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दिल मिले या न मिले हाथ मिलाते रहिए

Swatantra Vaartha  Thu, 4 Mar 2010, IST

दिल मिले या न मिले हाथ मिलाते रहिए

भारत आर पाकितान के मय होने वाली सचिव तर की बहुतीक्षित वाता गत २५ फरवरी को नइ दिली के हैदराबाद हाऊस में आखिरकार सप हो गइ। आतकवाद के मुे को लेकर भारत व पाकितान के बीच चले आ रहे तनावपूण एव अविवास पूण वातावरण के मय आयोजित हुइ इस उतरीय वाता को हालाकि विलेषकों ारा अलगअलग काेिणों से देखा जा रहा है फिर भी जानकारों का मानना है कि वाता की सफलता या असफलता जसे किसी नतीजे पर पहचना चूकि बहत जदबाजी की बात है लिहाजा दोनों के विदेश सचिवों का वाता हेतु एक मेज पर बठना ही अपने आपमेेंं इस नतीजे पर पहचने के लिए काफी है कि भारत व पाकितान शाति थापित करने के इछुक है तथा भविय में भी सबध में आर वाताए होनी सभावित है। हालाकि कइ राजनतिक विलेषकों ारा इस वाता को लेकर सफलता या असफलता के अपनेअपने तक भी पेश किए जा रहे है। भारत में मुय विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी अपनी चिर परिचित राजनीति का अनुसरण करते हए बारबार यह राजनतिक वय दे रही थी कि वह इस वाता के पक्ष में कतइ नहीं है। इनका तो यहा तक कहना था कि भारत को पाकितान से बात करने हेतु अमेरिका ने दबाव देकर राजी किया ह। विपक्ष भारत पाकवाता को अफगानितान में अमेरिका की हो रही फजीहत तथा अफगानितान के विषय में रापति ओबामा के भविय के इरादों से भी जोडकर देख रहा है। परतु दरअसल भारत दक्षिण एशिया के सबसे बडे आर ताकतवर देश के नाते जिमेदारी की भूमिका निभाते हए दुनिया को यह बताना चाह रहा है कि भारत महामा गाधी के बताए हए सय व अहिंसा के साितों पर चलने वाला एक ऐसा जिमेदार देश ह, जो कि अपने पडोसी देशों के साथ मीपूण सबध बनाकर रखने में विवास करता है।

विदेश सचिव तर की हइ ताजातरीन वाता में यह वीकार किया गया है कि दोनों देशों के मय अविवास का वातावरण है आर यही अविवास का वातावरण दोनों देशों के मय रितों को मधुर, मजबूत तथा मीपूण नहीं होने दे रहा है। इसमें कोइ शक नहीं कि भारत की ही तरह पाकितान के आम लोग भी आतकवादी घटनाआें, आए दिन इसमें होने वाली बेगुनाहों की हयाआें तथा इन सबके चलते पाकितान की पूरी दुनिया में निरतर होने वाली फजीहत से पूरी तरह ऊब चुके है, परतु इसके बावजूद पाकितान में एक अछाखासा वग ऐसा भी ह जो कमीर के नाम पर पाकितान में भारत विरोधी माहाल खडा करने में हर व लगा रहता ह।

जसा कि मने अपने पूव के लेखों में कइ बार यह लिखा ह कि पाकितान में साा के एक नहीं, बकि कइ अलगअलग कें है।

उदाहरण के तार पर यदि भारत व पाकितान, पाकितान की किसी निवाचित लोकताकि सरकार से सरकारी तर की वाता के बाद किसी निणय पर पहचें तो उस निणय को पाक सेना भी पचा ले यह जरी नहीं है। इसी कार यदि कोइ सााढ पाक जनरल की ओर से कोइ फसला लिया जाए तो पाकितान की गुचर सथा आइ एस आइ उसे वीकार करे यह जरी नहीं आर इन सभी साा केाेंं के फसलों से पाकितान की यायपालिका सहमत हो यह भी आवयक नहीं ह आर अत में साा, यायपालिका व शासन के इन सभी पतािनों से पाकितान के कर पथी कठ मुे जेहादी मानसिकता रखने वाले भारत विरोधी अतिवादी सहमत हों यह भी कोइ जरी नहीं है।

