अभी तो घर की सफाई में ही वक्त लगेगा
नितिन गडकरी के राष्ट्रीय राजनीति में दाखिले का समारोह उनके जीवन की सबसे यादगार घटना होगी। कुछ ऐसा लग रहा था कि मुंबई की कोई ब़डी फिल्म कंपनी अपने नए स्टार को पहली बार पूरे तामझाम के साथ पब्लिक के सामने पेश कर रही है। इंदौर में रंगबिरंगे टूरिस्ट तम्बुआें के नगर को आसपास रहने वाले उत्सुक सांपों के खतरे से सुरक्षित रखने के लिए संपेरोंं का प्रबंध तो करना ही था, लेकिन जो जिम्मेदारी गडकरी ने उठाई है, उसमें कितने खतरे हैं, इसका शायद उन्हें अभी अंदाज नहीं है। विकास और सुशासन की ब़डीब़डी बातों की बात फिलहाल छ़ोड दें तो भी छोटीछोटी बातों में ही कितना सिरदर्द होगा, पता नहीं इस पर उन्होंने ध्यान दिया है कि नहीं।
मसलन दलितों को पार्टी में आकर्षित करने का लक्ष्य ही लें। अधिवेशन स्थल पर बाबा साहेब अम्बेडकर का चित्र टांगना अच्छा प्रतीकात्मक संकेत है कि भाजपा अब जातियों की दीवारों को लांघना चाहती है। अम्बेडकर को बुद्ध की तरह हिंदू समाज के महापुरुषों की मुख्य श्रेणी में शामिल करने का प्रयास कई सालों से होने लगा है। अम्बेडकर केवल ब्राह्मण विरोधी ही नहीं, कुछ और भी थे, यह एहसास अब बहुत से सवणा] को होने लगा है। लेकिन इसके लिए मायावती की बहुजन समाज पार्टी के उदय की आवश्यकता प़डी। बसपा के डर से ही सही, पार्टियां जातिवाद के निचले पाए को समझने का प्रयास तो करने लगी हैं। दलित जातियों को वृहत समाज में लाने और उचित सम्मान दिलाने के लिए महात्मा गांधी ने सेवा का रास्ता अपनाया था। राजनीतिक दल इस रास्ते का अनुसरण तो करने से रहे, वे राजनीति और सत्ता में हिस्सेदारी की ही बात कर सकते हैं। लेकिन उसके लिए भी किसी हद तक सामाजिक चेतना की आवश्यकता होगी।
भाजपा के नए कार्यकर्ता भी तो उसी समाज से आते हैं। उन्हें अपने आपको भी बदलना होगा। बरसों पहले एक पूर्व भाजपा नेता गोविंदाचार्य ने सामाजिक इंजीनियरिंग का मुहावरा ग़ढ लिया था। हालांकि मुहावरा सामाजिक रासायनिकी होना चाहिए, क्योंकि इंजीनियरिंग कोई स्थाई बदलाव नहीं होता, केवल जुग़ाड होता है, फिर भी आशय सामाजिक मनोवृत्ति में स्थाई बदलाव से ही था, लेकिन तब इस बात के भाजपा में खरीदार कम ही थे और गोविंदजी को निर्वासन का कष्ट झेलना प़डा। अब गडकरी ऐसे मौके पर आए हैं जब भाजपा ही पस्त है तो देखना यह होगा कि वे दलितों के पास क्या लेकर जाते हैं और उन्हें अपने पास कैसे लाते हैं। नए भाजपा अध्यक्ष मुसलमानों से भी हाथ मिलाना चाहते हैं। अयोध्या के विवाद को उन्होंने मुसलमानों के सहयोग से और आपसी संवाद के माध्यम से सुलझाने का प्रस्ताव रखा है, लेकिन यह कोरा राजनीतिक बयान ही लगता है । मंदिर आप बनवाना चाहते हैं उसी बाबर कालीन ढांचे पर जिसे मुसलमान मस्जिद मानते हैं। इसे इतनी आसानी से मनवाना दिवास्वप्न ही लगता है।
