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महंगी चीनी के संकट पर एनसीपी का तर्क

Swatantra Vaartha  Tue, 9 Feb 2010, IST

महंगी चीनी के संकट पर एनसीपी का तर्क

राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के मुख पत्र ‘राष्ट्रवादी’ ने चीनी की महंगाई के सवाल पर केंद्रीय खाद्य एवं कृषि मंत्री तथा अपने पार्टी अध्यक्ष शरद पवार का बचाव करते हुए देश के नागरिकों को सलाह दी कि वे चीनी न खाएं। उसने यह भी कहा कि चीनी को आवश्यक उपभोग वस्तुआें की सूची में भी डालने की जरूरत नहीं है, क्योंकि चीनी ऐसी कोई चीज तो नहीं है कि जिसका खाना जीने के लिए जरूरी हो। चीनी न खाने से कोई मर तो नहीं जाएगा।

एनसीपी की यह बात तो बिल्कुल सही है। चीनी न खाने से कोई मर तो निश्चय ही नहीं जाएगा, बल्कि बहुत से लोग अधिक चीनी खाने से मर रहे हैं। लेकिन सभ्यता के विकासक्रम में आज का मनुष्य ऐसी बहुत सी चीजों को अपनी कमजोरी बना चुका है, जिनके बिना उसके जीवन को तो कोई खतरा नहीं है, लेकिन जिनके बिना उसका जीवन नीरस है। पवार साहब को क्रिकेट की तो इतनी चिंता है कि वह इसके लिए शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे से मिलने के लिए चले गये, लेकिन खाद्यान्नों की उपलब्धता व उनकी कीमतों की उन्हें कोई चिंता नहीं है। अभी प्रधानमंत्री ने खाद्य वस्तुआें की महंगाई के संदर्भ में मुख्यमंत्रियों की जो बैठक आयोजित की, उसमें हुई चर्चाआें और निष्कषा] की जानकारी देने के लिए जब उनसे प्रेस कांफ्रेंस करने को कहा गया, तो उन्होंने प्रेस का मुकाबला करने से इनकार कर दिया। वह प्रेस के तीखे प्रश्नों का सामना करने के लिए तैयार नहीं थे, अंतत: सरकार ने केवल प्रेस नोट जारी करके काम चलाया।

पवार साहब ने पहले चीनी की कीमतें ब़ढने की चेतावनी दी थी, फिर उन्होंने दूध के महंगे होने की चेतावनी दी। अच्छी बात है। सरकार का यह भी काम है कि वह अपने नागरिकों को पहले से सतर्क कर दे, लेकिन इसके साथ ही उसकी यह भी जिम्मेदारी है कि वह कीमतें ब़ढने या उपलब्धता कम होने के कारणों का पता लगाए तथा उसे दूर करने का प्रयत्न करे। आने वाले संकट का अनुमान लगाकर जो सरकार उससे निपटने का उपाय नहीं कर सकती, उसे शासन करने का कोई अधिकार नहीं। अभी खबर है एक तरफ तो उपभोक्ता चीनी की महंगाई का रोना रो रहे हैं, दूसरी तरफ चीनी मिल मालिक भारी मुनाफा कमाने में लगे हैं, जिसकी सुविधा सरकार ने ही उन्हें दी है। वर्ष २००६०७ से (जब चीनी के भाव १३२० से १५५० रुपये क्विंटल थे) लेवी चीनी (सार्वजनिक वितरण प्रणाली के अंतर्गत बिकने वाली) का जो स्टॉक नहीं उठाया गया, उसे मिल मालिकों को खुले बाजार में बेचने की अनुमति दे दी गयी। सरकार इस चीनी को स्वयं खरीदकर उपभोक्ताआें को सस्ते दर पर दिला सकती थी। लेकिन तब मिल मालिकों को करीब १५० कऱोड का मुनाफा न हो पाता।

‘राष्ट्रवादी’ की यह सलाह निश्चय ही हास्यास्पद है कि चीनी की महंगाई से बचना है तो लोग चीनी खाना छ़ोड दें। इससे उनके अध्यक्ष पवार साहब का बचाव नहीं हो सकता।प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह तो उन्हें कुछ नहीं कह सकते, क्योंकि उनकी पार्टी के समर्थन पर उनकी सरकार टिकी हुई है, लेकिन देश की आम जनता के वे सीधे निशाने पर हैं, जिसका असर उन्हें अगले चुनाव में देखने को मिलेगा।

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