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अनिवार्य मतदान से होगा लोकतंत्र मजबूत

Swatantra Vaartha  Sat, 27 Feb 2010, IST

अनिवार्य मतदान से होगा लोकतंत्र मजबूत

भारतीय लोकतंत्र को सबल और सक्षम बनाने के लिए समयसमय पर हमारे संविधान में संशोधन होते रहे हैं। संविधान में लिखित कानूनों की व्याख्या करने का उत्तरदायित्व उच्चतम न्यायालय की संविधान पीठ पर है। श्री अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में एक आयोग स्थापित किया गया था, जिसको इस बात पर विचार करना था कि क्या संविधान के कुछ अनुच्छेदों को एक साथ बदलने की आवश्यकता है? इस पर कांग्रेस एवं वामपंथियों ने शोर मचाया था और यह शंका व्यक्त की थी कि सरकार संविधान के साथ छ़ेडछ़ाड करना चाहती है, सरकार की मंशा संविधान में ब़डी फेरबदल करके उसके मर्म को आहत करना है। कुछ गैरजिम्मेदार राजनीतिज्ञों ने तो यहां तक कह दिया था कि राजग सरकार नया संविधान बनाना चाहती है। कुल मिलाकर तब इस अच्छे और आवश्यक काम पर विराम लग गया था।

अधिकतर हिस्सा १९३५ के एक्ट से ज्यों का त्यों लिया गया है। इसके अतिरिक्त गोहत्या और समान नागरिक कानून को निदेशक सिद्धांतों के तहत रखकर तत्कालीन संविधान सभा में बैठे कांग्रेसियों ने अपने वोट बैंक को सुरक्षित रखने की दृष्टि से उन्हें अनिवार्यता प्रदान करने की हठ नहीं पक़डी। इसी प्रकार लोकतंत्र के सबसे प्रभावी हथियार यानी मतदान को भी अनिवार्य बनाने की आवश्यकता नहीं समझी गई। इसका लाभ कांग्रेस को अपनी सरकारें गठित करने में पूरापूरा मिलता रहा। मतदान को अनिवार्य न किये जाने के पीछे यह दलील दी गई कि भारत की जनता अशिक्षित है, इसलिए पहले शिक्षा का प्रतिशत ब़ढना चाहिए। आज हम सन्‌ २०१० में रह रहे है। १९४७ की तुलना में न केवल शिक्षितों का प्रतिशत ब़ढा है, बल्कि मीडिया ने लोगों को व्यावहारिक रूप से भी शिक्षित करने में ब़डी भूमिका निभाई है, किन्तु सरकारी पक्ष की ओर से संसद में कभी यह आवाज नहीं उठी कि अब भारत में वोट देना अनिवार्य कर दिया जाए। पिछले दिनों नरेन्द्र मोदी जैसे जागरूक मुख्यमंत्री ने विधानसभा में मतदान को अनिवार्य किए जाने संबंधी एक विधेयक प्रस्तुत किया और गुजरात विधानसभा ने उसे बहुमत से पारित कर दिया। लोकतंत्र के हित में उठे इस कदम को चुनाव आयोग ने व्यावहारिक नहीं बताया और साफ शब्दों में कह दिया कि मतदान को अनिवार्य नहीं किया जा सकता है। चुनाव आयोग की दलीलें इतनी थ़ोडी हैं कि प़ढेलिखे समाज के गले नहीं उतर सकती हैं। १९८५ को राष्ट्र संघ ने ‘युवा वर्ष’ घोषित किया था उस समय राजीव गांधी भारत के प्रधानमंत्री थे। वे भी युवा थे इसलिए भारत में मतदाता की आयु २१ से घटाकर १८ वर्ष कर दी गई थी। २०११ से २०१२ के बीच जनगणना के आंक़डे ब़डे चौंकाने वाले होंगे। इस दौरान भारत में ६० प्रतिशत आबादी युवा होगी और ४० प्रतिशत वृद्ध होंगे।

