असंख्य बीमारियों के केन्द्र आसिफ़ ज़रदारी
पाकिस्तान के समाचार पत्रों में इन दिनों राष्ट्रपति आसिफ जरदारी की बीमारियां बहुचर्चित हैं। जरदारी पहली बार बीमार हुए हों ऐसी बात नहीं है, लेकिन जबसे वे मेमो गेट कांड में फंसे हैं तबसे उनकी बीमारियां ब़ढ गई है। कुछ बीमारियां तो शारीरिक हैं और कुछ राजनीतिक।
इस समय वे चिंता में डूबे हैं इसलिए कुछ बीमारियां जरूरत से ज्यादा ब़ढ गई है। वे इलाज करवाने के लिए दुबई गए तो भी शंका के घेरे में आ गए। हर बीमार का मनपसंद डॉक्टर होता है। इलाज केवल बीमारी से ही नहीं होता है, विश्वास से भी होता है। वे अपने विश्वसनीय डॉक्टर के पास दुबई पहुंचे तो शंका के घेरे में आ गए।
लोग पूछने लगे। इलाज के लिए आदमी ब्रिटेन और अमेरिका जाता है या फिर दुबई। दुबई के शेख जब स्वयं अपना इलाज करवाने के लिए पश्चिमी देशों में जाते हैं तो फिर पाकिस्तान के राष्ट्रपति दुबई क्यों चले गए? एक बार जाते तो बात समझ में आ सकती थी, लेकिन वे तो दूसरी बार भी दुबई चल दिये। तब इस्लामाबाद में एवाने सदर (राष्ट्रपति भवन) के प्रवक्ता को कहना प़डा कि वे अपनी बीमारी के लिए नहीं बल्कि एक विवाह में शामिल होने के लिए दुबई गए थे। आसिफ जरदारी की बीमारियों का अपना कीर्तिमान है।
उन्हें जब नवाज शरीफ ने जेल में बंद करवा दिया था उस समय भी वे बीमार हो गए थे। अपनी पत्नी बेनजीर के साथ जब वे कहीं दौरे पर जाते थे तब भी बीमार हो जाया करते थे। उन दिनों पाकिस्तानी प्रेम में लिखा जाता था कि मिस्टर टेन परसेंट बीमार हैं। जरदारी को किस प्रकार की कितनी बीमारियां हैं उसकी चर्चा मीडिया में होती रहती है।
पाकिस्तान के एक स्तंभ लेखक जो जरदारी के निकट माने जाते हैं उनका कहना है कि जरदारी दिल के बीमार हैं। पाकिस्तान और विदेश के निष्णात हार्ट स्पेशलिस्ट उनकी जांच प़डताल करते रहते हैं। उनका दिल सही सलामत रहे इसलिए बहुत सारे व्यायाम भी वे राष्ट्रपति भवन में करते हुए दिखलाई प़डते हैं।
डॉक्टर का कहना है कि उनका कोलेस्ट्रॉल यदि संतुलित रहे तो वे ठीक रह सकते हैं। लेकिन खाने पीने के शौकीन जरदारी परहेज के मामले में कच्चे हैं। हार्ट की बीमारियां तो उनको सताती ही है साथ में उनकी रीड की हड्डी में बहुत तकलीफ रहती है। उन्हें उठने और चलने में भयंकर दर्द होता है। इसलिए उन्हें न चाहते हुए भी लेटना प़डता है। जरदारी डायबिटीज के पुराने रोगी है। इसलिए शरीर में निर्बलता महसूस करना एक सामान्य बात है। वे हर समय बेचैन रहते हैं। उनकी इस अशांति ने उनका सुकून छीन लिया है। अब तो वे भूलने भी लगे हैं।
बहुत दिमाग पर जोर देते हैं तब भी उन्हें याद नहीं आता है कि वे कहां हैं और कुछ समय पूर्व क्या बोल रहे थे? नाम भूल जाने की बीमारी ब़ुढापे में सामान्य होती है, लेकिन वे तो अभी जवान हैं और कोई उन्हें ब़ूढा कह दे तो गुस्सा आ जाता है। लेकिन किसी का नाम ही भूल जाएं तो आगे क्या कहना है और किस विषय में बात करना है उसे याद कर लेना बहुत कठिन है। इसलिए छोटी से छोटी बात को भी वे लिख लेते हैं, ताकि उन्हें शर्मिंदा नहीं होना प़डे, लेकिन सामान्य तौर पर हर बात, हर विषय और हर व्यक्ति के लिए ऐसा नहीं होता। इसलिए वे च़िडच़िडे व जिद्दी स्वभाव के हो गए हैं। उनके परिवार का कोई व्यक्ति उनके साथ राष्ट्रपति भवन में नहीं रहता है।
