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सदन, पतन और निर्वाचन

Swatantra Vaartha  Wed, 25 Jan 2012, IST

सदन, पतन और निर्वाचन

लोकपाल पर संसद में बहस और निर्णय अधूरा छूटा, जो पूरा हो सकता था। नए साल में एक ब़डा सवाल है कि क्या यूपीए सरकार बकाया चुनौती को बजट अधिवेशन में पार कर पाएगी। पश्चिम बंगाल में बगावत की नौबत है। यों भी ममता बनर्जी के तेवर कोई भी नहीं भांप पाता है। कभी कांग्रेस कौटिल्य कहलाने वाले स्वः पामुलपर्ती वेंकट नरसिम्हा राव ने इस बंगाली बाघिन को पुचकारकर काबीना में सजोकर रखा था।

यह ममता ही हैं जिन्होंने अटल बिहारी वाजपेयी की गठबंधन सरकार में दरार डाली थी। अपना रिश्ता त़ोड दिया था। आज अपने बीस सांसदों के साथ तृणमूल कांग्रेस यूपीए सरकार का लोकसभा में बहुमत खत्म करने का मंसूबा उछाल रही है। इसलिए कांग्रेस और समाजवादी पार्टी की दूरियां घट रही हैं। यदि उत्तर प्रदेश विधानसभा का चुनाव न होता तो शायद संसद का गणित भी बदल जाता।

कहावत है कि स्त्री के ‘ना’ का अर्थ ‘शायद’ होता है और ‘शायद’ में ही ‘हां’ निहित होता है। महिला प्रथम बार कभी ‘हां’ नहीं कहती। यह ममता की राजनीति पर भी लागू होती है। राजनीति की निखालिस मौकापरस्ती, जो उत्तर प्रदेश के विधानसभा निर्वाचन में दिख रही है वह नए साल में सियासी शुचिता के लिए अशुभ है।

अटल बिहारी वाजपेयी कहा करते थे कि घोर हिन्दुवादी या कट्‌टर मुस्लिम लीगी अगर इंदिरा गांधी की पार्टी में शामिल हो जाए तो सेक्युलर कहलाने लगता है। ठीक ऐसी बात भ्रष्ट राजनेता के बारे में भी लागू हो सकती है। बसपा के बेईमान यदि भाजपा के सदस्य बन जाएं तो केसरिया रंग से उनके दाग छिप जाएंगे?

अब साइकिल और हाथी की चुनावी प्रतिस्पर्धा में जो भी विजयी हो, वही जनाधार संपन्न राजनेता कहलाएगा। यानी वोट ही तय करते हैं कि ईमानदारी का पैमाना क्या है। इसलिए अन्ना हजारे के नेतृत्व का संघर्ष कुछ आस बंधाता है कि अभी प्रतिरोध की क्षमता जनता में बाकी बची है। प्रतिरोधात्मक शक्ति में गत वर्ष वृद्धि हुई थी। मगर वह कब तक पनपेगी फूलेगी? यह अनुत्तरित प्रश्न है। इसलिए संसद और विधानसभा की प्रासंगिकता पर चर्चा होनी चाहिए।

नेहरू ने जब ‘नियति’ का उल्लेख किया था तो उन्हें शायद पूर्वाभास तक नहीं हुआ होगा कि जिस फूलपुर के सांसद वे दस वषा] तक रहे, वहां से कभी अतीक अहमद जैसा नेता चुना जाएगा। जिस पर नैनी कारागार में कई अपराधों के लिए मुकदमा चल रहा है।

आखिर क्या विवशता रही इलाहाबाद ग्रामीण अंचल के वोटरों की कि जवाहरलाल नेहरू, जनेर मिश्र आदि की पंक्ति में माफिया डॉन को सांसद चुना? बस इन्हीं कारणों से आस्था हिल जाती है कि क्या संसद को सर्वापरि कहना चाहिए? संसद का अवमूल्यन किसने किया? इन्हीं निर्वाचित सदस्यों ने। अतः चुनाव नियमावलि में प्रगतिशील संशोधन कर यदि वापस बुलाने का अधिकार तथा अस्वीकार करने का हक वोटरों को मिले तो इन सांसदों पर जनवादी नियंत्रण रह सकता है। आखिर जनता ही सर्वाेेपरि है। गत वर्ष की बातों पर गौर करें तो एक अभाव ब़डा अखरता है।

संवैधानिक और सामाजिक आंदोलन तो चले किन्तु रोटीरोजी, शिक्षास्वास्थ्य विषयक संघर्ष को किसी दल अथवा संस्था ने नहीं चलाया। कभी भारत के लोहियावादी जन नारा बुलंद करते थे कि ‘कप़डारोटी सस्ती हो, दवाप़ढाई मुफ्ती हो।’ गत वर्ष महंगाई आसमान छू रही थी। फिर भी कोई विशाल जनांदोलन नहीं चला। कारण शायद यही रहा होगा कि राजनेता को कालेधन के प्राचुर्य के कारण इसका अहसास नहीं हुआ होगा। कभी केवल ब्याज पर जनता पार्टी सरकार पलट गई थी और पराजित इंदिरा गांधी की वापसी हो गई थी।

विश्व की सबसे ब़डी क्रांति फ्रांस में हुई थी,क्योंकि दालरोटी महंगी हो गई थी। रानी का सिर कलम हो गया था। दो पहलू, जिनसे राष्ट्र को गौरव महसूस होगा और लोकास्था ब़ढेगी, वह है अभियोजन प्रक्रिया में तेजी और न्याय प्रणाली में गतिशीलता।

कभी नेहरु कहा करते थे कि भ्रष्टाचारी को स़डक पर लगे खंभों पर टांग दो ताकि समाज के लिए उदाहरण रहे। फिलहाल आजादी के बाद के भारत का इतिहास गवाह है कि किसी भी भ्रष्ट को फांसी तो क्या, ब़डा दंड तक नहीं मिलता। किन्तु गत वर्ष में जिस संख्या में लोग जेल भेजे गए, उससे फिर विश्वास जगता है कि अब भी जनसंघर्ष कारगर हो सकता है। ऐसी चिंताजनक स्थिति में न्याय प्रक्रिया की भूमिका की सराहना करनी होगी।

के विक्रम राव

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