आमिर से असहमति की वजह
इसमें कोइ दो मत नहीं कि आमिर खान एक बेहतरीन अभिनेता है । बालीवुड ‘मिटर परफेशनिट’ के नाम से मशहर आमिर वाकइ ऐसेे अभिनेता है जो अपने हर किरदार को पदे पर बखूबी जीते है । दूसरे लोगों की तरह म खुद भी आमिर खान के शसकों की जमात मे शामिल है । इसे मनोवज्ञानिक वजह माने या फिर कोइ कारण लेकिन हम जिसे पसद करते है , उसकी गलत बात को भी असर नजरअदाज कर देते ह या फिर यू कहें कि हमें उसकी खामिया दिखाइ ही नहीं देती। लेकिन कापीराइट के मसले पर अपने इस पसदीदा अभिनेता के तक गले के नीचे नहीं उतरे। आमिर खान यदि ऐसा सोचते है कि गाने की लोकयिता में गीतकार का कोइ खास योगदान नहीं होता तो ये बात चाकाने वाली लगती ह। इतना ही नहीं आमिर का कहना ह कि गाने इसलिए हिट होते ह, योंकि इसे बडे सितारों पर फिमाया जाता है । मुा ये नहीं ह कि गीतकार आर अभिनेता में बडा कान है । सवाल ये है कि हम खुद के काम की तुलना में दूसरे के काम को कम करके कसे आक सकते ह। अगर गीतकार के शदों में जान ह तो उसका जादू दशकों के सिर चढकर बोलेगा। अगर फिम सितारों की वजह से ही गाने हिट होते तो फिम रिलीज होने के पहले ही कुछ गाने कभी हिट नहीं होते। इतना ही नहीं आज भी बहत से पुराने फिमी गीत ऐेसे है जिहें हम असर गुनगुनाते ह या फिर उस पर झूमते नजर आते ह, लेकिन कइ बार हमें ये पता नहीं होता कि ये गाना किस फिमी सितारे पर फिमाया गया है । या मशहर डायलाग के बिना ‘शोले’ जसी फिम हिट हो सकती थी?
ये बात ठीक है कि जो दिखता है वो बिकता है , लेकिन पदे के पीछे काम करने वाले लोगों की भूमिका को नजरअदाज नहीं किया जा सकता। वसे आमिर जसे अभिनेता को ये समझाना गलत होगा कि फिम बनाने के लिए साझा कोशिश की जरत होती ह। फिम निमाण में अभिनेता आर निमातानिर्देशक की भूमिका के साथ ही गीतकार आर सगीतकार की भूमिका भी उतनी ही मायने रखती ह। बात यही आकर नहीं कती फिम में कमरामन से लेकर मेकअप आटिट आर तमाम छोटेछोटे तकनीशियनों की भूमिका को भी कम करके नहीं आका जा सकता।
असर दशक अपने अभिनेताआें के टट सीन को देखकर तालिया पीटते है आर हीरो की वाहवाही करते ह, लेकिन उस आदमी के हिसे में चद पसे ही आते ह जो हीरो की जगह जोखिम भरे इस काम को अजाम देता ह। अभी कुछ दिनों पहले ही ‘थी इडियटस’ की कहानी को लेकर भी बवाल मच गया था। उस व मशहर लेखक चेतन भगत ने आरोप लगाए कि फिम में उनको समुचित श्रेय नहीं दिया गया। चेतन भगत का कहना था कि फिम की कहानी उनके उपयास ‘फाइव वाइट समवन’ से बहत मिलती ह इसलिए फिम की कहानी में उनको भी श्रेय मिलना चाहिए। चेतन का कहना ह कि फिम में कहानी का श्रेय अभिजात जोशी आर राज कुमार हिरानी को दिया गया, जबकि उनका नाम फिम के अत में ‘रोलिंग केडिट’ में दिया गया। ‘थी इडियटस’ फिम के निर्देशक राजकुमार हिरानी का कहना था कि उहोंने चेतन भगत की कहानी चुराइ नहीं ह, बकि हमने उनसे अधिकार खरीदे ह। लेकिन बात कहानी के अधिकार लेने की नहीं, बकि लेखक को उसका उचित श्रेय देेने की है ।
