ADVERTISEMENT

आपका वोट

क्या राहुल गांधी भ्रष्टाचार खत्म करेंगे?

  • सही
  • गलत
  • पता नहीं
और भी

फोटो दीर्घा

Share

महंगाई की मार, जिम्मेदार कौन ?

Swatantra Vaartha  Sat, 20 Feb 2010, IST

महंगाई की मार, जिम्मेदार कौन ?

आवश्यक वस्तुआें के विशेषकर खाद्य सामग्री के दामों में अविरल रूप से होती जाती बढोत्तरी ने आम मेहनतकश इंसानों की जिंदगी को बेहद दुश्वार बना कर रख दिया है। मनमोहन सिंह की सरकार तो अपनी जिम्मेदारी को राज्य सरकारों पर डाल कर एकदम ही निश्चित सी हो गई है। ग्लोबलाइजेशन के दौर में सबसे अधिक मुसीबत है उन गरीब मेहनतकशों की जो अपनी मजदूरी खुद तय नहीं कर सकते हैं। उनकी मजदूरी का कोई समुचित तालमेल निरंतर गति से बढती जाती महंगाई के साथ कदाचित हो नहीं पाता है। महंगाई का वास्तविक संबंध किसी तरह से उत्पादन की घनघोर कमी से कदाचित नहीं है, वरन्‌ उन तमाम बिचौलिए जमाखोरों और मुनाफाखोरों से है, जोकि कम दामों में उत्पादित खाद्य सामग्री को किसानों से खरीद लिया करते हैं और फिर अनाप शनाप दामों में बाजार में बेचा करते हैं। ऐसे तमाम जमाखोरों और मुनाफाखोरों पर सरकार अपना शिकंजा कसने में पूर्णतः नाकाम रही है। महंगाई पर मचे चौतरफा हाहाकार पर सरकार की केबिनेट बैठक करती है और देश के प्रधानमंत्री महोदय बयान जारी कर देते हैं और बहुत ही बेबसी के साथ कहते हैं कि बहुत जल्द महंगाई पर काबू कर लिया जाएगा !

भस्मासुर महंगाई के प्रश्न पर दरअसल केंद्रीय सरकार का रवैया बेहद बेहूदा साबित हुआ है। केंद्रीय सरकार के खाद्य मंत्री महोदय जिस तरह की गैर जिम्मेदाराना बयान बाजी करते रहते हैं, वह तो आग में घी डालने का काम अंजाम देती रही है। देश आजकल एक ऐसी अर्थव्यवस्था के दौर में है, जबकि अमीर और अधिक अमीर होता जा रहा है और गरीब पहले से भी अधिक गरीब होता जा रहा है। देश में आज एक अत्यंत ताकतवर कॉरपोरेट सैक्टर है जिसमें पचास से अधिक खरबपति विद्यमान हैं। लगभग पांच कऱोड लोगों का एक ताकतवर उच्च तबका मौजूद है। दूसरी ओर केंद्र सरकार की एक उच्च कमेटी खुद ही बयान करती है कि देश के सत्तर प्रतिशत लोग मात्र बीस रुपए रोज पर गुजर बसर करने के लिए मजबूर हैं। इन हालात में यह तो बखूबी समझा जा सकता है कि निरंतर बढती जाती महंगाई के कारण उन सभी लोगों की क्या दशा हो रही है, जोकि बेहद गरीब हैं ! महंगाई के प्रश्न पर सरकार की संवेदनहीनता ने तो हतप्रभ करके रख दिया है। आम आदमी के प्रति कोई प्रजातांत्रिक सरकार कितनी उदासीन हो सकती है, वास्तव में यह तथ्य बेहद तल्ख और भयावह है। खाद्य सामग्री में महंगाई और मिलावट तो जैसे भारत की विकृत तकदीर बन चुकी है और इस बिग़डी हुई तकदीर से जंग करना बेहद आवश्यक है।