इस तथ्य के बावजूद नरेन्द्र मोदी के उक्त लोकतांत्रिक कदम की आलोचना की जा रही है और यह कहा जा रहा है कि यह व्यावहारिक नहीं है। ऐसा क्यों कहा जा रहा है, इस पर चिंतन की आवश्यकता है। १९५२ और १९५७ के आम चुनावों में कांग्रेस को ४० से ५० प्रतिशत वोट मिलतेे रहे, लेकिन १९६२ और १९६७ में यह प्रतिशत ४० से भी नीचे चला गया। १९७२ में पाकिस्तान के साथ युद्ध होने के कारण कांग्रेस, जो उस समय ‘सिंडिकेट’ बन गई थी, ५० के आगे निकल गई, लेकिन १९७७ में तो प्रतिशत इतना गिरा कि वह सरकार भी नहीं बना सकी। फिर श्रीमती इंदिरा गांधी की हत्या के बाद राजीव गांधी को तीन चौथाई बहुमत मिल गया, जो अपने आप में एक कीर्तिमान था। उसके पश्चात तो मिलीजुली सरकारों का युग प्रारंभ हो गया, जो अब तक जारीहै। इसलिए सरकार बना लेना और बात है, लेकिन अपने मतदान प्रतिशत में ब़ढोत्तरी करना बिल्कुल दूसरी बात। इस बीच इतने क्षेत्रीय दल बन गए कि वोट का प्रतिशत कम होते जाना एक स्वाभाविक बात हो गई। चुनाव आयोग में ८५० राजनीतिक दल पंजीकृत हैं। इस आंक़डे पर किसी एक पार्टी के लिए मतदान का अपना उच्च प्रतिशत बनाए रखना एक कठिन काम हो गया।

राजनीतिक दल अच्छा प्रतिशत न मिलने से कोई स्थायी और प्रगतिशील सरकार देने में असफल रहे। इस कारण मतदाताआें का मतदान से मोहभंग हो गया। आज भारत में साक्षरता का प्रतिशत बहुत ब़ढ गया है, इसके बावजूद मतदान का प्रतिशत गिरता चला गया है। यदि व्यावहारिक बात करें, तो औसतन ४० प्रतिशत मतदाता मतदान केन्द्रों पर पहुंचकर सरकार बनाने में अपनी भागीदारी दर्ज कराते हैं जबकि ६० प्रतिशत मतदाता मतदान दिवस को अपनी छुट्टी और ‘पिकनिक’ का दिन मानकर लोकतंत्र के इस महान पर्व की खिल्ली उ़डाते हैं। इसलिए आज देश के सामने सबसे ब़डी चुनौती यह है कि हम अपने जनतंत्र को मजबूत किस प्रकार बनाएं। ऐसे में एक ही विचार सामने आता है कि मतदान को अनिवार्य क्यों नहीं बना दिया जाए ताकि सम्पूर्ण देश की वयस्क जनता लोकतंत्र के प्रति उत्तरदायी बन सके। विशाल पैमाने पर मतदान के पश्चात जो सरकार बनेगी वह निश्चित ही आज की तुलना में अधिक मजबूत और देशव्यापी होगी।

