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विराट व्यक्तित्व के धनी रहे नानाजी देशमुख

Swatantra Vaartha  Thu, 4 Mar 2010, IST

विराट व्यक्तित्व के धनी रहे नानाजी देशमुख

संघ परिवार के एक ब़डे पुरोधा रहे नानाजी देशमुख ९४ वर्ष की आयु में नश्वर संसार का परित्याग कर गए। नानाजी का संपूर्ण जीवन एक विशेष सामाजिक सांस्कृतिक मिशन के लिए समर्पित रहा। जिसे किसी विशेष दल और विचारधारा की परिधि के तहत कदाचित कैद नहीं किया जा सकता। उनको प्रदान किए गए पद्‌मविभूषण जैसे अलंकरणों से भी उनकी शख्सियत की पैमाइश भी नहीं की जा सकती। नानाजी को वस्तुतः एक ऐसी अखिल भारतीय शख्सियत हासिल हुई, जिसने कि देश की राजनीति के शीर्ष पर रहते हुए भी स्वेच्छापूर्वक पदत्याग कर दिया था। शोहरत, दौलत और सत्ता से पूर्णतः विरत होकर एक कर्मयोगी जीवन अंगीकार किया। उनका जीवन तो वस्तुतः संघ के लिए भी एक सबक बन गया है जो कि सदैव प्रेरित करता रहेगा कि यदि वास्तव में अखिल भारतीय स्वीकार्यता चाहते हो तो संकीर्णता का पूर्ण परित्याग करके वतन के सभी धमा], सभी जातियों, सभी वर्गों और सभी प्रांतों के भारतवासियों को अपने दिलो दिमाग में समुचित स्थान प्रदान करो।

आरएसएस की पृष्ठभूमि से राजनीति में दाखिल हुए नानाजी भारतीय जनसंघ की नींव रखने वालों में से एक रहे। भारतीय जनसंघ के वास्तविक रचनाकार कलकत्ता विश्वविद्यालय के वाइस चांसलर रहे श्यामाप्रसाद मुखर्जी थे, जो हिंदूमहासभा के सर्वोच्च नेताआें में से एक रहे थे। वह भारतीय संविधान सभा के सदस्य और पं नेहरू के अंतरिम मंत्रीमंडल में मंत्री रहे थे। उन्होंने ही आरएसएस के कुछ अग्रणी संगठन कर्ताआें के साथ मिलकर जिनमे नानाजी देशमुख और उनके कुछ नौजवान प्रमुख साथी थे एक नए राजनीतिक दल की बुनियाद रखी, जिसे कि भारतीय जनसंघ का नाम दिया गया। आजादी के प्रारंभिक काल में जबकि देश के लिए नया संविधान तशकील ही हुआ था और भारतीय लोकतंत्र बाल्यकाल में अंग़डाई ले रहा था। उस दौर में नानाजी ने जो आरएसएस के एक संगठनकर्ता के तौर पर सक्रिय थे, नवगठित भारतीय जनसंघ की राजनीति के लिए पूर्णतः समर्पित हो गए।

भारतीय जनसंघ ने तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू की कश्मीर नीति का जमकर विरोध किया। इसी संघर्ष में कश्मीर की एक जेल में श्यामाप्रसाद मुखर्जी का निधन हो गया। भारतीय जनसंघ का समूचा कार्यभार नानाजी देशमुख, दीनदयाल उपाध्याय, बलराज मधेक, अटलबिहारी वाजपेयी जैसे युवा नेताआें के कंधे पर आ गया जबकि ये सभी अपने जीवनकाल के तीसरे दशक में जी रहे थे। उस दौर की राजनीति में जबकि एक तरफ गांधी औैर नेहरू की तपीतपाई अनुभवी कांग्रेस पार्टी जिसमें कि सरदार पटेल, गोविंदवल्लभ पंत, कृष्णा मेनन, केडी मालवीय जैसे अनुभवी नेता विद्यमान थे। साम्यवादी दल जो संसद में कांग्रेस के पश्चात दूसरा सबसे ब़डा दल था जिसमें जंगे आजादी के दौर के ब़डे क्रांतिकारी विराजमान थे पूरनचंद जोशी, अजय घोष, शिववर्मा, श्रीपादअम्‌त डांगे, नंबूदरीपाद, एके गोपालन, सुंदरैया आदि थे। सोशलिस्ट पार्टियां थी जिसमें आचार्य नरेंद्रदेव, आचार्य कृपलानी, जयप्रकाश नारायण, डॉ लोहिया, अशोक मेहता जैसे मूर्धन्य नेता थे, जो कांग्रेस छ़ोडकर आए थे। ऐसे दौर में जनसंघ के युवा नेताआें के समक्ष अपने दल को भारतीय राजनीति के पटल पर स्थापित करने की एक दुर्दम्य चुनौती प्रस्तुत थी।

