ADVERTISEMENT

आपका वोट

क्या राहुल गांधी भ्रष्टाचार खत्म करेंगे?

  • सही
  • गलत
  • पता नहीं
और भी

फोटो दीर्घा

Share

राजग पर बेवजह नहीं शरद की चिंता

Swatantra Vaartha  Wed, 25 Jan 2012, IST

राजग पर बेवजह नहीं शरद की चिंता

शरद यादव हाल के वषा] में ऐसे नेता के तौर पर उभरे हैं जिनके वक्तव्यों में कटु सच्चाई के साथ तार्किकता, व्यावहारिकता और जन सरोकार निहित होता है। अपने वक्तव्यों के कारण वे राजनीतिक जोखिम भी उठाते हैं। उनके विरोधी भी उनके मंतव्यों को गंभीरता से लेते हैं।

बसपा उनकी विरोधी पार्टी है, लेकिन चुनाव आयोग ने हाथी एवं मायावती की मूर्तियों को ढंकने का जो नासमझी भरा आदेश दिया, उसकी उन्होंने आलोचना की। जनता दलएकीकृत के अध्यक्ष होने के साथ वे राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के संयोजक भी हैं, इसलिए वे अपने गठज़ोड एवं इसके सहयोगी दलों के बारे में कोई वक्तव्य देते हैं तो उस पर संदेह करने, उसमें मीन मेख निकालने या उसमें दलीय स्वार्थ ढूंढने का कोई कारण नहीं होना चाहिए।

उन्होंने उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में भाजपा के साथ चुनावी समझौता न होने के संदर्भ में जो बातें कहीं हैं वे भाजपा एवं राजग दोनों की चिंताजनक आंतरिक तस्वीर पेश करती हैं। संप्रग सरकार के विकल्प बनने या अगले आम चुनाव के बाद उसका स्थानापन्न बनने का सपना पाल रही पार्टी व गठज़ोड की दृष्टि से शरद यादव का कथन अत्यंत महत्वपूर्ण है।

उन्होंने कहा है कि भाजपा एवं जदयू का गठबंधन न होना राजग को कमजोर करने वाला है। लेकिन गठबंधन क्यों नहीं हुआ, इसके लिए उन्होंने जो कारण बताएं हैं वे ज्यादा चिंताजनक हैं। शरद यादव ने जो कुछ कहा है, उसका अर्थ यही है कि ऐसा केवल भाजपा की आंतरिक स्थिति के कारण है जिसमें कोई एक व्यक्ति अधिकारपूर्वक निर्णय करने तथा उस निर्णय को पार्टी के अंदर सर्व स्वीकार्य बना पाने की स्थिति में नहीं हैं।

इस समय लालकृष्ण आडवाणी भाजपा के वरिष्ठतम सक्रिय नेता हैं, लेकिन यादव के अनुसार अब उनकी पार्टी में नहीं चलती और उन्हें किनारे कर दिया गया है। भाजपा के प्रवक्ता एवं महासचिव रविशंकर प्रसाद ने इसका खंडन करते हुए बयान दिया कि आडवाणी पार्टी के सर्वमान्य नेता हैं और उनकी अनदेखी कोई नहीं कर सकता।

प्रश्न है कि शरद राजग के संयोजक होते हुए उस व्यक्ति के बारे में ऐसा कोई वक्तव्य क्यों देंगे जिसके नेतृत्व में गठबंधन ने २००९ का आम चुनाव ल़डा एवं भ्रष्टाचार के विरुद्ध जिसकी जन चेतना यात्रा के आरंभ और अंत में उन्होंने शिरकत की ? इससे न उनकी पार्टी, न राजग न स्वयं उनको कोई राजनीतिक लाभ मिलने वाला है। उत्तर प्रदेश में गठबंधन न होने की निराशा तो समझ में आती है, पर उसके लिए वे भाजपा के बारे में ऐसा बयान नहीं दे सकते।

हालांकि शरद यादव कह रहे हैं कि जदयू ने २००७ में ४४ उम्मीदवार ल़डाए थे, लेकिन चुनाव आयोग के आंक़डों में घोषित प्रत्याशी केवल १६ थे, जिनमें से केवल एक जीता था। आयोग के आंक़डों के अनुसार जद यू को २ लाख २१ हजार ५९४ मत मिले थे जो कुछ मत का ०८४ प्रतिशत था। लेकिन उम्मीदवारों ने अपने क्षेत्रों में हुए मतदान के १०८४ प्रतिशत मत पाए थे। पिछली बार राजनाथ सिंह राष्ट्रीय अध्यक्ष थे और उन्होंने जैसा चाहा समझौता किया।

भाजपा स्वयं ३५० सीटों पर ल़डी तथा शेष सीटें अपना दल एवं जद यू को दी। यह भी सच है कि जद यू का प्रदेश में अपना ब़डा जनाधार नहीं है और उसके उम्मीदवारों ने काफी कम मत पाए थे। लेकिन ऐसे समाजवादी प्रदेश के अनेक जिलों में हैं जो सपा के साथ नहीं जा सकते।

उत्तर प्रदेश में भाजपा की सोच यह थी कि हम हारें या जीतें, अपने दम पर चुनाव ल़डेंगे। भाजपा के लोग बताते हैं कि जदएकी के लिए अधिकतम १५ सीटों तक समझौते की संभावना हो सकती थी लेकिन इससे ज्यादा नहीं। शरद यादव का कहना है कि उन्हें मजबूरी में सभी ४०३ सीटों पर ल़डने की घोषणा करनी प़डी है, क्योंकि ऐसा न करने से पार्टी में विद्रोह हो जाता। यह तो चुनाव के बाद पता चलेगा कि उनके उम्मीदवार कितने मत पाते हैं और उससे भाजपा की जीत या हार कितना प्रभावित होती है लेकिन भाजपा एवं राजग के संदर्भ में जो कुछ उन्होंने कहा है, उसमें सच्चाई है।

