक्षा जब तक ह, तब तक घाटियों का विषाद भी झेलना होगा। सुख जब आया तो उसकी छाया की तरह दुख भी भीतर आ गया।
हम सुख के नाम तो बदल लेते ह, लेकिन सुख से हमारी मु नहीं हो पाती। आर जो सुख से मु नहीं , वह दुख से मु नहीं होगा। आवक की पूरी उपदेशना एक ही बात की ह ۧ से मु हो जाओ। जो नि۩ हआ , वही पहचा। जिस शिखर को तुम सोचते हो पहच गये, वह पहचने की भाति ह। योंकि पहचने का कोइ शिखर नहीं होता। पहचना तो बडी समभूमि है । न ऊचाइ है वहा, न नीचाइ है वहा। पहचना तो ऐसे ही है जसे तराजू तुल गया। दोनों पलडे ठीक समतुल हो गये।
बीच का काटा ठहर गया। या जसे घडी का पेंडुलम बाए गया दाए गया, तो चलता रहेगा। लेकिन बीच में क गया, न बाए, न दाए, ठीक मय में, तो घडी क गयी।
जहा न सुख ह, न दुख, दोनों के बीच में ठहर गये, वही छुटकारा है , वहीं मु है । अयथा मननयेनये खेल रच लेता ह। धन पाना, यान पाना, ससार में सफलता पानी, कि धम में सफलता पानी। लेकिन जब तक सफलता का मन ह आर जब तक सुख की खोज ह तब तक तुम दुख पाते ही रहोगे। योंकि हर दिन में रात समिलित ह। आर फूलों के साथ काटे उग आते है । फूल काटों से अलग नहीं आर रात दिन से अलग नहीं।
छोडना हो तो दोनों छोडना। एक को तुम न छोड पाओगे। एक को हम सब छोडने की कोशिश कर रहे है । हमारी सब की चो यही ह कि रात समा हो जाए, दिन ही दिन हो। ऐसा नहीं होगा। ससार ۧ से बना ह। हा, अगर तुम ۧ के बाहर सरक जाओ, अतिकमण हो जाए, तुम दोनों के साक्षी हो जाओ। अब समझो फक।
जब तुम शिखर पर होते हो, कुछ शाति मिलती ह, कुछ आनद मिलता, कुछ पुलक समाती, कुछ उसव होता भीतर, तब तुम उस उसव के साथ तादाय कर लेते हो। तब तुम सोचते हो, म उसव। तब तुम सोचते हो, म आनद। बस वहीं चूक हो गयी। साक्षी बने रहो। होने दो शिखर, उठने दो शिखर, गारीशकर बनने दो, उाुग ऊचाइ आ जाए, लेकिन तुम देखते रहो दूर खडे, जुड मत जाओ, यह मत कहो कि म आनद। इतना ही कहो, आनद को देख रहा ह, आनद हो रहा ह, म देखने वाला , म आनद नहीं। फिर थोडी देर में तुम पाओगे कि शिखर गया आर घाटी आयी। दिन गया, रात आयी। तब भी जानते रहो कि म विषाद नहीं। देखता ह विषाद ह, दुख है , पीडा ह, म दूर खडा ामा। सुख को भी देखो, दुख को भी देखो। जब तुम देखने वाले हो जाओगे तो कसा शिखर, कसी घाटी। फिर कसी विजय आर कसी हार !