गीतकार जावेद अतर आर फिम अभिनेता आमिर खान के बीच कापीराइट के मसले पर बहस की जो बातें सामने आइ, उसने बालीवुड में पदे के पीछे की कडवी हकीकत को एक बार फिर सामने ला दिया ह। दरअसल बालीवुड में ये दरार उस व उभरकर सामने आइ जब पिछले साल दिसबर २००९ में केींय कबिनेट ने १९५७ के कापीराइट एट में सशोधन को मजूरी दे दी। इसमें सगीत, सिनेमटोगाफी आर साहियिक रचनाआें का कमशियल इतेमाल करने पर रचनाकारों को रायटी देने की बात कही गइ थी। कबिनेट के इस फसले से जब फिम निमाताआें को अपनी कमाइ में सेंध लगते दिखी तो उहोंने तावित सशोधनों को लेकर मानव ससाधन मी कपिल सिबल से मिलकर इस पर चिंता जताइ। इसके बाद से मालय ने कापीराइट एट में सशोधनों पर विचार कर सुझाव देने के लिए एक दस सदयीय कमेटी का गठन कर दिया जिसमें आमिर खान के अलावा जावेद अतर, बोनी कपूर, मुकेश भटट, विशाल भाराज आर सून जोशी जसे लोग शामिल ह। फिम के लेखकों आर गीतकारों की शिकायत ये ह कि उहें फिमों की कामयाबी से कोइ आथिक लाभ नहीं होता, योंकि उनके लिखे गानों की रायटी सिफ निमाताआें आर यूजिक कपनियों को ही मिलती ह। फिम रायटस एसोसिएशन आफ इडिया भी इस मसले पर लेखकों के हितों का याल रखने के लिए कइ बातों पर विचार कर रही है । लेकिन हिट फिमों से होने वाली मोटी कमाइ के हक को लेकर बालीवुड का बिखरना फिम इडटी के लिए शुभ सकेत नहीं कहा जा सकता।
फिम निमाताआें का तक ह कि फिमों में पसा आखिर उहीं का लगा ह आर उनकी सोचसमझ का यादा महव ह, लेकिन या ये सच नहीं ह कि बालीवुड में बडे बजट आर बडे सितारों को लेकर बनाइ गइ कइ मसाला फिमें भी पिट जाती ह आर मझोले बजट की फिम ‘खोसला का घोसला’ अछी कमाइ कर लेती ह। इस फिम में न तो माजूदा दार का कोइ कोइ बडा अभिनेता था आर न ही इसका कोइ बडा बजट था, लेकिन फिर भी फिम ने अछा यवसाय किया।
दरअसल, अब फिम की कहानी हो या फिर उसका गीत, दशकों के झान में तदीली आइ ह आर दशक हकीकत के नजदीक आर यावहारिक सिनेमा को यादा पसद करने लगा ह तो या ऐसे मे अछे लेखक आर गीतकार के बिना बालीवुड अपनी कामयाबी की कहानी लिख सकेगा। गुलजार आर जावेद अतर के अलावा भी आज बालीवुड के पास सून जोशी जसे गीतकार ह जिहोंने एक बार फिर हम लोगों के सामने ‘मती की पाठशाला’ गीत के जरिए दिमाग में धुधले पड गए पाठशाला जसे शद को एक बार फिर जीवत बना दिया। ‘रग दे बसती हो’ या फिर ‘तारे जमीन पर’ या इन फिमों के गीत में सून जोशी की कलम को नजरअदाज किया जा सकता ह। तमाम अयाधुनिक टेनोलाजी के चलते फिम निमाण आसान हो गया ह आर इससे हम फिम मे कइ इफेट तो दे सकते ह, लेकिन या इस टेनोलाजी की मदद से कोइ कहानी या गीत लिखा जा सकता ह ? इसके लिए तो हमे लेखकों आर गीतकारो की ही जरत होगी। तमाम तकनीकों के बाद भी फिम निमाण एक रचनामक कारोबार ह आर इसके लिए एक बेहतरीन कहानी आर दिल को छूने वाले गीतों की जरत हमेशा रहेगी, इसलिए कोइ भी फिम रचनामक काया] से जुडे लोगों के बिना पूरी नहीं हाेे सकती। जरत इस बात की ह कि कापीराइट के मसले पर बालीवुड से जुडे लोग सोचसमझकर आर आपसी सहमति से कोइ फसला ले, ताकि पसे की लडाइ में रचनामकता हाशिए पर न आए।