हिंदू मुस्लिम दुराव को केवल बाबरी मस्जिद विवाद तक सीमित रखने से दोनों सम्प्रदायों में कोई स्थाई सहमति नहीं बन सकती है। कोई भी राजनीतिक दल जब तक जातीय या साम्प्रदायिक सौदेबाजी को अपनी लोकप्रियता का आधार बनाता रहेगा तब तक साम्प्रदायिक सहमति स्थापित होना संभव नहीं है। सौदेबाजी बाजार का स्वभाव है और बाजार में ग्राहकों के बीच प्रतियोगिता होना भी स्वाभाविक होता है।
इस मामले में भाजपा कांग्रेस से हर समय एक कदम पीछे ही रहेगी। कांग्रेस से ही क्यों ? अन्य दलों से भी जो अपने आपको धर्म निरपेक्ष बताते हैं, अगर सामूहिक और साझे राष्ट्रीय हित पैदा हो जाएं तो ऐतिहासिक विवादों को समय अपने आप सुलझा देता है, लेकिन गांवों की ओर जाने की भाजपा की सलाह कुछ दिलचस्प अवश्य है। नए अध्यक्ष गडकरी ने कार्यकर्ताआें को गांवों में जाकर लोगों में काम करने से ही अपनी साख बनाने और पार्टी के प्रति निष्ठा सिद्ध करने को कहा है। सिद्धांत रूप में यह भी कोई नई बात नहीं है। हमारे नेतागण अक्सर गांधी का नाम लेते समय गांवों को याद करते ही रहते हैं, लेकिन भाजपा के लिए यह बात नई इसलिए है कि बरसों से भाजपा गांवों का रास्ता ही भूल गई थी। यह पार्टी अब शहरी पार्टी ही रह गई है।
गांवों को तो नक्सलियों, आतंकवादियों और दादाआें के हवाले कर दिया गयाथा। बिहार में विभिन्न तरह की सेनाआें की तूती बोलती थी तो आदिवासी क्षेत्रों में नक्सली गिरोहों की और राज्यों में भी गांवों में राष्ट्रीय राजनीतिक दलों की उपस्थिति केवल कुछ खडपंचों के वोट प्रबंधन तक ही सीमित रही है। गांव तो आज जातीय या साम्प्रदायिक दंगों और मारकाट के समय ही सुर्खियों में आते रहे हैं। गांवों को खतरनाक जगह बनाया गया है। ऐसे में भाजपा का यह कहना है कि वह गांवों में अपनी जमीन तैयार करेगी, साहस की या दुःस्साहस की बात है। लेकिन अगर गांवों में जाने के लिए शिब्बू सोरेन जैसों का सहारा लिया गया तो चौबेजी दुबे ही रह जाएंगे।
दिलचस्प बात यह है कि गडकरी की कार्यशैली भारतीय अर्थ व्यवस्था की तरह मिश्रित व्यवस्था ही दिखाई देती है। वे कार्यकर्ताआें और नेताआें को राजनीतिक प्रशिक्षण देने की बात करते हैं। इन्हें जन व्यवहार सिखाया जाएगा, शायद समाजशास्त्र के नियम भी बताए जाएंगे।
यह कारपोरेट प्रणाली है। कोई आपत्ति नहीं, अगर पश्चिमी अर्थव्यवस्था और जीवन पद्धति अपना ली है तो हमारे नेता समाज से उसके अनुरूप व्यवहार करना भी सीख जाएं। यह इंफोटेन्मेंट का युग जो है। फिलहाल तो उन्हें घर की साफ सफाई में ही बहुत समय लगेगा, लेकिन जो वायदे उन्होंने किए हैं उनको पूरा करने के लिए उनके पास बहुत लंबा समय नहीं है। वे २०१४ में पार्टी को केंद्र में सत्ता दिलाना चाहते हैं। चार साल में भाजपा का कायापलट हो जाए, यह तो कोई अतिआशावादी ही मानेगा लेकिन उस दिशा में पार्टी कुछ दूर तक चल प़डे यह भी बहुत ब़डी उपलब्धि होगी। अभी तो गडकरी ने २०२५ के भारत का विकास चित्र बनवाने के लिए अपने कार्यकर्ताआें और विशेषज्ञों की समिति बनाई है। देखें, उसमें क्याक्या रहता हैऔर क्या छूटता है।
