दिखाओ भगत सिंह, बेचो सतालिन और माओ
आजकल दीलली के गति मदान में विव पुतक मेला लगा हआ है । इस मेले में देश आर विदेश के 1300 से अधिक काशकवितरक भाग ले रहे है। ति दो वष में लगने वाले इस मेले की ज्ञान पिपासु उसी आतुरता से तीक्षा करते है, जसे हर बारह वष में लगने वाले कुभ मेले की लाखोंलाख श्रालु तीक्षा करते है। इस मेले में ज्ञानविज्ञान, तकनालाजी आर सयता की निरतर याा के आलोक में हमें मानव जाति के अनुभव आर बाकि विवेचन में से निप साहिय सागर में अवगाहन करने का दुलभ अवसर पा होता है। पूरा दिन लगाकर भी मेले की ना दिन की अवधि अपया लगती है। म तीन बार जाकर भी बहत थोडे टालों को देख पाया। इस लेख में म इनमें से केवल तीन टालों की चचा कर पाऊगा। इन तीनों टालों पर केवल कयुनिट विचारधारा का साहिय उपलध है।
एक टाल को दीि के पीपुस पलिशिंग हाउस ने, जिस पर एबीबधन वाली भारतीय कयुनिट पार्टी का वामिव है, लगाया ह। दूसरा टाल राजथान पीपुस पलिशिंग हाउस ने अलग से लगाया है। आर तीसरा टाल लखनऊ की राहल फाउडेशन का है, जिस पर ‘जन चेतना’ अभियान का बडा बनर लगा हआ है। युवाआें को आकषित करने के लिए इस टाल ने खर कातिकारी तेवर अपनाया हआ ह। हाथ के बने पोटरों पर कातिकारी नारे लिखे है, कातिकारी गीतों की धुन बज रही है, अमर शहीद भगत सिंह टाल के बहिरग पर छाये हए ह। पर भीतर मास, एजिस, लेनिन, तालिन आर माओ का वही पुराना साहिय बिक रहा ह जिसे उनके अपने मातदेशों अथात स आर चीन ने अपने यहा से बहिकत कर दिया है। भगत सिंह मातभूमि की वतता के लिए शहादत का वय इछायोजना से वरण करने के कारण भारत की युवा पीढी के दयसमाट बन चुके है, उनका नाम आर चि येक युवा अत करण का झकत व पदित कर देता है।
इसलिए उहें सामने रखकर मास लेनिन, तालिन आर माओ के काल बा साहिय की बिकी करने में कान सी कातिकारिता है, यह म समझ नहीं पा रहा है। इनमें से किसी भी टाल पर ुचेव, गोबाचेव या याओ पिंग का साहिय नहीं था। एक गर वामपथी टाल पर हमें अण बनर्जी की शोधपूण पुतक मिली, जिसमें सोवियत सघ में इतिहास लेखन के राजनीतिक दुपयोग का तयामक विवरण उपलध है। वहा पर ऐसी कोइ पुतक नहीं दिखाइ दी जिसमें इस बात का विवेचन हो कि ७२ वष तक साा में रहने आर विवश का ओहदा अजित करने के बाद भी सोवियत स यों ढह गया, वहा लेनिन आर तालिन की छछाया में ारभ हआ मासवाद का योग यों असफल हो गया? यों अब स में लेनिन आर तालिन की तिमाए उपेक्षित आर तिरकत है?
इसी कार भारतीय कयुनिट पार्टी के पीपुस पलिशिंग हाउस के टाल पर सोवियत स ारा भेजे गये पुराने चार साहिय आर भारत में दसबीस वष पहले काशित साहिय के अलावा कोइ उेखनीय नयी पुतकें दिखायी नहीं दीं। मने विशेष प से पूछा कि या मासवाद की असफलता आर पतन की कारण मीमासा करने वाली कोइ पुतक ह? भारतीय कयुनिट पार्टी का विभाजन यों हआ? वह विभाजन अभी भी यों चल रहा है, जबकि दोनों कयुनिट पाटिया सीपीआइ आर सीपीएम पिछलेे ३३ साल से गठबधन करके चुनाव लड रही ह, सरकार चला रही है? यों भारतीय कयुनिट आदोलन अनेक छोटीछोटी पाटियों में बिखर गया ह आर उनमें से येक कयुनिट पार्टी अपने को ही सा मासवादी घोषित कर रही ह? यों स आर चीन ने मासवाद आर माओवाद से सबध विछेद कर लिया? या इस बात पर कोइ बहस चल रही ह कि यों चीन पचिम के पूजीवादी बाजारवाद को अपनाकर भी अपने पुराने नाम ‘पीपुस रिपलिक आफ चाइना’ आर ‘चीन की कयुनिट पार्टी’ से चिपका हआ ह? यों उसने कयुनिट लाल झडे को बनाए रखा ह? यों वहा अभिय वातय आर बहपार्टी राजनीतिक णाली को न अपनाकर पुरानी अधिनायकवादी णाली ही चल रही है? या भारत के मासवादी बाकाेिं ने इस न को उठाया ह? या उनके यहा कयुनिट