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विकास दर ब़ढेगी किन्तु महंगाई भी ब़ढेगी

Swatantra Vaartha  Fri, 26 Feb 2010, IST

विकास दर ब़ढेगी किन्तु महंगाई भी ब़ढेगी

भारतीय रिज़र्व बैंक द्वारा तैयार चालू वित्त वर्ष की आर्थिक सर्वेक्षण रिपोर्ट गुरुवार को लोकसभा में पेश की गई। आगामी वित्त वर्ष का बजट आने के एक दिन पूर्व आई इस सर्वेरिपोर्ट के अनुसार देश की आर्थिक विकास की दर अब फिर वृद्धि की ओर है, किन्तु इसके साथ मुद्रा स्फीति की दर भी ब़ढेगी यानी महंगाई की दर भी तेज होगी।

चालू वित्तवर्ष (२००९१०) में आर्थिक विकास की दर देश के सकल उत्पादक ८२५ से ८७५ प्रतिशत रहने वाली है। यह अनुमानित विकास दर (७२ से ७५ के बीच) से कहीं अधिक है। इसके बाद आनेवाले वर्ष में इसके ९ प्रतिशत तक पहुंचने की उम्मीद है। सर्वेक्षण में अनुमान लगाया गया है कि अगले ४ वषा] के भीतर विकासदर दो अंकों में पहुंच सकती है। देश की अर्थव्यवस्था का आधार काफी मजबूत है इसलिए विकासदर में वृद्धि निश्चित है, किन्तु इसके साथ देश की आमजनता को महंगाई की और मार झेलने के लिए भी तैयार रहना होगा। खाद्यानों की कीमतों की वृद्धि दर बीते जनवरी महीने में ही १७ प्रतिशत से ऊपर पहुंच गई थीं। इसके आगे और ब़ढने की ही संभावना है। यद्यपि चालू महीने में कुछ खाद्यवस्तुआें की कीमतों में पहली बार गिरावट दर्ज की गई है, लेकिन यह गिरावट अस्थाई है। यह ज्यादा से ज्यादा अप्रैल तक चल सकती है। इसके बाद इसके फिर च़ढने की संभावना है।

फिलहाल सरकार की सबसे ब़डी चिन्ता का विषय है वित्तीय घाटे को कम करना। वैश्विक मंदी के दौर में अर्थव्यवस्था को संभालने के लिए सरकार ने उद्योगों को प्रोत्साहन देने के लिए जो रियायतें दी थी तथा मदद पहुंचाई थी उसके कारण सरकार का वित्तीय घाटा सकल राष्ट्रीय उत्पादक ६८ प्रतिशत तक पहुंच गया था। अर्थशास्त्रियों की राय में वित्तीय घाटे को कभी भी ५ प्रतिशत से ऊपर नहीं जाने देना चाहिए अन्यथा दीर्घकालिक समस्याएं आ ख़डी होती हैं। वित्तमंत्री इस घाटे को ५६ प्रतिशत के स्तर पर लाना चाहते हैं। इसके लिए उन्हें निश्चय ही राहतरियायतें कम करनी होंगी तथा सरकारी खचा] को घटाना होगा। वास्तव में घाटे की स्थिति में सरकार का बाजार से लिया जाने वाला कर्ज ब़ढ जाता है। आनेवाले वषा] में इसके कारण सरकार की देनदारी ब़ढ जाती है और अर्थव्यवस्था दबाव में आ जाती है। अभी इस गुरुवार को ही १३ वे वित्त आयोग की रिपोर्ट भी सदन में पेश की गई। इसमें सलाह दी गई है कि वर्ष २०१४१५ तक सरकार को अपना कुल कर्ज जीडीपी के ६८ प्रतिशत से नीचे ले आना चाहिए। इसके लिए सरकार क्या करती है कौन से कदम उठाती है यह अब शुक्रवार को पेश होने जा रहे बजट में देखना होगा।

ममता का प बंगाल की ओर झुकाव स्वाभाविक है

रेलमंत्री ममता बनर्जी यों कहती हैं कि ‘सारे राज्य मेरी मातृभूमि हैं’ लेकिन निश्चय ही पश्चिम बंगाल उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षा की भूमि है इसलिए यदि उनका बजट प्रस्ताव पश्चिम बंगाल की तरफ झुका हुआ है तो इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं। अगले साल वहां विधानसभा के चुनाव होने हैं और राइटर्स बिल्डिंग से वाम मोर्चे की सरकार को निकाल बाहर करने का सुनहरा मौका है। इसलिए पश्चिम बंगाल को खुश करना उनका प्रमुख लक्ष्य था। लोग जानते हैं कि ममता बनर्जी ने केन्द्र सरकार में रेल मंत्रालय लिया ही इसलिए है कि इसके माध्यम से वह पश्चिम बंगाल को कुछ देकर वहां के मतदाताआें को अपनी ओर आकर्षित कर सकें। इसलिए उनका पिछला बजट भी पश्चिम बंगाल की ओर झुका था और यह नया बजट भी।