क्या यह गलत है कि अटल बिहारी वाजपेयी एवं लालकृष्ण आडवाणी के दौर में निर्णय के सूत्र वे दोनों ही थे और भले उससे कोई असहमत हो, पर पार्टी के लिए स्वीकार्य होता था ? वह एक लोकतांत्रिक पार्टी के लिए उचित था या अनुचित इस पर बहस हो सकती है, पर इस समय पार्टी में नेतृत्व और नीतिनिर्धारण का न कोई एक केन्द्र है और न सामूहिक निर्णय प्रक्रिया का स्थापित अस्तित्व।

पार्टी संगठन एवं संसदीय ईकाई में तो सीधी विभाजन रेखा दिखती ही है, इन दोनों के अंदर भी उप विभाजन रेखाएं हैं। लोकपाल मामले पर लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज एवं राज्यसभा में अरुण जेटली के रुख में अंतर पूरे देश के सामने था। पार्टी संगठन में भी कई धारायें एवं परस्पर प्रतिस्पर्धात्मक गुट सक्रिय हैं।

इसका सबसे ताजा उदाहरण पूर्व संगठन महासचिव संजय जोशी की सुरक्षा का है पार्टी में वापसी के बाद से जब से वे सक्रिय हुए, उनकी जान लेने की धमकी आने लगी। खुफिया विभाग ने भी अपनी रिपोर्ट में इसकी गंभीरता को स्वीकार किया। लेकिन पार्टी में ही एक गुट ने सरकार द्वारा उनकी सुरक्षा व्यवस्था करने का छद्म विरोध किया। सवाल है कि कौन हैं ये ? पार्टी में गुटबंदी का यह केवल एक तथ्य है। उम्र की वरिष्ठता के कारण कुछ नेता आडवाणी से संसद एवं संगठन की नीतियों पर कुछ चर्चा कर लेते हैं, लेकिन उनकी नीतिनिर्धारण में सक्रिय भूमिका नहीं है।


पार्टी के कई नेता बताते हैं कि आडवाणी जी के पास जब वे अपनी समस्या लेकर गए तो उन्होंने कहा कि हमसे तो कोई कुछ पूछता ही नहीं। आखिर पिछले वर्ष आडवाणी के प्रधानमंत्री का उम्मीदवार न होने का संघ का बयान एवं उनका संघ मुख्यालय जाने का क्या अर्थ था ? संघ ने यह बयान उनके द्वारा जन चेतना यात्रा की घोषणा के बाद दिया था।

माना जाता है कि संघ ने ऐसा कदम पार्टी अध्यक्ष नितिन गडकरी से बातचीत के बाद ही उठाया था। यह आडवाणी को किनारे करना नहीं तो और क्या था ? आडवाणी की जन चेतना यात्रा को उत्तर प्रदेश में न चलने देने वाले कौन थे ! आरंभ में यात्रा केवल एक दिन वाराणसी में आई और वापसी में एक सभा गाजियाबाद में हुई।

यदि आडवाणी की केन्द्रीय भूमिका होती तो उनकी यात्रा सबसे ज्यादा उत्तर प्रदेश में चलती जिसकी चुनाव पूर्व आवश्यकता भी थी। रविशंकर प्रसाद की प्रतिक्रिया स्वाभाविक है। किसी भी भाजपा नेता से पूछा जाएगा तो वह ऐसा ही जवाब देगा।

हालांकि उनका प्रकाशित बयान सधा हुआ है। जरा नजर डालिए, ‘आडवाणी पार्टी के सर्वमान्य, सर्वोच्च और नीतिनिर्धारकों में हैं।’ यहां ‘में हैं’ शब्द प्रयोग ही सच बता देता है। शरद यादव का आकलन शतप्रतिशत यथार्थ को प्रकट करता है या नहीं इस पर मत भिन्नता हो सकती है, लेकिन राजग एवं भाजपा की राष्ट्रीय राजनीति की दृष्टि से उनकी चिंता शतप्रतिशत वाजिब है।

वास्तव में राजग के संयोजक के नाते उनकी चिंता केवल उप्र तक सीमित नहीं, २०१४ या उसके पूर्व होने वाला लोकसभा चुनाव उनके विचार का केन्द्र बिंदु है। जरा सोचिए, जिस पार्टी के नेतृत्व में राजग चुनाव ल़डेगा उसमें निर्णय का कोई एक केन्द्र बिंदु नहीं हो, उसका नेता भी तय नहीं हो और जिसे राजग ने नेता स्वीकार किया, उसको मुख्य धारा से अलग किया जा चुका है तो इससे ज्याद चिंताजनक स्थिति कुछ नहीं हो सकती।

संप्रग के अंदर मतभेद है, पर वहां मुख्य पार्टी की नीति निर्धारक का केन्द्र बिंदु भी एक है और उसके हाथों नेतृत्व तय करने का भी सर्वमान्य सूत्र है। एकल नेतृत्व का स्वरूप लोकतंत्र के लिए वांछनीय नहीं, पर इसके समानांतर प्रतिस्पर्धी गठज़ोड में लोकतांत्रिक तरीके से स्वीकार्य नेतृत्व व पारदर्शी निर्णय प्रक्रिया का अस्तित्व नहीं होगा तो आप सफलता भी नहीं पा सकते।

इस दोष का निराकरण भाजपा को ही करना होगा। भाजपा नेताआे एवं संघ शरद यादव के कथन को केवल गठबंधन न होने की प्रतिक्रिया न मानकर इस पर गंभीरता से विचार करे।

आपकी राय