ग्लोबलाइजेशन के दौर में भारत सरकार की नीतियां अमीरों का कुछ अधिक ही फायदा पहुंचाने की रही। बहुत से दलों की सरकारें बनी और कायम रही, किंतु इस नीति में कोई मूलभूत अंतर नहीं दृष्टिगोचर हुआ। सत्तर फीसदी किसानों के देश में सबसे अधिक उपेक्षित रहा है तो किसान ही! तभी तो विगत दो दशकों में तकरीबन दो लाख किसान खुदकुशी अंजाम दे चुके हैं। राष्ट्रीय योजना आयोग के एजेंडे पर कृषि और किसान सबसे नीचे की श्रेणी पर रहे हैं। यकीनन देश को औद्योगिकरण होना चाहिए। विकास दर में भी बेहद बढोत्तरी होनी चाहिए। किंतु क्या कृषि की विकास दर पर समुचित तवज्जों नहीं प्रदान की जानी चाहिये जोकि घटकर मात्र ढाई फीसदी सालाना रह गई है। १९९७ में जहां खाद्यान्न पदाथा] की उपलब्धता ५०० ग्राम प्रति व्यक्ति थी वहीं इस वक्त यह घटकर ४०० ग्राम रह गई है। सरकारी नीतियों के ही परिणामस्वरूप कृषि में शासकीय और प्राइवेट पूंजी निवेश अधिक नहीं बढा है। भारत यदि प्रति वर्ष कम से कम सात हजार कऱोड रुपए का निवेश अंजाम दे तो निरंतर खराब होती जाती स्थिति का मुकाबला बखूबी किया जा सकता है। देश की निरंतर गति से बढ रही आबादी का पेट भरने की खातिर कृषि का समुचित विकास बेहद जरूरी है। किसानों की घनघोर उपेक्षा ने ही वस्तुतः देश में नक्सलवाद को जन्म दिया और उसे गति भी प्रदान की है

यूएनओ की एक रिपोर्ट बयान करती है कि जिस तरह से मौसम का मिजाज तब्दील हो रहा है उससे भारत में भविष्य में इक्यावन फीसदी कृषि योग्य भूमि प्रभावित हो सकती है और देश के तकरीबन चालीस कऱोड किसानों पर इसका प्रभाव हो सकता है। महंगाई से जंग करने के लिए देश को दोहरी कार्यनीति की दरकार है। एक तरफ तो मुनाफाखोरों और जमाखोरों पर सरकारी डंडा बहुत सख्ती से चलना चाहिए। दूसरी ओर कृषि और किसानों की दशा को सुधारने का जबरदस्त प्रयास होना चाहिए। देश के कुल उत्पादन में कृषि का हिस्सा मात्र बीस फीसदी रह गया है। अमेरिका द्वारा संचालित विश्व व्यापार संगठन भारत के किसानों को प्रदान की जाने वाली शासकीय सब्सिडी को खत्म करा देना चाहता है। भारत सरकार को इस दबाव के आगे झुकने से स्पष्ट इंकार करना ही होगा अन्यथा देश के किसानों की पहले से ही खराब दशा और अधिक खराब हो जाएगी। आजादी के दौर के विगत बासठ वषा] में भारत की आबादी में तीन गुना इजाफा हुआ है। निरंतर गति से बढती जाती विशाल आबादी का पेट देश के मेहनतकश किसानों ने ही भरा है।

राज्य व्यवस्था और निरंकुश कारपोरेट बाजार के अनैतिक गठज़ोड ने कुछ ऐसे हालात को तशकील कर दिया है कि किसान और मजदूर हाशिए पर खिसक गए हैं। राजनीति का कारपोरेटीकरण और कारपोरेट का राजनीतिकरण भारत की जमहूरियत और राजकाज का विशिष्ट आचरण बन गया है। राजनीति और कारपोरेट बाजार के अनैतिक गठज़ोड का बढती महंगाई से कुछ खास ही रिश्ता है। बिना किसी शासकीय व्यवधान के बाजार की जबरदस्त ताकतें दामों में इजाफा करके भयंकर मुनाफाखोरी कर रही हैं। क्योंकि हमारे वतन के शासकों में बाजार की मुनाफाखोर ताकतों पर लगाम कसने की न तो कोई इच्छाशक्ति है ना हि कोई राजनीतिक प्रतिबद्धता शेष है। अमेरिका का प्रेसिडेंट ओबामा महंगाई बढाने वालों की तुलना भ़ाडे के हत्यारों और लुटेरे से करता है। बाजारवादी अमेरिकी शासक इस हकीकत को समझ रहा है, किंतु फिर समाजवादी संविधान वाले देश के शासकों की अक्ल इस प्रश्न पर क्यों काम नहीं कर रही है ?

आपकी राय