ममता ने भरसक कोशिश की है कि पूरे देश के हर राज्य को संतुष्ट किया जाए, लेकिन यह सही है कि सभी राज्यों को समान रूप से संतुष्ट करना कठिन है। किसी भी पार्टी की सरकार से आज के समय में यह अपेक्षा नहीं की जा सकती कि वह राजनीति को दरकिनार करके कोई बजट बनाएगी तो ममता बनर्जी से भी यह अपेक्षा नहीं की जानी चाहिए। उन्होंने अपने पश्चिम बंगाल के बाद सर्वाधिक ध्यान उन राज्यों की ओर दिया है जहां कांग्रेस की सरकारें हैं। पश्चिम बंगाल के बाद उनके बजट का सर्वाधिक लाभ उठाने वाले राज्य हैं महाराष्ट्र, आन्ध्र प्रदेश व राजस्थान। महाराष्ट्र और आन्ध्र प्रदेश ने तो शायद पहली बार रेल बजट की तारीफ की है और उस पर संतोष व्यक्त किया है। लंबित परियोजनाआें को पूरा करने के लिए आन्ध्र प्रदेश को ७०० कऱोड रुपये दिये गए हैंजो पिछले एक दशक में सर्वाधिक है। पहले दक्षिण मध्य रेल्वे को केवल चार परियोजनाआें के लिए औसतन २०० कऱोड मिला करता था। बजट में सिकंदराबाद में एक वैगन निर्माण कारखाना बनाने के अलावा यहां रेलवे स्पोर्ट्‌स एकाडमी स्थापित करने की घोषणा की गई है। ममता ने यहां १२ नई रेलवे लाइन बिछाने का भी प्रस्ताव किया है। राज्य से होकर २१ नयी ट्रेने चलने वाली हैं। और भी कई छोटी ब़डी परियोजनाएं राज्य के खाते में आई हैं। महाराष्ट्र में मुम्बईवासी तो इतने से ही प्रसन्न थे कि किसी तरह का किराया भ़ाडा नहीं ब़ढा, लेकिन नई ट्रेनों की सौगात उनके लिए अतिरिक्त खुशी लाने वाली सिद्ध हुई। मुम्बई के लिए १०१ नई ट्रेनों का प्रस्ताव है। जयपुर से मुम्बई व पुणे के लिए दुरंतो एक्सप्रेस से जयपुर के संगमरमर व्यापारी बहुत प्रसन्न है। महाराष्ट्र को कुल १५ नई गा़डयां मिली हैं। यहां रेवस, धरमतर व दिघी जैसे छोटे बंदरगाहों को ट्रेनों से ज़ोडने की योजना भी राज्य के लिए एक वरदान सिद्ध हो सकती है। ममता ने सोनिया गांधी और राहुल गांधी के क्षेत्र का भी खास ध्यान रखा। उन्होंने अमेठी में एक बाटलिंग प्लांट लगाने और रायबरेली तथा अमेठी दोनों जगह डायग्नास्टिक सेंटर खोलने की घोषणा की है। और जहां तक पश्चिम बंगाल की बात है तो वह तो सबसे ऊपर है ही। वहां एक और कोच फैक्ट्री, प्रशिक्षण केन्द्र, पेयजल बाटलिंग प्लांट, दो संग्रहालय एक सांस्कृतिक केन्द्र और भी जाने क्याक्या स्थापित करने की घोषणा की गई। उत्तर पूर्व के राज्यों के विभिन्न केन्द्रों को ट्रेनों से ज़ोडने की योजना है।

ममता ने योजनाआें की तो इतनी घोषणा कर दी है कि चिंता यह होने लगी हैकि इसके लिए धन कहां से आयेगा। निश्चय ही इसके लिए वित्तमंत्री व योजना आयोग पर काफी दबाव रहेगा। जो भी हो फिलहाल तो पश्चिम बंगाल के लोग खुश हैं। तृणमूल कांग्रेस के नेता कहते फिर रहे हैं कि केन्द्र में रेलमंत्री रहकर यदि ममता प बंगाल को इतना कुछ दे सकती है तो अगले वर्ष चुनावों के बाद जब वह मुख्यमंत्री बनेंगी तो राज्य के लिए कितना कुछ कर सकती हैं। मार्क्सवादी पार्टी अवश्य उनकी इन सारी घोषणाआें से बेचैन हैं। मार्क्सवादी नेता वासुदेव आचार्य ने कहा है कि ममता केवल हवा में किले बनाना जानती हैं। उनका कहना था कि यदि निजी क्षेत्र रेलवे में पूंजी लगाने के लिए आगे नहीं आता तो ममता की कोई योजना दिन की रोशनी नहीं देख सकेगी। इसमें दो राय नहीं कि इस महत्वाकांक्षी बजट में साधनों को जुटाने का कोई उपाय नहीं सुझाया गया है। रेलवे के मुनाफे में करीब ९५ प्रतिशत की कमी आई है इसलिए यदि सरकार की तरफ से अतिरिक्त वित्तीय सहायता न मिली तथा निजी क्षेत्र आगे न आया तो ममता की बहुत सी योजनाएं कागजों में ही रह जाएंगी।

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