पाकिस्तान से कोई सार्थक वार्ता हो ही नहीं सकती
भारत के प्रस्ताव पर २५ फरवरी को हुई भारतपाक विदेश सचिवों की वार्ता से एक बार फिर यह अच्छी तरह सिद्ध हो गया है कि पाकिस्तान भारत के साथ वास्तव में कोई वार्ता नहीं चाहता। जहां और जैसे भी अवसर मिले, वह केवल भारत को नीचा दिखाना चाहता है। इसके लिए उसे किसी भी स्तर पर न तो झूठ बोलने से कोई परहेज है न निंदा का कोई डर। बातचीत के लिए पाकिस्तान को दिल्ली बुलाकर भारत ने एक बार फिर अपनी फजीहत कराई।
हैदराबाद हाउस में करीब तीन घंटे चली वार्ता के बाद भारतीय विदेश सचिव निरुपमा राव ने पूरी शालीनता के साथ प्रेस को बताया कि बातचीत ब़डे सौहाद्र्यपूर्ण वातावरण में संपन्न हुई और काफी उपयोगी रही। भारत ने मुख्य रूप से आतंकवाद के मसले को उठाया और लश्करएतैयबा के नेता तथा मुंबई हमले के सूत्रधार हाफिज सईद को गिरफ्तार करने की बात की और उनके तथा अन्य पाकिस्तानी अधिकारियों के खिलाफ सबूतों के तीन ‘डोजियर’ सौंपे। इस प्रेस कांफ्रेंस के बाद पाक विदेश सचिव सलमान बशीर ने प्रेस को संबोधित करते हुए कहा कि बातचीत मुख्य रूप से कश्मीर पर केंद्रित थी और उन्होंने कश्मीर पर बहुत सी बातें की। आतंकवाद के जिक्र पर उनका कहना था कि भारत को इस मुद्दे पर भाषण देने की जरूरत नहीं है, पाकिस्तान इसे अच्छी तरह से समझता है। वह मुंबई जैसे सौ से अधिक हमले झेल चुका है। भारत केवल यह बताए कि क्या करना है। सलमान ने भारत द्वारा सौंपे गये प्रमाणों का भी मजाक उ़डाया कि सईद के खिलाफ दिये गये ये कागज सबूत कम साहित्य ज्यादा हैं।
उनके इस तरह के वक्तव्यों से भारतीय पक्ष चकित था। सलमान की बातों से आहत विदेश विभाग को यह स्पष्टीकरण देना प़डा कि पाक विदेश सचिव झूठ बोल रहे हैं। वार्ता का ८५ प्रतिशत समय आतंकवाद पर केंद्रित था। पाकिस्तान की तरफ से समग्र वार्ता शुरू करने की बात उठायी गयी, तो उन्हें बताया गया कि अभी इसका समय नहीं है, इसके लिए अभी और विश्वास का वातावरण बनाने की जरूरत है। यानी उनकी समग्र वार्ता शुरू करने की मांग नहीं मानी गयी। सलमान बशीर ने अपनी प्रेस कांफ्रेंस में आतंकवाद की बहुत कम बात की। वह बारबार यही दोहराते रहे कि भारत पाकिस्तान के बीच का ‘कोर इशू’ कश्मीर है। कश्मीर को दरकिनार रखकर कोई बातचीत नहीं हो सकती। उन्हाेेंने यह तो माना कि हमें आतंकवाद से ल़डने की जरूरत है, लेकिन साथ ही यह भी कहा कि भारत में होने वाले आतंकी हमलों को पाकिस्तान से ज़ोडना गलत है। हम खुद आतंकवाद से ल़ड रहे हैं और आतंकवाद से ल़डना हमारी प्राथमिकता है। उनका साफ कहना था कि आतंकवादियों का पाकिस्तानी राष्ट्र से कोई संबंध नहीं है। वे सब ‘नान स्टेट ऐक्टर्स’ है, जिनके लिए राष्ट्रों की सीमाएं कोई मायने नहीं रखतीं। वे ‘सैद्धांतिक समानता’ में विश्वास करते हैं, राष्ट्रीय सीमाआें में नहीं। अब उन्हें यह कौन बताए कि इस्लाम का भी तो यही सिद्धांत है, वह भी तो राष्ट्रों की भौगोलिक या राजनीतिक सीमाआें को नहीं स्वीकार करता। सलमान ने मुंबई हमले के बारे में आगे और कुछ भी करने की तरफ से हाथ ख़डे कर दिये। उन्होंने कहा कि मुंबई हमले के बाद पाकिस्तान से जो भी संभव था, वह कर चुका है। उनका आशय था कि इस बारे में उससे अब और कोई उम्मीद नहीं करनी चाहिए। जबकि भारत अभी भी उससे आगे और कार्रवाई की अपेक्षा करता है।
असल में सलमान बशीर की यह भी समस्या है कि वह उस सत्य को कैसे स्वीकार करें, जो तीन घंटे की बातचीत में उनके सामने पेश किया गया। वो तो पाकिस्तान की अपनी जनता के सामने यह वायदा करके आए थे कि २५ फरवरी को वे दिल्ली में कश्मीर पर वार्ता करने जा रहे हैं। अब वह कैसे यह स्वीकार करें कि बातचीत आतंकवाद पर केंद्रित रही और भारतीय अधिकारियों ने उनकी बोलती बंद कर रखी थी। इसलिए वह जो कुछ तीन घंटे की बातचीत में नहीं कह पाए, उसे प्रेस के सामने पेश कर दिया। बताना था कि वह दिल्ली में भारतीय नेताआें को लत़ाड कर आ रहे हैं।