इस अत्यंत कठिन राजनीतिक चुनौती का सन्‌ १९१६ में परभणी; महाराष्ट्र में जन्मे नानाजी देशमुख ने बखूबी कामयाबी के साथ सामना किया। उनकी आयु उस समय मात्र ३३ वर्ष थी, हालांकि वह आयु में अपने सभी साथियों से ब़डे थे। भारतीय जनसंघ के महासचिव के तौर पर नानाजी देशमुख ने अपनी पार्टी को मात्र एक दशक में एक अखिल भारतीय राजनीतिक दल बना दिया। सन्‌ १९६२ में जिसे चुनाव आयोग ने एक राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा प्रदान कर दिया। सन्‌ १९६७ के चुनाव में गैरकांग्रेसवाद का परचम बुलंद करने वाले नेताआें के बीच नानाजी देशमुख देश के एक ताकतवर नेता बन चुके थे, जिन्होंने डॉ राममनोहर लोहिया के साथ मिलकर देश के आठ राज्यों में कांग्रेस को आजादी के दौर के इतिहास में पहली बार पराजित किया और संविद सरकारों का गठन कर दिखाया।

एक जननेता के तेवर से एकदम ही विलग नानाजी का व्यक्तित्व एक विलक्षण संगठनकर्ता का था। इस व्यक्तित्व की सबसे अधिक अखिल भारतीय पहचान बनी थी, १९७२७५ जेपी आंदोलन के दौर में। जबकि अहमदाबाद गुजरात के छात्रों से शुरू हुआ आंदोलन, अतिशीघ्र बिहार और यूपी के विद्यार्थियों के बीच फैल गया। छात्र आंदोलन को जयप्रकाश नारायण जैसे नेता के समर्थन प्रदान करने के पश्चात यह आंदोलन जल्द ही एक जन आंदोलन में तब्दील हो गया। आंदोलन के जबरदस्त संगठनकर्ता के रूप में जेपी ने भी उनका लोहा माना था। इन पंक्तियों के लेखक से नानाजी का प्रथम घनिष्ठ परिचय जेपी आंदोलन के दौर में ही हुआ था। जबकि देशभर में दौरा करके नानाजी जेपी आंदोलन के अग्रणी संघर्षकर्ताआें को संगठित और संबोधित किया करते थे।

इंदिरा गांधी ने सोशलिस्ट नेता राजनारायण की चुनाव याचिका पर इलाहाबाद हाईकोर्ट का अपने विरुद्ध फैसला आने के पश्चात २५ जून १९७५ को आपातकाल देश पर थोप दिया था। जेपी आंदोलन के तकरीबन एक लाख से अधिक कार्यकर्ताआें को जेल की सलाखों के पीछे धकेल दिया गया था। नानाजी गिरफ्तार कर लिए गए और १९ महीनों तक जेल में रहे। फरवरी १९७७ में आपातकाल का अंत हुआ और आम चुनाव हुए। भारतीय जनसंघ संगठन कांग्रेस, भारतीय क्रांति दल और सोशलिस्ट पार्टी के नेताआें ने अपने दलों का विलय अंजाम देकर जनता पार्टी का सृजन किया और मिलकर चुनाव में उतरे परिणामस्वरुप इंदिरा गांधी और उनकी कांग्रेस पराजित हुई। मोरारजी देसाई देश के प्रधानमंत्री बने और उन्होंने नानाजी को अपनी कैबिनेट में वरिष्ठ मंत्री का दर्जा प्रदान किया। किंतु अपने आदशा] का कठोरता से पालन करते हुए ६० वर्ष की आयु हो जाने के कारण उन्होंने राजनीति से संन्यास लेकर अपना शेष जीवन सामाजिक और सांस्कृतिक काया] के लिए अर्पित कर दिया।

सबसे पहले नानाजी ने उत्तर प्रदेश के गौंडा को अपनी सामाजिक कार्य की कार्यस्थली बनाया। इसके बाद नानाजी ने राजधानी दिल्ली में दीनदयाल शोध संस्थान की आधारशिला रखी। जिसके तहत एक शोध पत्रिका मंथन का प्रकाशन प्रारंभ हुआ। मंथन के तहत देश की परस्पर विरोधी विचारधाराआें के आपसी संवाद और समन्वय का प्रयास शुरू किया गया। इन पंक्तियों के लेखक को भी भारतीय वामपक्ष के एक प्रतिनिधि के तौर पर मंथन के बहस मुबाहिसों में शिरकत करने का अवसर प्राप्त हुआ।

चित्रकूट धाम में देश के प्रथम ग्रामोदय विश्वविद्यालय की बुनियाद नानाजी देशमुख ने रखी और इसके प्रथम कुलपति नियुक्त हुए। नानाजी ने देशभर के मूर्धन्य विद्वानों और वैज्ञानिकों को इस विश्वविद्यालय से बाकायदा ज़ोडा। गांव के गरीब मेहनतकशों के जीवन को संवारने के लिए नानाजी देशमुख ने अप्रतिम प्रयास किया। वह जीवनपर्यन्त एक जबरदस्त संगठनकर्ता रहे देश और दुनिया के तमाम हिस्सों से उनका निरंतर संपर्क बना रहता था।

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