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यह आर्थिक विकास दुख क्यों पैदा कर रहा है

Swatantra Vaartha  Tue, 23 Feb 2010, IST

यह आर्थिक विकास दुख क्यों पैदा कर रहा है

आज मनुष्य नई तकनीक के मद में अंधा हो गया है। बच्चे को कार की ड्राइवर सीट पर बैठा दिया जाये तो दुर्घटना हो ही जाती है। दरअसल हमने अज्ञानी वैज्ञानिकों और अर्थशास्त्रियों को नई तकनीकों के ड्राइवर सीट पर बैठा दिया है। अर्थशास्त्रियों ने आटोमेटिक मशीनों से उत्पादन को ब़ढावा दिया है। सोच है कि मशीनों से उत्पादन करने में लागत कम आयेगी, बाजार में माल का दाम कम होगा और जनहित हासिल होगी। परंतु आदरणीय विद्वान यह भूल जाते हैं कि मशीनों से उत्पादन करने में रोजगार न्यून संख्या में उत्पन्न होते हैं, बेरोजगारी ब़ढती है और जनहित के स्थान पर जनअहित होता है। वर्तमान में पश्चिमी देशों में व्याप्त आर्थिक संकट की तह में भी नई तकनीकों की ही भूमिका है। यातायात का खर्च कम होने एवं इंटरनेट से सूचना का आदान प्रदान होने से पश्चिमी कंपनियां अधिकाधिक माल को विकासशील देशों से आयात कर रही हैं। विकसित देशों के श्रमिक बेरोजगार हो रहे हैं। प्रापर्टी खरीदने के लियेलिये गये ऋृण की अदायगी वे नहीं कर पा रहे हैं। इससे संपूर्ण विश्व के बैंकों पर संकट के बादल छाये हुये हैं। परमाणु तकनीकों का दुरुपयोग आतंकवादियों द्वारा किये जाने की संभावना बन रही है।

तकनीकों के इस दुरूपयोग के पीछे अर्थशास्त्रियों द्वारा बनाई गयी सुख की परिभाषा है। अर्थशास्त्रियों के अनुसार खपत से सुख मिलता है। इतना सही है कि मनचाही वस्तु मिल जाये तो व्यक्ति सुख का अनुभव करता है जैसे लम्बी यात्रा से लौटे यात्री को शीतल पेय की खपत सुख पहुंचाती है। परंतु क़डक़डाते ज़ाडे में वही शीतल पेय की खपत दुखदाई हो जाती है। अतः व्यक्ति की इच्छाआें के अनुसार ही खपत में वृद्धि करनी होगी।

मनोवैज्ञानिकों ने इच्छाआें के स्रोत पर बहुत शोध किया है सिगमन्ड फ्रायड ने बताया था कि गहरी इच्छायें व्यक्ति के अचेतन में स्थित रहती हैं। सामान्य मनुष्यों को इनका ज्ञान नहीं होता है जैसे पूर्वजों द्वारा खेत में ग़ाडे गये धन का ज्ञान किसान को नहीं होता है। देखा जाता है कि कोई व्यक्ति प़ढना लिखना पसंद करता है, दूसरा तेज मोटर साइकिल चलाना पसंद करता है और तीसरे को धन कमाने की लगन रहती है। अचेतन में प़डी ये इच्छायें अनजाने ही व्यक्ति को विशेष दिशा में ढकेलती रहती हैं जैसे मैग्नेट द्वारा लोहे के टुक़डे अनजाने ही विशेष दिशा में खींच लिये जाते हैं। अतः सच्चे सुख को हासिल करने के लिये सुनिश्चित करना होगा कि व्यक्ति अपनी गहरी अचेतन इच्छाआें को सही मायने में व्यक्त कर रहा है अथवा नहीं। जिस व्यक्ति की इच्छा धन कमाने की हो उसे लाइब्रेरी में बैठा दिया जाये तो पुस्तकों की खपत उसे दुख ही पहुंचायेगी।

अचेतन में प़डी इच्छाआें को आधुनिक अर्थशास्त्र मान्यता नहीं देता है। बल्कि अर्थशास्त्रियों का प्रयास रहता है कि इन गहरी इच्छाआें को दबा दो और व्यक्ति की बुद्धि को विशेष माल की खपत की ओर घुमा दो। किसी सिनेमाघर के मालिक ने सिनेमा के बीचदो एक क्षण के लिये पापकार्न के विज्ञापन डाल दिये। ये विज्ञापन इतने कम समय के लिये दिखाये जाते थे कि बुद्धि द्वारा इनके चित्र को समझना कठिन होता था। परंतु अचेतन द्वारा इन्हें देख लिया जाता था। पाया गया कि इन सिनेमाघरों में पापकार्न की बिक्री ब़ढ गयी। अनजाने ही लोगों में पापकार्न खाने की इच्छा उत्पन्न होने लगी। इसी प्रकार विज्ञापनों के माध्यम से कम्पनियां उपभोक्ताआें के मन में खपत की इच्छा पैदा कर रही हैं। मान लीजिये बच्चे के अचेतन में लड्‌डू प़ूडी खाने की इच्छा बैठी हुयी है। परंतु विज्ञापनों के प्रभाव से वह नूडल खाने लगता है । ऐसी खपत कंपनी के लिये लाभप्रद होती है, परंतु खपतकर्ता के लिये नहीं। उसके अन्तर्मन में बैठी इच्छायें विद्रोह करती हैं और नूडल खाने के बाद भी बच्चा अतृप्त रहता है। अचेतन इच्छाआें का दमन अनेक रोगों को पैदा करता है जैसे पूजाघर में स़ड रहा फल अगरबत्ती की सुगंध को दूषित कर देता है। दरअसल दबी हुयी इच्छायें व्यक्ति को शांति से बैठने नहीं देती हैं। यही अस्थमा, ब्लडप्रेशर, मोटापा एवं चर्म आदि रोगों के रूप में मनुष्य के जीवन में अभिव्यक्त होती हैं।

