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वैश्विकरण युग में हिंदी का बोलबाला

Swatantra Vaartha  Wed, 24 Feb 2010, IST

वैश्विकरण युग में हिंदी का बोलबाला

यूरोप में अब हिंदी खूब पढी जाती है। वहा हिदी में नातक करने वाले छााें की सया में लगातार व हो रही है। यह लदन विववािलय में हिंदी की ाेफेसर फचेका ओरसिनी का कथन है। अमेरिका में हिंदी के ति लगाव के समाचार पुराने हो चुके ह। वहा के विभि विववािलयों में हिदी अयापन के लिए भारत से वािनों को आमति किया जा रहा है। देश के विकास की गति देखते हए इस वविकरण युग में भारत के साथ ठोस सबध आज विकसित देशों की भी जरत है। सबध में आमीयता का आधार ह भाषा। भारत में हिंदी के महव को देशीविदेशी कपनियों ने बखूबी समझा ह। परिणाम वप उहोंने विज्ञापनों में हिंदी का कलामक योग कर लोकयिता के कीतिमान थापित किए। यहा तक कि टी वी पर विभि इलिश चनलों पर विज्ञापन हिदी में आते ह। निचित ही यह बाजारवाद में हिंदी की उपयोगिता का चमकार है। जो अनायास ही सारे देश को एकता के सू मे आर ыढता पूवक बाधता ह। उपादों के हिदी विज्ञापनों के लुभावने बोल हर देश के बों की जुबान पर ह। यह सुखद थिति मुध करती है।

हिदी का यावसायिक महव अब दक्षिण भारत के आम जन भी वीकार रहे ह आर जागक युवा वग उसाह के साथ हिंदी के नजदीक आ रहे है। राजनीति की रोटी सेंकने के लिए हिंदी विरोध का इतेमाल इधन के प में करने का नुखा अपनी एसपायरी डेट पार कर चुका ह। यह विकास के महादार का यथाथ है। अब शायद ही कोइ राजनीतिबाज यह घिसापिटा नुखा अपनाने की आवयकता महसूस करे। योंकि इधर देश की जनता तीव गति से अपनी परिपता दशा रही है। भाषा हो या राजनीति अथवा विचार। वह थोपा जाना कदापि वीकार नहीं करेगी। अलबाा उपयोगिता देखते हए सहष अपनाएगी। यही आधुनिकता ह आर गतिशीलता भी। हिंदी भाषा के ज्ञान से रोजगार में उपलधि की सभावनाए आज प गाेिचर ह। अत हर गतिवादी का हिंदी ेम सहज वाभाविक है।

आज हिदी मजबूरी नहीं, जरत ह। हिंदी का ज्ञान लाभ का सरल सादा है। लोगों में यह विवेक जागत हो चुका है। किंतु शासनिक तर पर हिदी की थिति आर सुढ करने के लिए ठोस इछा श के साथ आमीय सवाद थापित करने की परम आवयकता है। किंतु लगता ह मशीनी कायवाही आर कागजी खानापूति से ऊबना फिलहाल शासकोंशासको को मजूर नहीं। यह सूरत बदलने के लिए अहिंसक वतता आदोलन तर के आदश, निरापद जन अभियान की जरत ह। ऐसी शातसाविक साधना तनाववादी राजनेेता शायद ही सि कर पाए।

यानी इस बाबत जिमेदारी उठाने का शुभारभ साहियकारों, समाजसेवकों, कलाकारों को करना होगा। जागक जनता साथ देगी ही, इसमें सदेह नहीं। किंतु एक पेंच अवय है। या भि देशों की विभि भाषी साहियिक, सामाजिक आर कलाकार हतिया सरकारी विभागों में अगेजी की जगह हिदी को थापित करने के लिए उदार दय से एक मच पर आएगी ? वसे देश के वाभिमान के इस मुे पर बुजीिवी, डाटर, वकील, इजीनियर आदि भी पहल कर सकते है।

हिदी के चार सार में सिनेमा, टीवी चनल जितनी ही महवपूण भूमिका अखबारों की है। साहिय के ति जनता का झान भले ही सीमित हो। किंतु समाचारों के ति जन जिज्ञासा उाराेार बढती जा रही है। टीवी पर यक्ष देखने सुनने की सुविधा की अपनी सीमा ह आर छपे हए के ति विवास की परपरा बहत पुरानी । अतएव शिक्षितअपशिक्षित हर य निरतर अखबार के सपक में रहता ह। अधिकतर हिंदी अखबार पाठकों को साहिय भी उपलध कराने का पकारीय कतय निभा रहे ह। गार करें तो हिदी दिवस मनाना मजाक सा लगता ह। इधर देश ही नहीं विव भर में तिदिन, हर घटे, हर घडी हिदी को मन में बसाया जा रहा ह। तो हम कब तक यह आपचारिक हिदी दिवस मनाते रहेंगे !

हलाद श्रीमाली

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