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रुश्दी के लिए कोई मौका नहीं

Swatantra Vaartha  Wed, 25 Jan 2012, IST

रुश्दी के लिए कोई मौका नहीं

आखिरकार राजस्थान सरकार ने भारतीय मूल के ब्रिटिश लेखक सलमान रुश्दी को वीडियो लिंक के माध्यम से भी जयपुर साहित्य महोत्सव में पहुंचे साहित्यकारों से बातचीत करने की अनुमति नहीं दी। पहले राज्य सरकार के गृहमंत्रालय ने महोत्सव के आयोजकों को यह विश्वास दिलाया था कि वह रुश्दी को इसका मौका देगी कि वह ‘वीडियो कांफ्रेंसिंग’ के जरिये दुनिया भर से यहां आए लेखकों के साथ संपर्क कर सकें।

आयोजकों ने भी मंत्रालय को विश्वास दिलाया था कि वह इस वीडियो कांफ्रेंसिंग में अपनी विवादास्पद पुस्तक के बारे में कोई चर्चा नहीं करेंगे, वह केवल अपनी पुस्तक ‘मिडनाइट चिल्ड्रेन’ के बारे में बात करेंगे और किसी अन्य विवादास्पद बिंदु का स्पर्श नहीं करेंगे, फिर भी सरकार ने मुस्लिम संगठनों के दबाव के आगे अपना वायदा त़ोड दिया और आयोजकों द्वारा तय किया गया वीडियो कांफ्रेंसिंग कार्यक्रम रद्‌द कर दिया।

वैसे यह पहले से ही तय लग रहा था कि सरकार रुश्दी को वीडिया कांफ्रेंसिंग का भी मौका नहीं देगी, लेकिन वह सीधे इससे इनकार भी नहीं करना चाहती थी। वह यह प्रदर्शित करना चाहती थी कि रुश्दी को समारोह में आने से रोकने या उनको वीडियो कांफ्रेंसिंग की भी अनुमति न देने में उसकी अपनी कोई भूमिका नहीं है। वह तो केवल राज्य में कानून और व्यवस्था की स्थिति सामान्य बनाये रखना चाहती है। सरकार की ओर से पहले यह कहा गया था कि वह वीडियो कांफ्रेंसिंग की अनुमति तभी देगी जब उत्सव के आयोजक यह वचन दें कि उसमें सेटेनिक वर्सेस का कोई जिक्र नहीं होगा।

शायद उसने सोचा था कि रुश्दी स्वयं इसके लिए तैयार नहीं होंगे और इस बहाने वह वीडियो कांफ्रेंसिंग की इजाजत देने से बच जाएगी, मगर आयोजकों ने रुश्दी को इस बात के लिए मना लिया कि वह अपनी बातचीत में सेटेनिक वर्सेस की या अन्य किसी विवादास्पद मुद्‌दे की चर्चा नहीं करेंगे। इस पर फिर सरकार फंस गयी, तो उसे राहत दिलाने के लिए मिल्ली कौंसिल की स्थानीय शाखा के लोगों ने इस कांफ्रेंसिंग वाले दिन भी उत्सव स्थल के समक्ष प्रदर्शन किया और इस कांफ्रेंसिंग को रद्‌द करने की मांग की। सरकार को फौरन बहाना मिल गया और उसने आयोजकों को बता दिया कि इस तरह के विरोधों को देखते हुए रुश्दी के लिए वीडियो लिंक की अनुमति नहीं दी जा सकती।

मिल्ली कौंसिल के लोग किसी भी रूप में रुश्दी को भारत में प्रवेश की इजाजत देने के लिए तैयार नहीं हैं। उन्होंने उनके सशरीर आगमन का तो विरोध किया ही, उनकी इलेक्ट्रॉनिक छवि व आवाज को भी समारोह में आने पर आपत्ति व्यक्त की।

सरकार ने उसकी हर इच्छा को नतमस्तक होकर स्वीकार किया। मिल्ली कौंसिल, यह वही संगठन है, जिसने उपर्युक्त साहित्यिक उत्सव में शामिल चार लेखकों के खिलाफ शिकायत दर्ज करायी है, जिन्होंने सेटेनिक वर्सेस के विवादास्पद अंशों को मंच से प़ढा था। अजमेर की जिला अदालत ने ३० जनवरी को इस पर सुनवाई करने का निर्णय लिया है। यह भी खबर है कि इस पर सरकार की ओर से भी शिकायत दर्ज करायी गयी है, किंतु पुलिस के अनुसार किसी तरह की एफआईआर दर्ज नहीं करायी गयी है।

