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दलाई लामा की तुलना में चीन और भारत

Swatantra Vaartha  Mon, 22 Feb 2010, IST

दलाई लामा की तुलना में चीन और भारत

तिब्बती नेता दलाई लामा को गत शुक्रवार को अमेरिकी कांग्रेस की संस्था ‘नेशनल एनडाउमेंट फार डेमोक्रेसी’ की तरफ से ‘डेमोक्रेसी सर्विस मेडल’ से सम्मानित किया गया। इस सम्मान को ग्रहण करने के बाद कांग्रेस के लाइब्रेरी कक्ष में बोलते हुए दलाई लामा ने तिब्बत की सांस्कृतिक स्वायत्तता की अपनी मांग को दोहराया और भारत तथा चीन के बीच मैत्रीपूर्ण संबंधों के विकास की कामना की। उनका कहना था कि चीन को भारत पर भरोसा करना होगा।

आपसी संबंधों को सामान्य बनाने के लिए यह आवश्यक है। उन्होंने इस अवसर पर पत्रकारों के सवालों का जवाब देते हुए भारत और चीन की राजनीतिक व्यवस्थाआें की तुलना भी की। जब उनसे पूछा गया कि भविष्य में दुनिया पर किस देश का अधिक प्रभाव प़डेगा भारत का या चीन का तो उनका साफ जवाब था कि निश्चय ही भारत का अधिक प्रभाव होगा। आर्थिक मामले में चीन भले ही आगे बना रहे, लेकिन विश्व समुदाय पर भारत का ही अधिक प्रभाव रहेगा। इसका कारण है भारत की लोकतांत्रिक पारदर्शिता तथा उसकी स्वतंत्र न्यायपालिका। दलाई लामा के अनुसार सच्चे व खुशहाल समाज के लिए केवल आर्थिक विकास ही आवश्यक नहीं है। मत भिन्नता का अधिकार तथा वैचारिक खुलापन भी खुशहाली का एक ब़डा तत्व है। दलाई लामा ने याद कि भारत के प्रधानमंत्री पं जवाहर लाल नेहरू तिब्बत की समस्या को संयुक्त राष्ट्र संघ में ले जाने के खिलाफ थे, लेकिन उसी समय प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के नेता जेबी कृपलानी ने उनका विरोध करते हुए इसकी वकालत की कि तिब्बत का मामला संयुक्तराष्ट्र संघ में ले जाया जाना चाहिए।

दलाई लामा का साफ कहना था कि चीन में आज के कम्युनिस्ट नेता वास्तव में भ्रष्ट हैं। उन्हें समाजवाद की कोई परवाह नहीं है। उन्हें केवल पूंजीवाद की चिन्ता है। वे केवल धन कमाने की कोशिश तक सीमित हैं। चीनी जनता के सामने भी उन्होंने यही आदर्श पेश किया है। उन्होंने भारत और चीन के संसद की भी तुलना की। उनका कहना था चीनी संसद में जरूरत से ज्यादा शांति रहती है क्योंकि वहां विरोधी स्वर के लिए कोई जगह ही नहीं है। इसके विपरीत भारतीय संसद में जरूरत से ज्यादा शोर है, लेकिन यह उसकी जीवंतता, खुलेपन तथा निर्भय अभिव्यक्ति का प्रमाण है।

