राम मंदिर मुद्दे पर गडकरी का प्रस्ताव
भाजपा के नये अध्यक्ष नितिन गडकरी ने पार्टी की राष्ट्रीय परिषद के सम्मेलन को संबोधित करते हुए राम मंदिर मुद्दे को फिर याद किया और कहा कि पार्टी इसे भूली नहीं है। राम मंदिर निर्माण का मुद्दा पार्टी की आत्मा है, उसे भूलने का सवाल ही नहीं उठता। लेकिन मंदिर का निर्माण कैसे हो, इसके लिए उन्होंने मुस्लिम समुदाय का आह्वान किया कि वे विवादित स्थल का अपना दावा छ़ोडकर उन्हें मंदिर निर्माण में सहयोग करें, तो वह बगल में मस्जिद बनाने में मुस्लिमों का सहयोग कर सकते हैं। यद्यपि यह कोई नया प्रस्ताव नहीं था, लेकिन भाजपा के शीर्ष मंच से उसके शिखर नेता द्वारा पहली बार इस तरह का प्रस्ताव रखा गया था। इसमें उनकी आधी बात तो लोगों को पसंद आयी, लेकिन आधी नहीं। मुस्लिम समुदाय विवादित स्थल पर अपना दावा छ़ोडकर उसे हिन्दुआें को सौंप दे, इस अपील पर तो कोई आपत्ति नहीं थी, किंतु बगल में मस्जिद बनवाने का उनका वायदा कुछ ऐसा था, जो सम्मेलन में उपस्थित अधिकांश प्रतिनिधियों के गले नहीं उतर रहा था। बिना इस मसले पर पार्टी के कोई आम सहमति हुए वह ऐसी बात कैसे कह सकते थे। इसलिए बाद में पार्टी के प्रवक्ता राजीव प्रताप रूडी ने स्पष्ट करने की कोशिश की कि पार्टी नेताआें व साधु संतों से विचारविमर्श के बाद ही मस्जिद निर्माण में सहयोग का कोई फैसला लिया जाएगा। शायद गडकरी ने अति उत्साह में कुछ नया प्रस्ताव करने की उतावली में मस्जिद निर्माण का प्रस्ताव भी कर दिया। शायद पार्टी का उदार चेहरा दिखाने के लिए भी उन्होंने इस तरह का प्रस्ताव किया हो।
यहां यह उल्लेखनीय है कि अभी इसके एक हफ्ते पहले ही विश्व हिन्दू परिषद के अध्यक्ष अशोक सिंघल ने कहा था कि भाजपा को अयोध्या में मंदिर निर्माण के मुद्दे से अलग ही रहना चाहिए। उसका इससे कोई लेनादेना नहीं है। मंदिर निर्माण का काम देश के साधुसंतों का है, इसलिए वे ही इसे देखेंगे। उन्होंने दुबारा भी इस बात को दोहराया कि भाजपा को फिर से मंदिर निर्माण के मसले में अपना हाथ नहीं डालना चाहिए। अशोक सिंघल शायद भाजपा के प्रति खीझवश ऐसी टिप्पणी कर रहे थे, लेकिन यह सही भी है कि भाजपा को अब राम मंदिर की बात नहीं करनी चाहिए। सत्ता में आने के बाद वह अच्छी तरह इस बात को प्रमाणित कर चुकी है कि मंदिर निर्माण का मुद्दा उसके लिए सत्ता की स़ीढी से अधिक और कुछ नहीं था। अब यदि वह मंदिर निर्माण का संकल्प दोहरा रही है, तो उसका एकमात्र लक्ष्य केवल अपने बिखर चले वोट बैंक को समेटना है। भाजपा के किसी भी नेता के मुंह से राम मंदिर निर्माण की बात अब हास्यास्पद लगती है और बहुधा जुगुप्सा पैदा करती है।
जहां तक मुस्लिम समुदाय की बात है, तो उसकी तरफ से गडकरी महोदय को तत्काल जवाब मिल गया है। देश के प्राय: सभी मुस्लिम संगठन तथा प्रमुख नेताआें ने एक स्वर में उनके प्रस्ताव को ठुकरा दिया है। उनकी तरफ से साफ कहा गया है कि बाबरी मस्जिद के सवाल पर कोई सौदा नहीं हो सकता। मामला न्यायालय के विचाराधीन है और मुस्लिम समुदाय उसके फैसले की ही प्रतिक्षा में है। कई मुस्लिम नेताआें ने कहा कि अदालत जो भी फैसला करेगी उसे हम मानने