आदोलन की विफलता की कोइ कारणमीमासा हो रही ह? या विज्ञान, तकनालाजी आर सयता की याा के आलोक में १६२ वष पूव लिखे गये ‘कयुनिट मेनीफेटो’ की ासगिकता आर वज्ञानिकता पर कोइ बहस चल रही ह? पर ऐसा लगता ह कि मासएजिस आर लेनिन को मासवादी बाकि उसी पकार दवी आर अतय मानते है जिस कार मुलिम बुजीिवी कुरान आर पगबर मुहमद को। जिस कार इलाम में कुरान आर मुहमद के बारे में कोइ न उठाना अक्षय अपराध माना जाता ह उसी पकार भारत के मासवादी बाकाेिं ने भी मासएजिस व लेनिन को शका व तक से परे मान लिया है।
आजकल वे दो वष से अमेरिका आर अय पचिमी देशों में आरभ हइ आथिक मदी को पूजीवाद के पतन आर मासवाद की विजय के प में देखने लगे ह। यदि पचिम १९३० के आथिक सकट की तरह इस बार के सकट को भी पार कर गया तो वे या कहेेंगे? वे भूल जाते ह कि पूजीवाद आर मासवाद के विकास के माडल भि नहीं ह, दोनों तकनालाजी आधारित उपभोगता धान विकास का माडल लेकर चल रहे ह। मासवाद का दावा था कि वह उपादन आर वितरण के साधनों का वामिव निजी हाथों से लेकर राय को साप देगा, राय सवहारा के अधिनायकवादी नियण में होगा, जिसके कारण पूजी का कुछ हाथों में एकीकरण न होकर पूरे समाज में वितरण होगा। इसके फलवप विषमता की जगह सामाजिकआथिक समतामूलक समाज का निमाण होगा। स आर चीन के पयोग यहा यों विफल हए, इसकी गहरी कारणमीमासा भारत के मासवादी बाकाेिं आर राजनेताआें से अपेक्षित ह, पर वे इस ओर पूरी तरह उदासीन या पलायनवादी है। एक टाल पर खडे एक विववािलयी ाेफेसर से जब मने पूछा कि चीन इस समय जिस राते पर जा रहा ह, उसे आप या कहेंगे, तो उहोंने तपाक से कहा कि इसे ‘मार्केट सोशलिम’ (बाजार समाजवाद) कहेंगे। मानो बाजार आर समाजवाद में कोइ अतविरोध ह ही नहीं।
शदों का यही खेल पबगाल में माकपानीत वामपथी सरकार खेल रही है। २००६ के विधानसभा चुनावों में केवल ०३२ तिशत अधिक वोट पाकर २९४ में से २३४ सीटें जीतने के बाद माकपाइ मुयमी बुदेव भाचाय ने १२ अल २००६ को सावजनिक मच से कहा, ‘हम यहा जो कर रहे ह वह पूजीवाद ह, समाजवाद नहीं। हम बात भले ही करें पर वतमान थिति में समाजवाद को लाना सभव नहीं ह। म यथाथवादी ह, कोइ मूख नहीं। ‘उहोंने आगे कहा, ‘म जानता ह कि मासवाद के अनुसार श्रम आर पूजी का विरोध मिटाया नहीं जा सकता पर इस समय हम विपक्ष में नहीं ह। हम पर शासन चलाने की जिमेदारी ह इसलिए हमारा दायिव ह कि हम बगाल में पूजीनिवेश के वाह को बनाये रखने के लिए उाेगपतियों के साथ सहयोग करें।
माकपाइ मुयमी के उपरो कथन से प ह कि ‘कयुनिट मेनीफेटो’ में पूजी आर श्रम के विरोध को थायी आर निबाध गति से सतत चलाने वाला मास का कथन उसे यथाथवाद से भटका हआ सि करता ह। दूसरे यह भी कि मासवाद की वग सघष की भाषा केवल विपक्ष के लिए ह, सााढ दल के लिए नहीं।
दो साल बाद १३ जनवरी २००८ को बुदेव ने अपने ‘मासवाद’ की पुनयाया करते हए कहा, ‘पूजी ही मेरा मी ह। मेरी एकमा चिंता पूजी जुटाना ह, वह चाहे जहा से आये टाटा, जिंदल, अमेरिका, चीन या जापान, कहीं से भी। अपनी बात को आर प करते हए उहोंने कहा, ‘समाजवाद बहत दूर की चीज है। हम जनता को यह झूठी दिलासा नहीं दे सकते कि हम समाजवाद लाएगे। आथिक गति केे लिए हमें पूजीवाद पर ही निभर करना होगा।’ (‘टेटसमन, १४ जनवरी २००८) यह वर बुदेव का यगित वर नहीं था। वे भारत के महानतम कयुनिट नेता योति बसु के एक साह पहले के वय को मा तिवनित कर रहे थे। टेटसमन (६जनवरी २००८) मे काशित योतिबसु का कथन था कि ‘पूजीपतियों की भी भूमिका है । हमें पूजी चाहिए, देशी भी आर विदेशी भी। आखिरकार हम पूजीवादी यवथा में काम कर रहे ह। समाजवाद सभव नहीं ह।’ (टेटसमन , ६ जनवरी २००८) (जारी)