नरेन्द्र मोदी के उक्त साहसी कदम की कुछ लोगों ने प्रशंसा भी की है, लेकिन अधिकतर राजनीतिक दल इस पर मौन हैं। सत्ताऱुढ कांग्रेस पार्टी और लोकसभा में विपक्षी दल ने इस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है। चुनाव आयोग अवश्य ही इस सबके बीच में आ गया और कह दिया कि यह व्यावहारिक नहीं है। पहली बात तो यह कि इस पर टिप्पणी करना कोई चुनाव आयोग का काम नहीं है, क्योंकि चुनाव आयोग तो चुनाव संबंधी नियम और कानून को क्रियान्वित कराने वाली एजेंसी है। चुनाव संबंधी कानून बनाना देश के निर्वाचित प्रतिनिधियों का काम है। अगर यह अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झ़ाडने वाली बात हो, तो फिर कुछ कहना फिजूल है, लेकिन अगर चुनाव आयोग का यह वक्तव्य किसी पार्टी के हित में है तो फिर निश्चित ही चिंता की बात है, क्योंकि यदि मतदान अनिवार्य होता है तो फिर वोट बैंक का धराशायी होना तय है। आज ४० प्रतिशत मतदाताआें को अपने वोट बैंक के माध्यम से अपने पक्ष में कर लेना आसान है, लेकिन सौ प्रतिशत मतदाताआें को अपने समर्थन में लाना पह़ाड की चोटी पर च़ढने के समान है। कांग्रेस को सबसे अधिक विश्वास अपने मुस्लिम वोट बैंक पर है। साथ ही वंचित वर्ग का वोट बैंक भले ही उसके हाथों से फिसलता नजर आ रहा हो, लेकिन अब भी कांग्रेस उनसे निराश नहीं है। मुस्लिम नेताआें के कथनानुसार, १६ प्रतिशत मुस्लिम मतदाता कम नहीं हैं। इसी प्रकार वंचित वर्ग के वोट बैंक का प्रतिशत लगभग २० है। अब यदि किसी उम्मीदवार को उनका ७५ प्रतिशत समर्थन भी मिल जाता है, तो फिर उसे कौन पराजित कर सकता है। ५० से ६० प्रतिशत हिन्दू मतदाता मतदान करने के लिए मतदान केन्द्र पर नहीं पहुंचते हैं। इसलिए अपने वोट बैंक के थ़ोडे, लेकिन निश्चित वोट मिल जाने के बाद वे उम्मीदवार सफल हो जाते हैं। मुस्लिम मतदान आज भी अपना वोट अपनेे नेता और जमात के फरमान पर देता है, लेकिन हिन्दू स्वतंत्र विचारधारा का होने के कारण अपनी समझ और देशहित को सामने रखकर मतदान करता है। अब वोट डालना अनिवार्य हो जाएगा, तो ‘वोट बैंक’ के लोग अल्पसंख्य में आ जाएंगे और समझदारी से वोट देने वाला बहुसंख्यक समाज अपनी ताकत के बल पर योग्य और अपनी कसौटी पर खरे उम्मीदवार के पक्ष में मतदान करेगा। इसलिए मतदान अनिवार्य होते ही आज जो वोट बैंक की राजनीति है, वह निष्प्रभावी हो जाएगी।

अनिवार्य मतदान जातिगत आधार पर किये जाने वाले मतदान के वोट बैंक को भी प्रभावित करेगा। क्योंकि एक ही जाति के लोग किसी क्षेत्र में बहुमत में नहीं हो सकते हैं। यदि किसी जगह उनकी संख्या अन्य जातियों से अधिक है, तब भी वह मतदान किसी एक के पक्ष में नहीं हो सकता है। इसलिए जाति और साम्प्रदायिकता को चुनावी मैदान से समाप्त करना है, तो केवल उसका एक ही मार्ग है कि मतदान अनिवार्य किया जाए।

किसी एक सीमित जाति अथवा मजहब के मतदाता को ब़डी सरलता से प्रभावित किया जा सकता है। चुनाव में धन बल सबसे अधिक प्रभावी रहता है। एक वर्ग के लोगों को पैसा बांटा जा सकता है। मात्र पैसा ही नहीं इसके लिए कप़डों से लेकर शराब जैसी वस्तुआें का भी ध़डल्ले से उपयोग करना, भारतीय चुनावों में एक साधारण बात हो गई है। लेकिन जब शतप्रतिशत मतदान होगा तो क्या उस निर्वाचन क्षेत्र के एकएक व्यक्ति को भ्रष्ट करना आसान होगा? तब इस प्रकार का गोरखधंधा करने वाले प्रत्याशी और पार्टी की सभी मतदाताआें तक पहुंच निश्चित ही असंभव और अव्यावहारिक बात होगी।

पिछले दिनों सर्वोच्च न्यायालय ने बुर्काधारी महिलाआें के लिए मतदाता परिचय पत्र पर उनका चित्र लगाना अनिवार्य कर दिया। कल तक जो मुस्लिम नेता और मौलाना इसे मजहब विरोधी समझते थे, उन्हें अपनी राय बदलनी प़डी। चुनाव आयोग और सर्वोच्च न्यायालय ने एक प्रगतिशील कदम को लागू कराने में अपना ऐतिहासिक योगदान दिया। यदि इसी परंपरा के आधार पर अनिवार्य मतदान को भी लागू किया जाए तो भारतीय लोकतंत्र अधिक स्वस्थ, सुद़ृढ एवं पारदर्शी बनेगा

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