इतना ही नहीं, अब वह बातचीत के बाद दिल्ली में ही रहे होंगे कि पाकिस्तानी सेनाध्यक्ष जनरल कयानी ने इस्लामाबाद में बयान दिया कि पाकिस्तान की सेना किसी भी तरह का मुकाबला करने के लिए सीमा पर मुस्तैद है और वह किसी भी दुस्साहस का मुंहत़ोड जवाब देने के लिए तैयार है। यह भी कम चौंकाने वाला बयान नहीं था। आखिर जिस समय पाकिस्तान के विदेश सचिव भारत में शांति के लिए वार्ता कर रहे थे, उसी समय पाक सेनाध्यक्ष युद्ध और मुंहत़ोड जवाब देने जैसी बात कर रहे थे। वास्तव में वह अपनी रणनीति में लगे हैं। वह भारत के बहाने अपनी पूर्वी सीमा पर पूरा सैन्य जमाव बनाए रखना चाहते हैं, जिससे वह उत्तरी वजीरिस्तान में सैन्य कार्यवाई आगे ब़ढाने से बच सकें। पाकिस्तान उत्तरी वजीरिस्तान पर जहां अलकायदा तथा तालिबान के मुख्यालय हैं हमला नहीं करना चाहता, जबकि अमेरिका लगातार इस हमले के लिए दबाव डाल रहा है। उनके पास एक ही बहाना है कि भारत से लगी पूर्वी सीमा पर भारी खतरा है, इसलिए पाकिस्तान वहां से अपनी सेना हटाकर वजीरिस्तान नहीं भेज सकता।
अब इससे पाकिस्तान की मंशा को अच्छी तरह समझा जा सकता है कि क्या वह वास्तव में भारत के साथ कोई शांति वार्ता करना चाहता है ? या उसके साथ किसी स्तर की वार्ता का कोई लाभ है ? भारत अमेरिका को संतुष्ट करने के लिए भले ऐसी वार्ताएं करता रहे, लेकिन द्विपक्षीय कोई मसला इस तरह की वार्ताआें से हल होने वाला नहीं है।
हुसैन अब कतर के नागरिक
भारत के सर्वाधिक ख्याति प्राप्त किंतु विवादित चित्रकार ९५ वर्षीय मकबूल फिदा हुसैन ने इस्लामी देश कतर की नागरिकता स्वीकार कर ली है। उनके बेटे शमशाद हुसैन ने यह जानकारी देते हुए कहा है कि उनका परिवार इससे बहुत खुश है। हुसैन इन दिनों दुबई व लंदन में रह रहे हैं। उन्होंने कतर के शाह के लिए कुछ पेंटिंग्स बनायी थीं, जिससे प्रसन्न होकर शाह ने अन्य पुरस्कारों के साथ यह नागरिकता का भी सम्मान दिया। हुसैन का कहना है कि उन्होंने नागरिकता का कोई आवेदन नहीं किया था, यह उन्हें नवाजी गयी है। उन्होंने इसकी सूचना सबसे पहले भारत में ‘द हिन्दू’ के संपादक एन राम को दी, जिसे उन्होंने प्रथम पृष्ठ की सुर्खियों में प्रकाशित किया।
हुसैन कुछ वषा] से भारत से स्वत: निर्वासित जीवन बिता रहे हैं। उन्हें कोई देश निकाला नहीं दिया गया है, किंतु उन्होंने कुछ हिन्दूवादी संगठनों की धमकियों से डरकर देश के बाहर रहना ठीक समझा। भारत सरकार ने उन्हें हर तरह की सुरक्षा देने का आश्वासन दिया था, लेकिन उन्होंने उस पर कोई भरोसा नहीं किया। संभवत: वे उस अदालती कार्रवाई का मुकाबला करने के लिए तैयार नहीं थे, जो उनके खिलाफ शुरू की गयी थी।
हुसैन जैसे प्रतिभाशाली व प्रसिद्धि प्राप्त चित्रकार का भारत में काफी सम्मान है और कोई भी देश या समाज इससे प्रसन्न नहीं होगा कि उसका कोई सम्मानित चित्रकार किसी अन्य देश में जा बसे, किंतु हुसैन साहब को इस देश के बहुसंख्यक समाज की भावनाआें का भी सम्मान करना चाहिए था। कलाकार की अभिव्यक्ति स्वतंत्रता एकपक्षीय या किसी एक वर्ग विशेष को आहत करने वाली नहीं होनी चाहिए। कला की सर्जनात्मकता को सम्मान इसलिए मिलता है कि वह प्रकृति के सृजन को भी और श्रेष्ठतर बनाता है। उसे नया औदात्य और नई अर्थवत्ता प्रदान करता है। किंतु वह केवल नवीनता के लिए किसी स्थापित आदर्श से खिलव़ाड की छूट नहीं प्राप्त कर सकता। भारत के बहुत से श्रेष्ठ साहित्यकार, वैज्ञानिक व व्यवसाई दूसरे देशों में जा बसे, वहां की नागरिकता प्राप्त कर ली, इसलिए यदि हुसैन भी अन्यत्र जा बसे हैं, तो इसमें बहुत गमगीन होने की कोई बात नहीं है।
