पेट्रोल उपबोक्ता किसी राहत की आशा न करें
धानमी का यह कहना सही ह कि हम लुभावनी वाीिय नीतिया अपनाकर जनता को मुाफीति या महगाइ से नहीं बचा सकते। वाीिय घाटे को कम करने तथा बजट को सतुलित बनाने के लिए यह आवयक है या तो सरकारी खर्चे कम किये जाए अथवा आय के ाेत बढाए जाए। वतमान थिति में सरकारी खर्चे कम नहीं किये जा सकते, तो जाहिर है कि आमदनी बढाने के लिए कर बढाए जाए। सरकारी खचा] में मुय हिसा सरकारी कमचारियों के वेतन भााें का होता है। सेना का यय होता है आर सामाजिक कयाण की विविध योजनाए होती है। अब इनमें से कोइ खचा कम नहीं हो सकता। तिरक्षा की जरतों को पूरा करने के लिए सेना का खच बढाना ही ह। गामीण रोजगार योजना तथा कमजोर व अपसयक वग को दी जाने वाली सहायता के खर्चे भी कम नहीं किये जा सकते। तो या किया जाए।
इसमें दो राय नहीं कि इधन महगा होने से अय सारी वतुए भी महगी हो जाएगी। लेकिन यदि दुनिया में तेल की कीमतें बढ रही ह, तो उसका उपभोता मूय भी बढाना होगा। सरकार का बजट लाभ का हो तो जर यह कहा जाना चाहिए कि सरकार अपनी आमदनी कम करे आर जनता को राहत दे, लेकिन यदि वह पहले से ही आमदनी से अधिक खच कर रही हो आर बजट में ६८ तिशत तक का वाीिय घाटा दिखा रही हो, तो उस पर यह दबाव नहीं बनाना चाहिए कि वह पेटोलडीजल की कीमतें कम रखें, भले ही उसे आर अधिक वाीिय घाटा उठाना पडे। वाीिय घाटे का साफ मतलब है कि रिजव बक से उधार लेकर काम चलाना। रिजव बक भी धन कहा से लाएगा। वह घाटे को अतिरित नोट छापकर पूरा कर देगा, लेकिन इससे अथयवथा कमजोर होती जाएगी आर कीमतों की व का एक अनवरत सिलसिला शु हो जाएगा।
वाि मी णव मुखर्जी ने आने वाले वाि वष के बजट में वाीिय घाटा ५५ तिशत रखने का ताव किया ह। यह उनका अछा निणय ह, लेकिन यदि पेटोलडीजल पर बढी कीमतें वापस ले ली जाए, तो यह वाीिय घाटा फिर ६८ तिशत या शायद ७ तिशत तक पहच जाएगा। जिहें राजनीति करनी है, उहें तो हर पल यही सि करना ह कि जो पार्टी साा में है, वह जनविरोधी है आर केवल हम ही आम जनता के हितों के असली रक्षक है। कागेस भी जब विपक्ष में रहती है, तो यही करती ह। वह इस समय साा में ह आर चुनावों के बाद का अभी पहला साल है, इसीलिए वह थोडे कठोर निणय का साहस भी कर पा रही है। विपक्षी दलों को तो खर उसका विरोध करना ही था, किंतु साा पक्ष के दो सहयोगी दल भी तेल की कीमत में की गयी बढाेारी वापस लेने की माग कर रहे ह। ऐसा नहीं कि वे तयों को समझते न हों, लेकिन जनता के बीच अपनी छवि बेहतर बनाने के लिए वे यह दिखाना चाहते ह कि जनता के हितों की केवल उहें परवाह है।
वाि मी पहले ही यह कह चुके थे कि तेल की बढी कीमतें वापस नहीं ली जाएगी, लेकिन रियाद से वापस दिली आते समय विमान में पकारों से बातचीत के दारान धानमी ने भी यह पट करने की कोशिश की कि यदि कीमतों में व वापस ली गयी, तो उससे देश की आम जनता को आर नुकसान होगा। वातव में इस देश की अथयवथा में सकट पदा होने का कारण भी यही रहा ह कि सरकारें अपनी दलीय राजनीति को यान में रखकर नीतिया बनाती रही ह, न कि देश की आम जनता के दीघकालिक हितों को यान में रखकर। हो सकता ह सरकार अपने सहयोगी दलों को सतुट करने के लिए डीजल की कीमतों में कुछ कमी करना वीकार कर ले, लेकिन पेटोल उपभोताआें को तो अब बढी दर से ही काम चलाना पडेगा।
तसलीमा के विरुद्द
तसलीमा नसरीन का लेखन इस समय फिर चचा में है। मुलिम समुदाय में याेिं की बुका था के खिलाफ उनका एक लेख कनाटक के एक कދड दनिक में या छप गया कि उसके वि ाय: पूरे राय में आकोश फूट पडा। राय के दो शहरों शिमोगा आर हासन में तो आगजनी व तोडफोड की यापक हिंसक घटनाए हुइ। शिमोगा में तो हालात इस तरह बेकाबू हो गये कि पुलिस को गोली चलानी पडी, जिसमें दो लोगों की मात हो गयी आर ३५ के लगभग लोग घायल हो गये। पुलिस ने इस कދड दनिक के साथ एक उदू दनिक के खिलाफ भी मामला दज किया है।
इलामी थाआें के खिलाफ लगातार लेखन के कारण ही तसलीमा को बगलादेश से निकलना पडा, योंकि वहा के कटटरपथी उनके खून के यासे हो गये थे। भारत में उहोंने कोलकाता को अपना आवास बनाया था, लेकिन पचिम बगाल की सरकार भी उहें अपने यहा रखने के लिए तयार नहीं हइ। यहा भारत के मुलिम कटटरपथियों ने भी उनके खिलाफ उग आदोलन शु कर दिया आर सरकार को मजबूर कर दिया कि वह तकाल उहें अपने यहा से बाहर कर दे। दिली सरकार ने उहें शरण देना तो वीकार कर लिया, लेकिन उहें सावजनिक जीवन से अलग कर दिया। तसलीमा ऐसी थिति में फास चली गयी, योंकि फास सरकार ने उहें अपने यहा शरण देने की पेशकश की थी। खबर है कि इस समय वह बिटेन में रह रही ह आर भारत आना चाहती ह, लेकिन इस घटना के बाद अब वह शायद ही यहा आ सकें।
सवाल है कि भारतीय समाचार प ऐसे आलेखों को छापते ही यों है, जिसे लेकर इस तरह का बावेला खडा हो जाता है। वे केवल एक लेख छापकर तसलीमा की लडाइ को आगे नहीं बढा सकते। या तो उनमें इतना साहस व शति हो कि वे इन कटटरपथियों का मुकाबला कर सकें, नहीं तो जहा जसा चल रहा है, चलने दें। इस देश में मुलिम महिलाआें की बुका था के वि जितना ही जागकता अभियान चलाया गया, बुका था उतनी ही कठोर होती चली गयी है। इसलिए इस था के खिलाफ जब तक मुलिम महिलाआें के बीच से ही कोइ सगठित यास शु नहीं होता, तब तक ऐसे फुटकर लेखों व भाषणों की शिगूफेबाजी से केवल अशाति ही पदा होगी, कोइ साथक परिवतन की धारा नहीं फूटेगी।