लिहाजा इलाम धम के नाम पर भारत से विभाजित कराया गया यह तथाकथित इलामी रा आज अपने ही अत۩दों में इतना उलझ गया ह कि पाकितान के समक्ष आज आगे कुआ आर पीछे खाइ जसी थिति पदा हो गइ है। भारत में नइ पीढी यह देखकर आचयचकित होती है कि पाक ायोजित आतकवाद का बारबार शिकार होने के बावजूद भारत ारा बारबार परपर वाता हेतु राजी हो जाने के बाद भी आखिर पाकितान भारत में आतकवादी घटनाए रोकने के उपाय यों नहीं करता। भारत के लोग जहा इन दोनों परमाणु सप देशों के मय मधुर सबधों को लेकर उसुक व आशावित रहते है वहीं अब धीरेधीरे भारत के आम लोगों के दिलों में यह बात भी अपनी जगह बनाती जा रही है कि पाकितान जान बूझकर भारत में अशाति पदा करना चाहता ह तथा पाकितान भारत की सहज एव शातिपूण नीतियों का नाजायज फायदा उठा रहा है। भारत के पास मुबइ के २६११ के हमले में पकडे गए आतकवादी अजमल आमिर कसाब के अतिरि आर भी तमाम ऐसे सुबूत है जिहें भारत समयसमय पर पाकितान को उपलध कराता रहता है। इहीं में अभी एक ताजातरीन सुबूत आर जुड गया है। पिछले दिनों पाकितान में तिबधित जमातउददावा लकरे तयबा के मुख हाफिज सइद ने अपने अय सहयोगियों के साथ एक भारत विरोधी रली लाहार के मुय मागा] पर निकाली। इसमें सावजनिक प से भारत में जेहाद फलाने तथा पूरी दूनिया के मुसलमानों को इस जेहाद में शामिल होने तथा इसी राते पर चलकर कमीर पर कजा जमाने की बातें बडे ही उकसाने वाले लहजे में की गइ इस रली में न केवल कइ मोट वाटेड तिबधित नेता व आतकी सगठन सकिय दिखाइ दिए बकि इस रली में सकडों लोग खतरनाक तिबधित हथियार लेकर भी घूमते नजर आए।

अब ऐसे दशन को या कहा जाए। यदि पाक सरकार के आतकवाद सबधी तका] की ओर देखें तो एक तो बारबार पाकितान यह तक पेश करता ह कि पाकितान खुद भी आतकवाद का जबरदत शिकार ह। लिहाजा आतकवाद को लेकर पाकितान भारत सहित पूरी दुनिया से आलोचना या निंदा सुनने के बजाए हमदर्दी व सहानुभूति से पेश आने की उमीद करता ह । हाफिज सइद के विषय में पाक का तक है कि वह पाकितान या पाक सरकार का तिनिधिव नहीं करता लिहाजा उसकी बातों से पाक सरकार का कोइ लेना देना नहीं है। सवाल यह है कि फिर आखिर पाकितान की सरकार या सेना हाफिज सइद को भारत के वि जेहाद का बिगुल बजाते रहने से यों नहीं रोकती ? हाफिज सइद ारा लाहार की सडकों पर दिन दहाडे नवयुवकों को भारत के वि उकसाने व भडकाने के आखिर या मायने ह ? दो ही बातें समझ में आती ह, या तो भारत विरोधी यह नगा नाच पाकितान में पाक सरकार के साा केाेंं से किसी एक या अनेक ार निर्देशित या सचालित अथवा सरक्षण ा है आर यदि ऐसा नहीं ह तो पाकितान सरकार इन भारत विरोधी जहरीले नेताआें व सगठनों व मुीभर अतिवादी व उपवी वा के जेहादी मानसिकता रखने वाले लोगों के समक्ष अपने घुटने टेक चुकी ह। पाकितान में बेकाबू होते जा रहे आतकी सगठन इस बात का पुता सुबूत ह।

