ADVERTISEMENT

आपका वोट

क्या राहुल गांधी भ्रष्टाचार खत्म करेंगे?

  • सही
  • गलत
  • पता नहीं
और भी

फोटो दीर्घा

Share

मंत्री ही बन रहे मनमोहन की मुसीबत

Swatantra Vaartha  Sat, 20 Feb 2010, IST

मंत्री ही बन रहे मनमोहन की मुसीबत

यूपीए सरकार के सुशासन देने के वायदे की पोल खुलती जा रही है। उनके मंत्रियों की कार्यशैली से सरकार की छवि की किरकिरी हो रही है। अपने ब़डबोलेपन के चलते मंत्री स्वयं प्रधानमंत्री को भी कठघरे में ख़डा करने से बाज नहीं आ रहे हैं। सरकार गठन के चंद महीनों में ही इस तरह की अराजक स्थिति का पैदा होना कोई शुभ लक्षण नहीं है। इसलिए प्रधानमंत्री के माथे पर बल प़डना स्वाभाविक है। उन्हें पता है कि यदि सरकार में बैठे लोगों की ऐसी ही कार्यनीति रही तो जनमानस में सरकार की अच्छी छवि बना पाना आसान नहीं होगा। तृणमूल कांग्रेस नेता ममता बनर्जी की कार्यशैली कांग्रेस को शुरू से ही पच नहीं रही है। राकांपा के वरिष्ठ नेता व कृषि मंत्री शरद पवार ने तो महंगाई के सवाल पर सरकार की विफलता के लिए प्रधानमंत्री तक को अपने साथ घसीट लिया है। आमजन के बीच तो वह मखौल बन गए हैं। विदेश राज्यमंत्री शशि थरूर भी अपने बयानों के चलते सुर्खियों में हैं, जिसके चलते विदेशमंत्री को उनके पर कतरने प़डे हैं। महिला एवं बाल कल्याण राज्य मंत्री कृष्णा तीरथ ने भी अपने गैरजिम्मेदार आचरण से सरकार की किरकिरी की है।

राज्यमंत्रियों ने अपने केंद्रीय मंत्रियों द्वारा काम न दिये जाने पर प्रधानमंत्री से गुहार लगाई है। जब नेताआेंमंत्रियों का ऐसा आचरण होने लगता है तो उनकी इसी कमजोरी का नौकरशाही भरपूर लाभ उठाती है, जिससे सरकार की स्थिति हास्यास्पद बनती है। १६ जुलाई २००९ को शर्म अल शेख में भारतपाकिस्तान के बीच हुआ विवादास्पद समझौता हो अथवा विदेश राज्यमंत्री शशि थरूर की पुस्तकों की खरीद का मामला, कई मौकों पर सरकार को सफाई की मुद्रा में आना प़डा। गनीमत है कि विपक्ष अभी बिखरा हुआ है, इसलिए सरकार पर हमले बहुत तेज नहीं हैं। सत्ता के गलियारों में सुश्री बनर्जी की तुनकमिजाजी की खूब चर्चाएं हैं। राजनीतिक पंडित मानते हैं कि उनका यह आचरण और अंदाज कोई नया नहीं है। फरवरी १९९७ में कांग्रेस की सांसद हाेेने के बावजूद उन्होंने तत्कालीन रेलमंत्री रामविलास पासवान पर संसद में अपनी काली शॉल उछाल कर और सदन का त्याग कर अपनी ही पार्टी को मुसीबत में डाल दिया था।

एनडीए सरकार में भी वह तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी के लिए सिरदर्द बनी रहीं। ऐसे में मनमोहन सरकार को घेरने के लिए वह जो भी कर रही हैं, वह चौंकाने वाला नहीं है। प्रधानमंत्री कार्यालय की पहल के बावजूद पूर्व रेल मंत्री लालू प्रसाद यादव के खिलाफ जारी श्वेतपत्र के कुछ हिस्सों को लेकर भी उन्होंने एक नये विवाद को जन्म दे दिया था। इतना ही नहीं, कुछ ही दिनों पहले कोलकाता में प्रधानमंत्री के कार्यक्रम में भाग न लेकर उन्होंने एक रैली कर डाली, जिसमें सरकार की नीतियों की आलोचना भी की। वित्तमंत्री प्रणब मुखर्जी से उनकी नाराजगी किसी से छिपी नहीं है। बताया जाता है कि उन्होंने प्रधानमंत्री तक से उनकी शिकायत की है। महंगाई को लेकर सरकार वैसे ही मुसीबत में है। पर कृषि मंत्री शरद पवार ने इस विफलता के लिए प्रधानमंत्री को भी जिम्मेदार ठहराकर नया बवंडर ख़डा कर दिया है। यद्यपि उन्होंने अगले दिन अपनी इस भूल को सुधारने का प्रयास जरूर किया पर वह पैबंद साबित हुआ।

