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अमेरिका में प्रशिक्षित अधिकारी ही तालिबान के प्रशिक्षक

Swatantra Vaartha  Mon, 8 Mar 2010, IST

अमेरिका में प्रशिक्षित अधिकारी ही तालिबान के प्रशिक्षक

प्रतिष्ठित अमेरिकी दैनिक ‘न्यूयार्क टाइम्स’ की रिपोर्ट के अनुसार पाकिस्तान के पूर्व सैन्य अधिकारी ही तालिबान को प्रशिक्षण देने के कार्य में लगे हैं। इनमें से बहुत से वे सैन्य अधिकारी हैं जिन्हें अमेरिका की प्रतिष्ठित ‘मिलिट्री एकेडमी’ में अमेरिकी सरकार ने स्वयं उच्चस्तर का सैन्य प्रशिक्षण दिया था। पाकिस्तानी सेना के एक रिटायर्ड कर्नल इमाम के साक्षात्कार के हवाले से दैनिक ने लिखा है १९८० के दशक में सोवियत सैनिकों से ल़डने के लिए जिन तालिबान को अफगानिस्तान भेजा गया था उन्हें पाकिस्तान की सैन्य गुप्तचर संस्था आईएसआई के अधिकारियों ने विशेष रूप से प्रशिक्षित किया था और इन अधिकारियों को प्रशिक्षित करने का काम अमेरिका ने किया था। इन्हें प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष दोनों तरह की युद्धकला सिखाई गई थी। गुरिल्ला युद्धशैली की नई तकनीकें विशेष रूप से सिखाई गई थीं। आज वे ही सैन्य अधिकारी तालिबान की नई पौध को प्रशिक्षण देने में लगे हैं।

उपर्युक्त कर्नल इमाम का असली नाम ब्रिगेडियर सुलतान अमीर है। सोवियत सेनाआें से युद्ध के दौरान यह तालिबान नेता मुल्ला मुहम्मद उमर के सर्वाधिक नजदीकी लोगों में शामिल था। अफगानिस्तान में सोवियत सेना की पराजय के बाद जब काबुल में तालिबान की सरकार बनी और मुल्ला उमर राष्ट्रपति की कुर्सी पर बैठे तो सुलतान अमीर उनसे मिलने गया था। वह बाद में भी लगातार उनके संपर्क में था और ९/११ की घटना के बाद भी मुल्ला से मिलने गया था। उसने उन्हें सलाह दी थी कि वह अमेरिका के सामने घुटने न टेकें, बल्कि ल़डने के लिए कमर कसें लेकिन अपनी गुरिल्ला रणनीति न छ़ोडें। अमीर काबुल से तभी लौटे जब वहां अमेरिकी बमबारी शुरू हो गईथी।

पूर्व पाकिस्तानी सैनिक अधिकारी तालिबान ल़डाकों को प्रशिक्षण देने का काम कर रहे हैं यह कोई छिपी बात नहीं है, किन्तु उसके ब्रिगेडियर जैसे उच्च सैनिक अफसर (जिन्हें अमेरिका ने विशेषरूप से प्रशिक्षित किया था) इस प्रशिक्षण कार्य में लगे हैं इसका इतना स्पष्ट खुलासा पहली बार हुआ है। इन सैन्य अधिकारियों को प्राय: पूरी अमेरिकी रणनीति पता है। वे जानते हैं कि तालिबान को त़ोडने के लिए वे क्याक्या कर सकते हैं। उन्हें मनोवैज्ञानिक युद्ध की तकनीकें भी मालूम हैं, इसलिए वे उनके सबसे अच्छे प्रशिक्षक हैं। अमेरिका ने शायद कभी सोचा भी नहीं रहा होगा कि जिन्हें वह आज प्रशिक्षित कर रहा है कल वे उसकी ही युद्ध तकनीक का उसके ही खिलाफ इस्तेमाल करेंगे। लेकिन यह अब एक यथार्थ है जिससे उसे जूझना है। इस्लामी दुनिया की वे ही सारी शक्तियां, जिनको उसने सोवियत संघ के खिलाफ इस्तेमाल किया था, अब स्वयं उसके खिलाफ शस्त्रबद्ध होकर ख़डी हैं। यही कारण है कि अब अमेरिकी रणनीतिकार अफगानिस्तान से बाहर निकलने की उतावली में हैं और तालिबान के साथ कोई शांति समझौता करने की फिराक में है।

अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा की पूरी कोशिश है कि किसी तरह तालिबान के साथ ऐसा कोई समझौता हो जाए कि अमेरिकी सेना सम्मान के साथ वहां से बाहर निकल सके। अभी संयुक्त राष्ट्र संघ मिशन के काबुल स्थित दूत काई इडे ने कहा कि अफगान मसले का कोई राजनीतिक समाधान ढूंढा जाना चाहिए। अफगानिस्तान में मिशन लीडर के तौर पर यह उनकी अंतिम प्रेस कांफ्रेंस थी। निश्चय ही उनके इस कथन में उनका अपना आकलन झलक रहा था। ८ वर्ष पुराने इस युद्ध में यदि अब तक अमेरिका को कोई सैनिक सफलता उपलब्ध नहीं हुई है तो आगे भी क्या उम्मीद है! लेकिन सवाल है कि क्या अमेरिका आतंकवाद को पराजित करने का अपना लक्ष्य प्राप्त किये बिना वहां से निकल सकेगा ?

उलटी प़डी चीनी अधिकारी की टिप्पणी

एक वरिष्ठ चीनी अधिकारी ने १६वीं शताब्दी में जन्में छठें दलाई लामा त्सांगयांग ग्यात्सो के बारे में जो टिप्पणी की है वो चीन के लिए उलटी प़ड गई है। भारत के अरुणाचल प्रदेश पर चीन के अधिकार का दावा इसी आधार पर है कि इसके तावांग शहर में तिब्बती धार्मिक शासन के छठे प्रमुख यानी दलाई लामा त्सांगयांग ग्यात्सो का जन्म हुआ था। उनके जन्म स्थल के आधार पर इस क्षेत्र को तिब्बत का अंग माना जाता है। और चीनी व्याख्या के अनुसार तावांग तिब्बत यानी चीन का है तो पूरा अरुणाचल उसका हो गया। किन्तु चीनी अधिकारी ली झाओत्सिंग ने अपनी टिप्पणी से ग़डब़ड कर लिया।

ली झाओत्सिंग चीनी संसद के मुख्य प्रवक्ता है। पिछले दिनों उन्होंने छठें दलाई लामा की ब़डी तीखी आलोचना की और उन्हें दलाई लामा यानी तिब्बत जैसे बौद्ध संस्कृति वाले राज्य का शासक होने के योग्य नहीं बताया। ये दलाई लामा प्रेमगीत लिखते थे। उन्होंने असत्य (झूठ) पर भी एक गीत लिखा है। झूठ के बारे में उन्होंने लिखा है कि यह रंगीन होता है और खुशबूदार होता है। आप इसके रंग का आकर्षण और खुशबू की मोहकता का अनुभव कर सकते हैं। अब बौद्ध धर्म के पवित्र और साधनामय जीवन में यह सब कैसे चल सकता है। तो यदि यह सब नहीं चल सकता तो तावांग का भी तिब्बत से क्या लेना देना। वास्तव में चीनी अधिकारी लामाआें की प्रतिष्ठा घटाने के लिए ऐसी टिप्पणी करते रहते हैं, किन्तु ली की यह टिप्पणी चीन के लिए उलटी प़ड गई है।

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