अब न यह ह कि भारत पाक के मय अविवास व सदेह का यह वातावरण आर कब तक तथा निरथक एव अपरिणामदायक सी तीत होती बातचीत का यह सिलसिला भी आर कब तक? इस विषय पर चिंतन करने हेतु पाकितान की अवाम के विचारों के साथसाथ वहा के विवादित सगठन आइ एसआइ के मिजाज पर भी गहरी नजर डालने की जरत ह। पाकितान में जहा निवाचित सरकार आर पाक सेना दोनों ही साा के परपर तिपर्धी होने जसा माहाल पाक में बना चुके ह वहीं पाकितान में सकिय आइएसआइ भी पाक सेना के छाया सगठन के प मे वय को थापित कर चुका ह। यही वजह ह कि पाकितानी सेना तथा आइ एस आइ दोनों ही के मय अधिकारियों का आदानदान होता रहता ह। पाकितान के कइ उ सय अधिकारी आइ एस आइ के मुख पदों पर काय कर चुके है। अब न यह है कि पाकितान की सेना तथा आइ एस आइ को भारत में अशाति पदा करने से आखिर या हासिल है।

भले ही पाकितान की नइ पीढी १९७१ के पाकबगला देश विभाजन को धीरेधीरे भूल गइ हो या भूलने की कोशिश कर रही हो परतु पाकितानी सेना तथा इसी पाक सेना से आइ एसआइ में आने जाने वाले तमाम फाजी अभी भी ऐेसे माजूद ह तथा सेवारत ह जिहोंने भारतीय सेना अथवा मु वाहिनी के हाथों अपना अपमान सहन किया ह आर वे अधिकारी भी अभी अपने पूरे होशहवास में ह जिहोंने विव का अब तक का सबसे बडा आम समपण देखा ह या इसमें वय शामिल रहे है। यह आमसमपण १९७१ में इसी भारतपाक बगलादेश यु के दारान पाक सेना ारा भारतीय सेना के समक्ष किया गया था आर इन सब अपमानजनक क्षणों के मय उस पाकितान को इहीं अधिकारियों ने विभाजित होते हए भी देखा जिस पाकितान को अतिवादी शयाेिं ने धम के नाम पर भारत से अलग करा दिया था। आज वही पाक सेना तथा वही आइ एस आइ अपने १९७१ के उस अपमान को न तो भूल पा रही है आर न भुलाना चाह रही है। यही वजह ह कि यह अतिवादी शयाि तथा आइ एस आइ पाकितान के नेताआें ारा १९४७ में किए गए गलत सादायिक योग की ही तरह कमीर में भी सादायिकता व जेहाद जसे घातक हथकडों का योग कर रहीहै । अब यह पाकितान की शातियि जनता, वहा की निवाचित सरकार, पाकितान के बुजीिवियों, पकारों तथा शिक्षित वग के लोगों पर निभर करता ह कि वे जनता को यह बताने की कोशिश करें कि जिस कार १९४७ के विभाजन को धम आधारित विभाजन गलत परिभाषित किया गया था जिसका माण पाकितान का १९७१ में हआ एक आर विभाजन है, जो कि धम आधारित नहीं था ठीक उसी पकार कमीर में भी सदाय या जेहाद की बातें कर अयायपूण, निरथक तथा बेमानी है। पाक सेना या आइ एस आइ ारा कमीर में जेहाद के नाम पर फलाया जाने वाला आतकवाद कमीर मुे को तो शायद हल न कर सके, परतु इस कार का वातावरण दोनों देशों के बीच रिते जर खराब कर सकता है। लिहाजा जरत है दोनों देशों के मय पूण पारदशिता व विवास बहाली की । मशहूर शायर निदा फाजली ने शायद तभी यह फरमाया है

दुमनी लाख सही, खम न कीजे रिता।

दिल मिले या न मिले, हाथ मिलाते रहिए।।


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