निश्चय ही दलाई लामा ने ब़डी साफ बातें की और लोकतांत्रिक मूल्यों की श्रेष्ठता का अच्छा बखान किया, लेकिन इन सारी बातों से उन्होंने चीन की सरकार को और अधिक नाराज किया है। चीन की आंतरिक सामाजिक व राजनीतिक स्थिति जैसी भी हो किन्तु उसने विरोधी स्वरों को उभरने का कोई अवसर न देकर जो आर्थिक व सैनिक प्रगति की है उसके ताप से अमेरिका जैसा शक्तिशाली लोकतंत्र भी आतंकित है। अपने धनबल से वह दक्षिण पूर्व एशियायी देशों के साथ अफ्रीकी व दक्षिण अमेरिकी देशों को भी प्रभावित करने की स्थिति में है। इतिहास गवाह है कि संघर्ष की स्थिति में सभ्य और खुशहाल संस्कृतियां आसानी से पराजित होती रही हैं और बर्बर शक्तियां उन पर हावी होती रही हैं। इसलिए लोकतांत्रिक व मानवीय मूल्यों की समर्थक शक्तियां भी यदि आर्थिक विकास के साथ सामरिक शक्ति में भी श्रेष्ठ नहीं रहेंगी तो वे अपनी रक्षा नहीं कर सकेंगी। अहिंसा व सद्‌भाव के श्रेष्ठ मानवीय मूल्य तिब्बत की रक्षा नहीं कर सके। दुनिया की लोकतांत्रिक शक्तियां भी चीन के चंगुल से उसकी रक्षा नहीं कर पा रही हैं। इसलिए तिब्बत व दलाई लामा से दुनिया यही सबक ले सकती है कि अच्छे मूल्यों की रक्षा के लिए भी शक्ति संचय आवश्यक है। श्रेष्ठतर शक्ति के बिना श्रेष्ठतर मूल्यों की रक्षा नहीं हो सकती।

आन्दोलन में ढील आने के आसार नहीं

तेलंगाना के संदर्भ में गठित श्रीकृष्णा समिति ने इस शनिवार को वह अधिसूचना जारी कर दी जिसके अंतर्गत राज्य के इस विवादास्पद मुद्दे पर जनता, राजनीतिक दलों व क्षेत्रीय संगठनों को इस बारे में अपना विचार व सुझाव देने के लिए आमंत्रित किया गया है। इसके लिए ३० दिन का समय दिया गया है। इसके बाद समिति आन्ध्र प्रदेश की यात्रा पर भी आ सकती है जिससे प्रत्यक्ष विचारविमर्श किया जा सके।

इस अधिसूचना के जारी होते ही अब आंध्र व तेलंगाना दोनों ही क्षेत्रों के संगठन अपनीअपनी रिपोर्ट तैयार करने में लग गये हैं जिसके आधार पर वे समिति के समक्ष अपना ज्ञापन प्रस्तुत कर सकें। इसके लिए अब विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञों की मांग ब़ढ गई है। सर्वाधिक दबाव तेलंगाना क्षेत्र के संगठनों पर है क्योंकि उन्हें ही इसके ठोस कारण बताने है कि वे अब आन्ध्र के साथ नहीं रह सकते। इसके विपरीत आन्ध्रा के लोगों को यह बताना है कि ‘संयुक्त आंध्र प्रदेश’ क्यों आवश्यक है और यदि तेलंगाना राज्य अलग हुआ तो इससे उन्हें क्या नुकसान होने वाला है।

वे इसके लिए भी तैयार हैं कि यदि तेलंगाना के लोग विकास का मुद्दा उठाते हैं तो उनके लिए कोई विशेष पैकेज दिया जा सकता है जिस पर आन्ध्रा को कोई आपत्ति नहीं होगी किन्तु तेलंगाना के लोगों के लिए अब विकास कोई मुद्दा नहीं है। उन्हें अब विकास नहीं अपने लिए अलग राज्य चाहिए। उनको आन्ध्रा के नेतृत्व पर अब कोई भरोसा नहीं रहा। विकास व समानता के व्यवहार की प्रतीक्षा के लिए ५० वर्ष का समय बहुत होता है। अब इस तरह का और कोई प्रयोग, समझौता या आश्वासन स्वीकार नहीं।

यद्यपि श्रीकृष्णा समिति का गठन केन्द्र की विलम्बन नीति का ही एक उपकरण है फिर भी तेलंगाना के लोगों की समझ है कि कोई भी निष्पक्ष समिति या आयोग उनकी मांग की उपेक्षा कर सकता है । लेकिन इसके लिए लगातार केन्द्र पर दबाव बनाए रखना है। इसलिए तेलंगाना समर्थकों की स्वाभाविक रणनीति यही है कि श्रीकृष्णा समिति के समक्ष अपने पक्ष में दलीले पेश करते हुए आन्दोलन को भी बनाए रखना है। खैर, जो भी हो लेकिन इतना तो तय है कि तेलंगाना के बारे में जल्दी कोई निर्णय होने वाला नहीं है कम से कम २०११ तक की प्रतीक्षा तो करनी ही प़डेगी।

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