तालिबान को भारत की ओर झोंकने की कोशिश
कुछ विचारवान लोगों ने आशंका प्रगट की है कि जिस प्रकार १९४७ में विभाजन के समय और बांग्लादेश के उदय के बाद भारत पर आबादी का बोझ ब़ढा है, वैसा ही कुछ फिर हो सकता है। इसका कारण मानी जा रही है पाकिस्तान की वर्तमान स्थिति। वहां तालिबानों का ब़ढता प्रभाव ब़डी संख्या में पाकिस्तान के पंजाब और सिंध से पलायन कर भारत में शरण लेने के लिए बाध्य कर सकता है। विभाजन के कारण धार्मिक आधार पर घृणा और अनाचार के कारण जिन लोगों ने भारत में आना बेहतर समझा उनमें पश्चिम और पूर्वी पाकिस्तान दोनों ही इलाके के लोग थे। बांग्लादेश बनने के बाद जो गैरकानूनी तरीके से लगभग पांच कऱोड लोग आकर देशबर में पसर गए हैं उनको निकालने के सर्वोच्च न्यायालय तक के आदेश के बावजूद भारत सरकार कुछ नहीं कर सकी है। असम के लगभग आधे और बिहार के कुछ सीमावर्ती जिलों में इनके कारण आबादी का संतुलन बिग़ड गया है, जो इस समय देश की प्रभुसत्ता के लिए चुनौती बनता जा रहा है। जो भूभाग इस समय पाकिस्तान के नाम से पहचाना जाता है उसने भारत में त़ोडफ़ोड और उपद्रव के लिए अपने प्रयास में कोई ढील नहीं दिया है, इस बात को भारत सरकार के सभी तंत्र स्वीकार कर रहे हैं।
यदि पश्चिमी देशों के समाचारों पर भरोसा किया जाए तो पाकिस्तान अपनी मुसीबत से छुटकारा पाने के लिए तालिबानियों को भारत की ओर ब़ढने के लिए निरंतर प्रेरित कर रहा है। अमेरिका के रक्षा मंत्री राबर्ट गेर की चेतावनी इस संदर्भ में काफी महत्वपूर्ण है। पाकिस्तान अपने घर की आग को भारत की ओर झोंकने का हर संभव प्रयास कर रहा है। जहां एक ओर पाकिस्तान से घुसपैठियों की संख्या में इजाफा हो रहा है, वहीं हमारी अपनी व्यवस्था लचर होती जा रही है।
हम न केवल आतंकियों को न्यायालय के फैसले के बावजूद दंडित करने में वोट बैंक की राजनीति के चलते हिचकिचा रहे हैं, बल्कि देश में उनके एजेंटों की संख्या ब़ढा रहे हैं। यह बात न केवल जम्मू के श्योपुर और बंदीपुर में पच्चीस से अधिक आतंकियों के छिपेे होने संबंधी वहां के पुलिस प्रमुख के बयान से स्पष्ट हुई है बल्कि भारत सरकार की नाक के नीचे नई दिल्ली में इस वर्ष के प्रारंभ में अस्पताल ले जाते समय तीन आतंकियों का जो पाकिस्तानी नागरिक हैं फरार हो जाना तथा अब तक गिरफ्तार न होने से भी साबित होती है। यदि उनको स्थानीय लोगों की पनाह नहीं मिली होती तो अब तक वे गिरफ्तार हो चुके होते। हिरासत से भागने और फिर गिरफ्तार न होने की यह पहली घटना नहीं है। दो वर्ष से अधिक हो रहा है जब उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ की अदालत से दो आतंकी भाग निकले थे। उन्हें शौचालय में रखा गया रिवाल्वर भी मिला और एक आटो जिसने उन्हें भ़ीड भरे इलाके से बाहर ले जाकर छ़ोड दिया।
आज तक उनका सुराग नहीं मिला है। हमें स्मरण होगा कि दो वर्ष पूर्व मोहाली में भारत पाकिस्तान क्रिकेट मैच देखने आये पाकिस्तानियों में से सौ से अधिक के वाघा बार्डर से वापसी का सूबत नहीं मिला, वे कहां गए और किन लोगों ने उन्हें भारत में गुम हो जाने में सहायता दी?
पाकिस्तान २६/११ की घटना के बाद आतंकियों के भारतीय मददगार होने का आरोप लगा रहा है। पिछले दिनों नई दिल्ली में आयोजित भारत पाक शांति सम्मेलन में लाहौर के एक वकील एजाजुल अहसान ने जब यह कहा कि पाक आंतकियों को भारतीय हस्तकों की मदद मिल रही है, तो कुछ ‘‘बुद्धिजीवी’’ भ़डक उठे और उनके कथन को पाकिस्तान का सरकारी आरोप तक कह डाला, लेकिन अब तक देश भर में पाक आतंकियों का सहयोग देने के मामले में जो हजारों लोग गिरफ्तार हो चुके हैं उसको नजरंदाज नहीं किया जा सकता। नेपाल, बांग्लादेश और म्यांमार के रास्ते जाली नोट तथा घुसपैठ बिना स्थानीय सहयोग के भारत नहीं आ सकते। इसके भी प्रमाण मिल चुके। सुरक्षा बलों और खुफिया सूचनाआें पर भरोसा किया जाए तो पाकिस्तान परस्ती के कारण सीमा से अधिक भीतरी असुरक्षा की समस्या है। इसको नियंत्रित करने के रास्ते में तथाकथित मानवतावादी एवं जनवादी संगठनों के प्रचार का असर सरकार की कार्यवाही पर तो प़ड ही रहा है, सरकारी नीतियां भी ऐसी पृथकता भावना को उभारने का काम कर रही है, जो हस्तक बनने के लिए प्रेरित कर सके। पाकिस्तानियों को फर्जी पासपोर्ट उपलब्ध कराने आदि के मामले में जो लोग पक़डे जा रहे हैं वे सभी स्थानीय हस्तक नहीं तो और कौन है?