दुर्भाग्य है कि आधुनिक अर्थशास्त्र को इस बात की कोई परवाह नहीं है कि व्यक्ति चाय पीना चाहता है कि शीतल पेय ? अर्थशास्त्र के लिये शीतल पेय की खपत होना विकास का पर्याप्त प्रमाण है। शीतल पेय पीकर व्यक्ति बीमार प़ड जाये तो उपचार में किये गये खर्च से सकल घरेलू उत्पाद में और वृद्धि की गणना की जाती है। पाया जाता है कि जो देश खपत में ऊपर हैं वे अकसर सुख में पीछे हैं। समाजशास्त्रियों द्वारा ‘सुख के सूचकांक’ की गणना की गयी है। पाया गया कि बंगलादेश एवं नाइजीरिया जैसे गरीब देश सुख के शीर्ष पर थे। इससे सिद्ध होता है कि विकसित देशों की उंची आय और उंची खपत दुखोन्मुख है। इसके नेपथ्य में अचेतन इच्छाआें का दमन है। खपत में वृद्धि हासिल करने के लिये अचेतन मन की इच्छाआें को मन के तहखाने में बंद कर दिया जा रहा है जहां वे दुखी रहती हैं और मनुष्य में बेचैनी बनाये रखती हैं।

आज नदियों के बादशाह भारत में सभी नदियों को जल विद्युत उत्पादन के लिये बांधा जा रहा है। अर्थशास्त्रीय सोच है कि इससे जनता को टेलीविजन और फ्रिज चलाने को बिजली की खपत में वृद्धि होगी और वह सुखी होगी। विचार है कि नदियों के दोनों तटों पर तटबंध बना दिये जाने चाहिये। इन तटबंधों का उपयोग हाइवे के रूप में किया जाना चाहिये।

इससे ढुलाई का खर्च कम होगा और माल की खपत ब़ढेगी। नदियों के पानी को पूर्णतया सिंचाई के लिये निकाला जा रहा है। दिल्ली में जमुना गन्दे नाले में तब्दील हो चुकी है, चूंकि उसमें पानी नहीं है। सोच है कि सिंचाई में विस्तार से गन्ने और अंगूर जैसी कीमती फसलों का उत्पादन होगा। गन्ने का रस पीकर जनता को सुख मिलेगा। परंतु विद्वान अर्थशास्त्री इस बात की अनदेखी करते हैं कि नदियों के अस्तित्व और उनके सौंदर्य दर्शन से भी सुख की प्राप्ति होती है। जैसे मनुष्य पृथ्वी पर पलता है वैसे ही नदियों में मछली, केंचुये, म़ेढक, कछुये इत्यादि अनेक प्रकार के जीव पलते हैं। इन अनमोल निरीह प्राणियों को फलते फूलते देखकर जनता सुखी होती है। देश का दुर्भाग्य है कि अर्थशास्त्रियों द्वारा नदियों द्वारा प्रदान किये जा रहे इस सुख की गणना नहीं की जाती है।

मनुष्य के आन्तरिक सुख की अवहेलना करके हम घाटे का सौदा हाथ में ले रहे हैं। बिजली बनाकर फ्रिज चलाने से सुख में जो वृद्धि होती है उससे ज्यादा ह्रास नदियों के नाले में परिवर्तित होने, उसमें पल रहे जीवों के खत्म होने तथा सौंदर्य समाप्त होने से हो रहा है। अतः भारत सरकार को अर्थशास्त्रियों की ऐसी सलाह को सजग होकर क्रियान्वित करना चाहिये। देखना चाहिये कि प्रस्तुत खपत का प्रारूप अचेतन मन और सौंदर्य को सुख देने वाला है अथवा आहत करने वाला ? यदि आहत करने वाला है तो उसपर तत्काल विराम लगा देना चाहिये। सरकार को सस्ते कप़डे के उत्पादन के लिये कऱोडों जुलाहों को बेरोजगार नहीं बनाना चाहिये। परमाणु से सस्ती बिजली बनाने में परमाणु अस्त्रों के फैलाव को प्रोत्साहन नहीं देना चाहिये। आर्थिक विकास दुखदायी नहीं होना चाहिये।

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