खैर, भारत का यह ७वां पंचदिवसीय प्रतिष्ठित साहित्यिक समारोह इस २४ जनवरी को समाप्त हो गया, लेकिन इसे भविष्य में किन्हीं साहित्यिक उपलब्धियों के लिए नहीं, बल्कि शर्मनाक विवादों के लिए याद किया जायेगा। इस समारोह के दौरान राज्य सरकार द्वारा जो रवैया दिखाया गया, उससे निश्चय ही दुनिया में भारत की छवि खराब हुई है।

यहां के राजनेता सत्ता के लिए तुष्टीकरण के किस स्तर तक जा सकते हैं, इसका जैसा नजारा इस बार जयपुर में देखने को मिला, वैसा शायद इससे पहले राजीव गांधी के शासन काल में उस समय देखा गया, जब शाहबानो केस में सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के विरुद्ध भ़डके आंदोलन से डरकर उन्होंने संविधान में संशोधन करने तक का फैसला कर डाला था। अब इसके बाद भविष्य की स्थितियां क्या रूप लेंगी, कुछ कहा नहीं जा सकता।

मिस्र में रु़ढवादी इस्लामी पार्टियों की जीत

अफ्रीका के सबसे ब़डे देश मिस्र में राष्ट्रपति होस्नी मुबारक की तानाशाही का युग समाप्त होने के बाद हुए पहले संसदीय आम चुनाव में इस्लामी पार्टियों को भारी जीत हासिल हुई है। देश की आम जनता ने तथाकथित सेकुलर व लिबरल पार्टियों को खारिज कर दिया है।

करीब ६ हफ्ते की अवधि में तीन चरणों में हुए चुनाव में संसद की कुल ४९८ सीटों के लिए हुए चुनाव में मुस्लिम ब्रदरहुड की राजनीतिक शाखा को सर्वाधिक २३५ सीटें तथा ३८ प्रतिशत मत हासिल हुआ है। दूसरा स्थान देश की अतिरु़ढवादी इस्लामी पार्टी ‘अल नूर’ को हासिल हुआ है, जिसे कुल १२१ सीटें और २९ प्रतिशत वोट मिला है। लिबरल वाफ्द पार्टी तथा इजिप्सियन ब्लॉक को क्रमश: ३६ और ३३ सीटें हासिल हुई हैं।

मिस्र में संसद के लिए ब़डी जटिल चुनावी प्रक्रिया अपनायी गयी है। यहां २ तिहाई सीटों पर पार्टियां अपने उम्मीदवार ख़डे करती हैं और एक तिहाई सीटों पर व्यक्तिगत उम्मीदवार प्रतिस्पर्धा में उतरते हैं। तीन चरणों में ६ सप्ताह की अवधि में हुए मतदान का कार्यक्रम गत ११ जनवरी को समाप्त हुआ। चुनाव परिणामों की घोषणा में भी कई दिन लग गये। उसके बाद सशस्त्र बलों की सर्वोच्च परिषद के अध्यक्ष मोहम्मद हुसेन तंताबी ने अपनी तरफ से १० सदस्यों को नामित किया। इन्हें मिलाकर संसद की कुल सदस्य संख्या ५०८ हो गयी है। इसके बाद अब उच्च सदन ‘शूरा’ (सिनेट) का गठन होगा।

चुनावों ने स्पष्ट कर दिया है कि अरब देशों में तानाशाही के खिलाफ उभरी क्रांति आधुनिक लोकतांत्रिक व्यवस्था के पक्ष में नहीं, बल्कि इस्लामी व्यवस्था के पक्ष में थी। इस्लामी ब्रदरहुड कट्‌टरपंथी इस्लामी संगठन हैं, जो प्राय: पूरे ख़ाडी क्षेत्र तथा अरबी पट्‌टी में फैला हुआ है। अरबी क्रांति में उसकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है।

वास्तव में अरब क्षेत्र के देशों के शासकों ने पश्चिमी देशों विशेषकर अमेरिका व ब्रिटेन के दबाव में इस्लामी या शरिया शासन का समर्थन करने वालों को दबा रखा था। लेकिन कब तक वह दबाव बना रहता, किसी न किसी दिन तो उसे टूटना ही था।

अब वह टूट गया है। इस्लामी ब्रदरहुड का सपना पूरे अरब क्षेत्र को ज़ोडकर एक विशाल अरबी भाषी इस्लामी साम्राज्य की स्थापना करना है। यद्यपि एकदम निकट भविष्य में यह सफल होता नहीं दिखता, लेकिन यह बहुत दूर भी नहीं है। पिछली जास्मिन क्रांति का प्रभाव इस क्षेत्र में जहां कहीं प़डा है, वहां रु़ढवादी इस्लामी विचार वाली शक्तियां ही सर्वाधिक प्रभावी राजनीतिक शक्तियों के रूप में उभरकर सामने आ रही हैं। इसलिए सपने के यथार्थ में बदलने की संभावना बहुत प्रबल है।

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