के लिए तैयार हैं, लेकिन क्या हिन्दू समुदाय भी ऐसी गारंटी दे सकता है। अब सच कहा जाए तो इसका ठीकठीक जवाब किसी हिन्दू संगठन के पास नहीं है। इसमें दो राय नहीं है कि इस मसले का शांतिपूर्ण समाधान इसी में है कि मुस्लिम समुदाय के लोग उदारता बरतें और रामजन्म भूमि स्थल हिन्दुआें को सौंप दें, लेकिन देश के वर्तमान राजनीतिक वातावरण में यह संभव नहीं है, इसलिए राजनीतिक या न्यायिक फैसला ही समस्या के समाधान का एकमात्र रास्ता है। किंतु यह फैसला भी समस्या का तभी अंत कर सकता है, यदि वह हिन्दुआें के पक्ष में हो, क्योंकि हिन्दू इसके साथ कभी कोई समझौता नहीं कर सकता। इसलिए यदि भाजपा इस स्थल को उसे दिला सकने की स्थिति में नहीं है, तो उसके लिए यही बेहतर है कि वह अशोक सिंघल की सलाह मान ले और इस मसले से अपना हाथ वापस खींच ले, क्योंकि अब यह दुबारा सत्ता की स़ीढी बनने वाला मुद्दा नहीं रह गया है।
ओबामा के साथ दलाई लामा की मुलाकात
चीन के भारी विरोध के बावजूद अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा ने तिब्बत के धार्मिक नेता दलाई लामा से १८ फरवरी को ह्वाइट हाउस में मुलाकात की। हां, चीन अधिक नाराज न हो, इसे ध्यान में रखते हुए उन्होंने यह मुलाकात अपने एक निजी कक्ष में की, राष्ट्रपति कार्यालय के मुख्य कक्ष ‘ओवल हाउस’ में नहीं। उन्होंने बाहर निकलकर प्रेस से कोई संयुक्त बातचीत भी नहीं की और कोई बयान भी नहीं दिया। दलाई लामा ने अवश्य राष्ट्रपति भवन से बाहर आने के बाद प्रेस से बात की। लेकिन चीन इससे संतुष्ट नहीं हुआ। बीजिंग में उसने अमेरिकी राजदूत जॉन हेट्समैन को विदेश विभाग में तलब करके इस मुलाकात का पुरजोर विरोध किया। चीन का साफ कहना है कि दलाई लामा के साथ यह मुलाकात चीन के आंतरिक मामलों में सीधा हस्तक्षेप है और इससे दोनों देशों के संबंधों को भारी नुकसान पहुंचेगा। चीनी उपविदेश मंत्री ने तीखे शब्दों में इसका विरोध करते हुए कहा कि अमेरिका ने इस मुलाकात द्वारा अपनी उस पूर्व नीति का भी उल्लंघन किया है, जिसके अंतर्गत उसने माना है कि तिब्बत चीन का अंग है तथा वह तिब्बत की आजादी का कभी समर्थन नहीं करेगा।
इधर राष्ट्रपति ओबामा ने भले ही इस मुलाकात को सरकारी मुलाकात का दर्जा न दिया हो, फिर भी उन्होंने दलाई लामा से मुलाकात की और साफ कहा कि वह तिब्बतियों के मानवाधिकार तथा उनकी धार्मिक आजादी का समर्थन करते हैं तथा वह चाहते हैं कि चीन की सरकार दलाई लामा के साथ सीधे बातचीत करे। ह्वाइट हाउस के प्रेस सचिव राबर्ट गिब्स ने ओबामा के साथ दलाई लामा की मुलाकात का ब्यौरा देते हुए बताया कि राष्ट्रपति ओबामा ने धार्मिक नेता दलाई लामा के अहिंसा मध्यमार्ग में विश्वास की प्रशंसा की तथा उनके अपने सांस्कृतिक रक्षा अभियान को पूरा समर्थन दिया।
ओबामा ने चीन के विरोध की परवाह न करके दलाई लामा से मुलाकात की, यह तो ठीक, लेकिन उन्होंने जिस तरह यह मुलाकात की अमेरिका जैसी महाशक्ति के अनुकूल नहीं था। यदि वह मानवाधिकार के सवालों पर भी चीन जैसे देश से इस तरह डरता रहेगा, तो किसी भी तरह वह दुनिया के सबसे शक्तिशाली लोकतंत्र की प्रतिष्ठा की रक्षा नहीं कर पाएगा।