इसलिए अपना दुःख किससे कहें? अपनी बीमारी और अपनी परेशानियों के कारण वे मन ही मन घुटते रहते हैं। उनका कहना है कि उनकी स्नायु संबंधी बीमारियां तो वे अपनी लम्बी जेल यात्रा से लेकर आए हैं। दुनिया जानती है कि उनके अनेक अपराधों के लिए उन्हें १३ साल तक जेल में रखा गया था। उन दिनों बेनजीर जीवित थी, लेकिन वह भी सप्ताह में एक बार ही मिलने आया करती थी। दो घंटे का समय समाप्त होते ही जब जरदारी अकेले रह जाते थे तो बतलाया जाता है कि वे फूटफूट कर रोते थे। कई दिनों तक द़ाढी नहीं बनाना और अपना मनपसंद खाना नहीं खाना एक सामान्य बात हो गई थी। उनमें झुंझलाहट तेजी से ब़ढ गई थी।
राष्ट्रपति भवन के सूत्र कहते हैं कि हमारे राष्ट्रपति मन ही मन बातें करने लगते हैं। उन्हें ऐसा लगता है कि कोई उनके पास बैठा है। सरकारी बातों में गोपनीयता बरतनी प़डती है। इसलिए राष्ट्रपति भवन का स्टाफ जानता है कि राष्ट्रपति को कब बाहर ले जाना है और कब नहीं। उनसे मुलाकात करने आने वालों पर भी सख्त नज़र रखी जाती है।
उनके निकट के परिवारजन के अतिरक्त बहुत कम लोगों से उनकी भेंट होती है। यह अकेलापन भी उन्हें खाता रहता है। वे कभीकभी शिकायत करते हैं मैं तो राष्ट्रपति नहीं एक बंदी हूं। मुझे क्या करना चाहिए, किन से बात करना चाहिए, कितना बोलना चाहिए और कितना एवं कब बोलना चाहिए इन सभी बातों पर पहरा है। उनका दिमाग कमजोर हो गया है। सबसे बुरी बात तो यह है कि वे किसी पर विश्वास नहीं करते। हर काम वे अकेले करना चाहते हैं, जो संभव नहीं। वे भावुक होकर बेकाबू हो जाते है।
यहां तक तो ठीक, लेकिन जब गालियां देने लगते हैं तब तो विचित्र स्थिति हो जाती है। वे पार्टी के उपचेयरमैन और देश के राष्ट्रपति तो बन बैठे हैं, लेकिन वे अपनी ज़िम्मेदारियां नहीं बांटना चाहते। अपने विचारों का और निर्णय लेने से पहले किसी सलाह मशवरे का आदानप्रदान नहीं करते। मेमो गेट कांड ने उनकी कमर त़ोड दी है। उन्हें विश्वास हो गया था कि सेना उन्हें किसी भी क्षण गिरफ्तार करके ले जा सकती है। इसलिए केवल अपने बच्चों के कहने से उन्होंने दुबई में शरण लेने का निर्णय किया ताकि वे फौज के पंजे से दूर रहें और पार्टी को अपने कंट्रोल में रखें।
आसिफ़ ज़रदारी एक और मचूसिकता से पी़डत हैं। बेनज़ीर से जब उनका रिश्ता ज़ुड गया तबसे से वे अपने आपको पाकिस्तान का सुपर स्टार मानने लगे हैं। यह सच है कि तब से उनका रुत्बा ब़ढ गया है। वे हाकिम ज़रदारी के बेटे कम और भुट्टो परिवार के दामाद अधिक बन गए हैं। जरदारी सिंध के एक सामान्य वुडेरा परिवार के पुत्र हैं।
उनकी शिक्षादीक्षा नहीं के बराबर हुई है। जुलफिकार अली भुट्टो की फांसी के पश्चात जब बेनजीर और माता नुसरत परेशानियों में घिरे हुए थे उस समय उन पर यह दबाव डाला गया कि बेनजीर का विवाह कर दिया जाए। यद्यपि पिता जुलफिकार अली भुट्टो ने अपनी अंतिम भेंट में अपनी पुत्री बेनजीर को कहा था तू मेरी राजनीतिक वारिसदार है।