शरद पवार के महाराष्ट्र की केन लॉबी से रिश्ते जाहिर हैं और इसके लिए वह किसान विरोधी रवैया प्रकारांतर से अपनाते रहे हैं। उन्हीं की पार्टी के वरिष्ठ नेता पीए संगमा भी प्रधानमंत्री को अपना निशाना बनाते रहे हैं। सोनिया के विदेशी मूल के मुद्दे को लेकर वह पहले से ही चर्चा में रहे हैं। विदेश राज्य मंत्री शशि थरूर भी अपनी कार्यशैली को लेकर आलोचनाआें के घेरे में हैं। आरोप है कि उनके द्वारा लिखी गई पुस्तकों की खरीद में विभाग का पैसा खर्च किया गया, जिसमें गांधी परिवार की भी थ़ोडी आलोचना की गयी है। उन पर हज कोटा के आवंटन में ग़डब़डी तथा मंत्री पद के रूतबे का कथित दुरूपयोग करने का भी आरोप है, जिसके चलते सरकार को बगलें झांकनी प़डी हैं। इतना ही नहीं, महिला एवं बाल कल्याण मंत्री कृष्णा तीरथ ने तो बालिका दिवस पर एक विज्ञापन में पाक के पूर्व एयर चीफ की तस्वीर छपवाकर सरकार की भद ही पिटवा दी। इस चूक को स्वीकार करने की जगह उन्होंने उसे छुपाने की कोशिश की, जिसके चलते प्रधानमंत्री कार्यालय को खेद जताना प़डा। यही नहीं, प्रधानमंत्री ने केंद्रीय मंत्रियों से राज्यमंत्रियों को कार्य दिये जाने का सुझाव दिया था, किंतु अब तक काम न मिलने से नाराज इन मंत्रियों ने अंततः प्रधानमंत्री से गुहार कर डाली। मामले की नजाकत भांपकर उन्होंने उसकी बातें धैर्यपूर्वक सुनीं तथा शीघ्र ही काम दिलाने का आश्वासन दिया। इस बैठक में राज्य मंत्रियों ने अपने ब़डे मंत्रियों के खिलाफ जमकर भ़डांस निकाली। ये कुछ बानगी है जो आने वाले कल की स्थिति की ओर इंगित करती है, जिसका लाभ नौकरशाही उठाने से नहीं चूकती और उनके गैर जिम्मेदाराना व्यवहार से सरकार की फजीहत होती है।

प्रधानमंत्री कार्यालय की पहल पर रेलवे की समस्याआें के लिए गठित उच्चाधिकार समिति की बैठक का न होना तथा विदेश विभाग द्वारा अपने ही विभागीय राज्यमंत्री की पुस्तक की खरीदारी को आप क्या कहेंगे ? यह ठीक है कि जनतंत्र में किसी दल के अंदर वैचारिक मतभेदों का होना कोई बुरी बात नहीं। खास कर जब सरकार कई दलों को मिलाकर बनी हो तो विभिन्न मुद्दों पर मतभेद होने स्वाभाविक हैं। इससे वैचारिक ह़ोड की जमीन पुख्ता होती है, लेकिन वैचारिक मतभेदों पर तीखे विचारविमर्श की जगह दलों के आपसी मंच होते हैं। ये मतभेद सरकार के जरिए प्रकट नहीं होने चाहिए। खासकर विदेशी मामलों में तो बिल्कुल नहीं।

माना यही जाता है कि कैबिनेट किसी नीति को पास करती है तो उस पर न्यूनतम साझा सहमति बना चुकी होती है। एक बार कैबिनेट से मंजूरी मिलने के बाद उस पर अलगअलग राय होना संगत प्रक्रिया नहीं है। यह बात तो दलों के आंतरिक अनुशासन को बनाए रखने के लिए भी आवश्यक है। यह दीगर बात है कि वामपंथी दलों को छ़ोडकर यह अन्य राष्ट्रीय दलों में कम ही दिखता है, लेकिन किसी सरकार के अंदर के अंतर्विरोध बहुत छिछले स्तर पर उजागर होने लगें तो स्थिति बेहद हास्यास्पद हो जाती है। इसे लेख में उल्लिखित मंत्रियों के आचरण और बयानों से संबंधित प्रसंग तो वैसे भी वैचारिक नहीं कहे जा सकते। वे बेहद हल्के, व्यक्तिवादी, निजी स्वाथा] से प्रेरित और लापरवाही के ही संकेतक हैं। यह सच है कि कांग्रेस अपनी जनछवि को लेकर काफी सचेत है।

हाल में ही यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर बजट में जनकल्याणकारी योजनाआें को शामिल करने की वकालत की है, जो आमजन के प्रति उनकी चिंता दर्शाती है। मनमोहन सिंह भी अपनी ईमानदार छवि के जरिये आमजन का विश्वास जीतने का कोई अवसर चूक नहीं रहे हैं। ऐेसे में इन मंत्रियों की रीतिनीति ‘चावल में कंक़ड’ प़डने जैसी ही है। प्रधानमंत्री को इस सच्चाई से दोचार होना प़डेगा, क्योंकि यदि इस पर अंकुश न लगाया गया तो सरकार की छीछालेदर ही होगी और जिस सुशासन के लिए उसे जनादेश मिला है, उस पर खरा उतर पाना उसके लिए कठिन होगा।

आपकी राय