मार्च के महीने में हरिद्वार में एक ‘एकीकृत राष्ट्रीय सुरक्षा’’ सम्मेलन होने जा रहा है। उसके लिए सेना के एक वरिष्ठ अवकाश प्राप्त अधिकारी को जब हम आमंत्रित करने पहुंचे, तो वे फूट प़डे। कहने लगे इन सम्मेलनों से कुछ नहीं होगा? क्या हमने कभी विचार किया कि अमेरिका में ट्रेड सेंटर और पेंटागन पर हुए हमले के बाद फिर कोई घटना क्यों नहीं हुई और हमारे देश में एक दशक से अधिक समय से भयावह घटनाआें की पुनरावृत्ति क्यों होती जा रही है? उन्होंने स्वयं ही इसका उत्तर दिया। कहाअमेरिका ने इसके लिए उत्तरदायित्व निर्धारित कर दिया है। जबकि हम वोट बैंक की राजनीति में उलझे हुए हैं। उन्होंने और स्पष्ट किया। कहाअमेरिका ने सभी मस्जिदों के इमामों को उस इलाके में रहने वालों के लिए जिम्मेवार मान लिया है, क्योंकि प्रत्येक मुस्लिम किसी न किसी मस्जिद से अवश्य ज़ुडा है। अब तक दो सौ से अधिक इमामों को उनके इलाके में संदिग्ध घटनाआें के कारण अमेरिका से निकाला जा चुका है। इसलिए अमेरिका घटनामुक्त है। यहां यह स्पष्ट कर देना उचित होगा कि उक्त अवकाश प्राप्त सेना के अधिकारी स्वयं मुसलमान हैं और मूलतः रामपुर निवासी हैं। उनका सुझाव था कि भारत की सभी मस्जिदोंमंदिरों एवं चर्च आदि के प्रमुखों को उनसे संबद्ध नागरिकों की गतिविधियों के जिम्मेदार मानना चाहिए, क्योंकि उनके इलाके में नए आगंतुक या पुरानों की हरकतों की उन्हें पूरी जानकारी होती है। उन्होंने कहा कि जिस दिन से ऐसी निगरानी लागू हो जाएगी पाकिस्तानियों को भारतीय एजेंट मिलने बंद हो जायेंगे।
देश की सुरक्षा के लिए ऐसी इच्छाशक्ति आवश्यक है। यह कहना कठिन है कि भारत जैसे विशाल देश में ऐसी व्यवस्था कितनी व्यावहारिक होगी, क्योंकि जहां तक मंदिरों का सवाल है उससे लोगों का वैसा संपर्क नहीं है जैसा मस्जिदों या चर्च का। उनकी भी संख्या इस देश में अमेरिका के मुकाबले कई सौ गुना अधिक है, लेकिन उक्त ब्रिगेडियर की अभिव्यक्ति से यह तो स्पष्ट होता ही है कि समाज के भीतर एजेंट बनने की संभावनाआें पर नजर रखने से अंकुश लग सकता है। कम से कम इस मामले में तथाकथित बुद्धिजीवियों और मानवाधिकारवादियों के प्रचार अभियान के प्रभाव से तो बचना ही होगा। हस्तकों के विरुद्ध कार्यवाही को ‘‘नागरिक स्वतंत्रता’’ के दायरे में लाकर जो कुछ किया जा रहा है वह वस्तुतः उसका दुरुपयोग ही है जो हमारी आंतरिक सुरक्षा को खोखला कर रही है। इसलिए संभव है कि देश के विभाजन के समय या बाद में बांग्लादेश से आबादी के भातर में पलायन के समान पाकिस्तान पर तालिबानियों के पूर्व नियंत्रण से वहां की आबादी का भारत पलायन पूर्व जैसा न हो, लेकिन पाकिस्तान के बाद भारत को तालिबानी हुकूमत में लाने के दावे के बाद समयसमय पर उनके ही फरमानों के अनुरूप जो फतवे जारी रहते हैं उनसे तो यही संकेत मिलता है कि जाने अनजाने भारत में तालिबानी प्रभाव ब़ढाने का अभियान जोर पक़ड रहा है। इस अभियान के खिलाफ भी आवाज उठ रही है, लेकिन वोट बैंक की राजनीति उसे उभरने नहीं दे रही है। आवश्यक है सुरक्षा को प्राथमिकता देकर नीति निर्धारण