तू मेरी पिपुल्स पार्टी को चलाना और विवाह मत करना। मेरे लिए तू बेटी नहीं बेटा है, लेकिन भुट्टो परिवार के दबाव में बेनजीर को विवाह करना प़डा। आसिफ जरदारी का रिश्ता बेनजीर की एक दूर की बुआ लेकर आई थी। पिता के अपार दुःख और दबाव के तहत मां नुसरत और बेटी बेनजीर ने यह रिश्ता स्वीकार कर लिया।
बेनजीर ने आसिफ को कभी मन से अपना पति स्वीकार नहीं किया। अनेक बार तलाक की नौबत आई। जब अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बुश ने बेनजीर को व्हाइट हाउस में आमंत्रित करके पाकिस्तान की सत्ता के सूत्र संभालने का आग्रह किया था। उस समय भी पतिपत्नी में भारी अलगाव था, लेकिन बुश ने उन्हें समझाया और कहा पाकिस्तान रु़ढवादी विचारधारा का देश है। तुम्हारा तलाक तुम्हारे राजनीतिक जीवन के लिए अडचन बन सकता है।
इसलिए तलाक का विचार छ़ोड दो। बेनजीर और आसिफ की मित्रता बुश ने व्हाइट हाउस के टेबल पर करवाई। इसके बाद बेनजीर पाकिस्तान लौटी और पाकिस्तान की जनता को विश्वास हो गया कि पीपीपी सत्ता में लौटेगी और बेनजीर भुट्टो देश की प्रथानमंत्री बनेगी, लेकिन भाग्य ने साथ नहीं दिया और बेनजीर की हत्या हो गई। इस रिक्तता में आसिफ जरदारी का भाग्य चमका। वे पीपीपी के सर्वे सर्वा बन गए। पत्नी की लाश पर उनकी पार्टी सत्ता में आ गई और जरदारी राष्ट्रपति बन गए।
लेकिन जब भुट्टो परिवार के इतिहास पर नजर डालते हैं, तो पता लगता है कि इस परिवार के अधिकांश सदस्य कुदरती मौत नहीं मरे। पिता जुलफिकार अली भट्टो को फांसी हुई।
बेनजीर के दोनों भाई हत्या के शिकार हुए। मां नुसरत ६ वर्ष तक कोमा में रही और पिछले दिनों ब़डी बेबसी की मौत मर गई। असिफ जरदारी का संबंध भुट्टो परिवार से नहीं है, लेकिन उनके मन में यह बात घर कर गई है कि किसी भी क्षण उनका कुछ भी हो सकता है। जरदारी ने जो पाप किये हैं वे किसी से छिपे नहीं हैं। इसलिए उन्हें इस बात का बारबार अहसास होता है कि कहीं उनका कुछ नहीं हो जाए? आसिफ जरदारी ने ही बेनजीर के छोटे भाई शाहनवाज भुट्टो की हत्या करवाई थी, क्योंकि नुसरत ने तय किया था कि उसके बाद पीपीपी का चेयरमैन उसका बेटा बनेगा।
यह बात जरदारी को नहीं पटी और उसन अपने रास्ते का कांटा साफ कर दिया। इससे पहले अपने एक और बेटे मुर्तुजा की हत्या जो फ्रांस में कर दी गई थी उसके दुःख से नुसरत बुरी तरह से टूट गई थी। शाहनवाज भुट्टो की बेटी फातेमा पाकिस्तान में इन दिनों पत्रकारिता के क्षेत्र में है।
पिछले दिनों वह एक दल के साथ भारत भी आई थी। भुट्टो के पिता जूनाग़ढ रियासत में दीवान के पद पर आऱुढ थे, लेकिन सरदार पटेल के नेतृत्व में जब जूनाग़ढ भारत का भाग बना उससे पहले ही वे पाकिस्तान पलायन कर गए। बेनजीर की एक बहन की मृत्यु पूना में हुई थी जिसकी कब्र आज भी वहां के कब्रस्तान में मौजूद है, लेकिन वह किस प्रकार पुणे आई यह जानकारी उपलब्ध नहीं है।
इसलिए आसिफ जरदारी मानसिक, शारीरिक और राजनीतिक बीमारी से तो पी़डत हैं ही, लेकिन उन्होंने दामाद बन जाने के पश्चात किस प्रकार भुट्टो परिवार को सताया उसे याद कर वे अकेलेपन में अपने पापों का प्रायश्चित भी करते हों, तो आश्चर्य की बात नहीं।
