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माओवादियों की वार्त्ता की पेशकश

Swatantra Vaartha  Thu, 25 Feb 2010, IST

माओवादियों की वार्त्ता की पेशकश

केंन्द्र सरकार नसलियों या माओवादियों के साथ बातचीत के लिए तयार है , लेकिन बातचीत का ताव बिना किसी शत के होना चाहिए। गहमी पी चिदबरम का कहना है कि अगर नसली हिंसा छोडने के लिए राजी है, तो वे भी बातचीत के लिए राजी है, बस नसली नेताओं को चाहिए कि वे एक सीधा सा बयान गहमालय को फस कर दें। हा, बातचीत के ताव के पीछे कोइ शत नहीं होनी चाहिए। माओवादी नेता किशनजी ने एक बयान में सरकार के साथ बातचीत का ताव किया था, लेकिन उसके साथ यह शत जुडी थी कि २५ फरवरी से ७ मइ तक ७२ दिनों के लिए सरकार अपनी पूरी आकामक कारवाइ थगित कर दे। उहोंने ऐसा कोइ कारण नहीं बताया कि उहें ७२ दिनों का समय यों चाहिए। वे इसके पहले बातचीत की मेज पर यों नहीं आ सकते।

ऐसा समझा जाता है कि माओवादियों का वाता ताव उनकी मा एक कूटचाल है। नसल भावित विभि रायों में एक साथ शु की गयी सुरक्षा बलों की सयुत कारवाइ से इस समय वे भारी दबाव में है। इधर दोतीन महीनों के लिए उहें खास तार पर राहत की जरत है। यह पतझड का मासम है, जिसके दारान जगल के पेड पाधे पहीन हो जाते ह। यह वह समय ह, जब जगल में छिपकर इधरउधर जाना मुकिल हो जाता ह। पहीन वन में कहीं भी उहें आसानी से देखा जा सकता है। यदि ऐसे समय किसी तरह पुलिस की कारवाइ रोकी जा सके, तो वे फिर अपने को सगठित कर सकते है।

यहा यह उलेखनीय है कि माओवादियों का एक वग पहले से ही बातचीत का इछुक ह। माओवादी नेता गोपीनाथ या दुगा हेमराम कइ दिन पहले से वाता के पक्ष में बयान दे रहे थे। किशनजी ही वाता के लिए तयार नहीं थे। किंतु दो दिन के गहन विचारविमश के बाद वह भी बातचीत के लिए तयार हो गये, लेकिन इसके पूव उहोंने ७२ दिन की युविराम की शत रखी। अब सरकार ने अपनी थिति साफ कर दी है आर गेंद फिर माओवादियों के पाले में डाल दी है। अब उहें तय करना है कि वे बातचीत करना चाहते है या नहीं। ऐसे में एक बात तो पट है कि माओवादी हिंसा का परियाग करके बिना शत वाता का कोइ लिखित ताव तो सरकार को नहीं भेज सकते है,

योंकि इसका अथ होगा माओवादी आदोलन का पूरी तरह आमसमपण। सरकार वतुत: उनसे अपना आमसमपण ही कराना चाहती है, किंतु आज की थिति में यह आशा नहीं की जा सकती कि माओवादी अपने पूरे सघष का अत करके सरकार के समक्ष दया की याचना करने आ जाएगे। यह हो सकता ह कि वे वाता के लिए कोइ शत न रखें, लेकिन वे सरकार की यह शत भी योंकर मानने के लिए तयार हो सकते है कि पहले वे हिंसा छोडें, फिर बातचीत के लिए आगे आए।

सरकार वय यह मानती ह कि नसलवाद एक सामाजिक समया ह, कोइ आपराधिक या कानून यवथा की समया नहीं, तो सरकार को कम से कम उन सामाजिक समयाआें को दूर करने या कम से कम उहें दूर करने की पहल करने का तो आवासन देना ही चाहिए। वे हिंसा छोडे तो किसलिए ? या केवल वाता की मेज पर आने के लिए ? ऐसा लगता है कि वाता के ति शायद दोनों ही पक्ष गभीर नहीं है।

माओवादी वाता के बहाने कुछ समय की राहत चाहते है, तो सरकार चाहती ह कि वे वाता के पहले ही आमसमपण कर दें। यदि वे वातव में वाताआें के इछुक ह, तो उहें पहले मयथों के मायम से बात को आगे बढाना चाहिए। आखिर ये माओवादी सरकार से या चाहते है। उनके सश आदोलन का लय या है । सरकार को भी बताना चाहिए कि वह उनकी मागों को कहा तक मान सकती ह या उनके लयों के ति कहा तक सहमत ह। किसी तर तक यदि कोइ मायमिक सहमति बनती है, तो आगे उस पर सीधी बातचीत शु हो सकती ह। देखना ह गहमी के ताजा ख पर अब माओवादी आगे या जवाब देते है।

भारतपाक वार्ता की सारथकता पर संदेह

एक के बाद एक घट रही आतकवादी घटनाओं के दबाव के कारण यह तय है कि २५ फरवरी को दिली में होने जा रही भारतपाक विदेश सचिवों की वाता में आतकवाद ही मुय मुा रहेगा। भारत तो पहले से ही इस वाता को आतकवाद केति ही रखना चाहता था, जबकि पाकितान की लगातार कोशिश थी कि आतकवाद को दरकिनार करके अय बातों पर पहले चचा हो। अभी भी पाकितानी नेता यही कहते आ रहे ह कि वे ऐसी किसी वाता में नहीं शामिल होना चाहते, जिसका कोइ परिणाम ही न निकलने वाला हो। वह अभी भी उस समग वाता को ही पुनर्जीवित करना चाहता है, जो मुबइ हमलों के बाद ठप हो गयी थी। किंतु उसके लिए अब आतकवाद के मुे से बचना मुकिल हो गया ह। पुणे के विफोटों के बाद ताजा घटना पाकितान में दो सिखों की सिर काटकर हया कर दिये जाने की सामने आ गयी ह। इस हया के कारण भारत में, विशेषकर राजधानी दिली में पाकितान के ति भारी रोष का वातावरण है।

पाकितान के जिहादी सगठन अभी भी भारत के वि जिहाद की घोषणाए करते आ रहे है। भारत सरकार ने बारबार पाकितान सरकार से यह कहा ह कि यदि वह अपनी धरती पर भारत विरोधी तवों पर भावी अकुश लगा सके, तो भारत भी उसके साथ कोइ साथक वाता शु कर सके। अब यह वाता साथक हो या निरथक, किंतु वाता तो होनी ही ह, योंकि इसके लिए दोनों पक्ष अब तयार है, लेकिन यह भी तय ह कि इस वाता से कोइ लय पूरा होने वाला नहीं है, योंकि न तो पाकितान अपनी धरती पर सकिय जिहादी सगठनों पर कोइ अकुश लगा सकता ह आर न भारत आतकवाद के इस मसले की अनदेखी कर सकता है ।


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