पीएम टफ या सोनिया गांधी ?
इस सप्ताह दो तीन चौंकाने वाली बातें हुई। पेट्रोलियम पदाथा] की कीमतों में रोलबैक नहीं हुआ। महिला आरक्षण बिल को राज्यसभा में रखने का फैसला हुआ और सूचना अधिकार कानून में सोनिया गांधी और मनमोहनसिंह में मतभिन्नता झलकी। लोकसभा में भारतपाक वार्ता के मुद्दे पर मनमोहनसिंह और लालकृष्ण आडवाणी की नोकझोंक भी चौंकाने वाली थी। मनमोहनसिंह ने तेवर दिखाए। इन बातों का अर्थ प्रधानमंत्री मनमोहनसिंह का टफ होना है। मनमोहनसिंह और प्रणव मुखर्जी के अडने से ही कांग्रेस कोर कमेटी का मूल्य वृद्धि पर ठप्पा लगा। प्रधानमंत्री ने सऊदी अरब से लौटते वक्त पत्रकारों से पेट्रोलडीजल की मूल्य वृद्धि में रोलबैक नहीं होने की दो टूक बात कही। जबकि उससे पहले प्रणव मुखर्जी लचीले दिखे थे। उन्होंने ममता बनर्जी और करूणानिधी के विरोध की चिंता की थी। लेकिन मनमोहनसिंह का दो टूक स्टैंड था। इसलिए मंगलवार की डेढ घंटे की कोर कमेटी में फैसला वही हुआ जो प्रधानमंत्री मनमोहनसिंह का स्टैंड था।
दरअसल बजट पर मनमोहनसिंह और प्रणव मुखर्जी की एकजुटता के आगे कांग्रेस में कोई कुछ नहीं कर सकता है। इनके सख्त स्टैंड से ही सहयोगी दलों से बात करने का फैसला हुआ। नतीजतन प्रणव मुखर्जी ने बात की और एक बातचीत से ही ममता बनर्जी करूणानिधी और शरद पवार सभी लाईन में आ गए। हालांकि ममता बनर्जी और करूणानिधि अपना विरोध बता कर अपनी राजनीति पका चुके है। जो हो, उसके बाद सरकार ने महिला आरक्षण बिल का दांव चला, ताकि विपक्षी एकजुटता की असलियत भी जाहिर हो। मोटे तौर पर महिला आरक्षण बिल सोनिया गांधी की वजह से है तो सख्त बजट, पाकिस्तान के साथ बातचीत में मनमोहनसिंह की सोच काम कर रही है। हां, यह हैरानी वाली बात है कि सूचना अधिकार को नहीं बदलने की सोनिया गांधी की हिदायत के जवाब में मनमोहनसिंह ने संशोधन की जरूरत वाला पत्र भिजवाया।
क्या रोलबैक बिल्कुल नहीं ?
सवाल है क्या कांग्रेस कोर कमेटी में पेट्रोलियम पदाथा] की कीमतों में रोलबैक पर पूरी तरह ना हुई है ? लगता है कुछ गुंजाईश छ़ोडी गई है। कोर कमेटी में ममता बनर्जी और करूणानिधी दोनों के प्रधानमंत्री को लिखे गए पत्रों पर विचार हुआ। मोटे तौर पर डीजल की कीमत में कुछ कमी का सुझाव दमदार था। लेकिन यह भी सोचा गया कि अभी तुरंत रोलबैक करना विपक्ष के दबाव में आकर झुकना माना जाएगा। सरकार तुरंत ऐसा कुछ नहीं करेगी जिससे झुकने का मैसेज जाए। इसलिए तृणमूल कांग्रेस, डीएमके और एनसीपी को सख्ती के साथ एकजुट रहने के लिए कहते हुए संसद में यूपीए की एकजुटता दिखलाई जाने के लिए काम हो। इसी अनुसार प्रणव मुखर्जी की नेताआें से बात हुई। नतीजतन कोलकत्ता में ममता बनर्जी ने कहा हम यूपीए में है और बने रहेंगे। उधर चेन्नई में करूणानिधी की बेटी कनीमोझी ने कहा डीएमके यूपीए का हिस्सा है। एलायंस में अलगअलग राय हो सकती है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि एलायंस टूटे। ऐसे ही एनसीपी की तरफ से तारीक अनवर का बयान आया। मोटे तौर पर मनमोहन सरकार कटौती प्रस्तावों का डटकर सामना करेगी। यदि बिना दबाव में होने का माहौल बना तो अपने आप डीजल के मामले में वित्त मंत्री बजट बहस के जवाब के वक्त किसान के हवाले कुछ रियायत दे सकते हैं।
सोनिया, सुषमा और वृंदा
सोनिया गांधी, सुषमा स्वराज और वृंदा करात ने गजब डॉयलॉग बोले। सोनिया गांधी ने दो टूक शब्दों में कहा मेरे लिए महिला आरक्षण बिल सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। यदि ८ मार्च काेे अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के शताब्दी के दिन यह पास हुआ तो उसका कोई जवाब नहीं होगा। उधर विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज ने कहा भाजपा इसके लिए तीन लाइन की व्हीप जारी करेगी। सभी को सदन में रहकर वोट देने के लिए कहेगी। सीपीएम की नेता वृंदा करात ने दोनो को पीछे छोडते हुए कहायदि बिल पास नहीं हुआ तो सदन महिलाआें के आंसुआें से भर जाएगा। सो मुमकिन है ८ मार्च को यानी आज राज्यसभा में महिला आरक्षण बिल पास हो ही जाए। यह भी मुमकिन है कि इधर बिल पास हो और उधर भाजपा के अध्यक्ष नितिन गडकरी अपनी टीम घोषित करके उसमें एकतिहाई महिला चेहरों को आगे करें। मतलब लंबी चौडी लिस्ट में वसुंधरा राजे, सुमिता महाजन, करूणा शुक्ला, हेमामालिनी, किरण माहेश्वरी, स्मृति ईरानी, जसकौर मीणा, किरण घई, सरोज पांडे, शोभा करंदजाले, अनिता आर्य, आरती मेहरा, नजमा हैपतुल्ला, अनसुईया उईके, दमयंती गोयल, वीणा त्रिपाठी, पूनम महाजन, साइना एनसी को पद मिल सकते हैं। जाहिर है कांग्रेस, भाजपा और लेफ्ट तीनों में आबादी के आधे हिस्से को सत्ता दिलवाने के श्रेय की छटपटाहट है। राज्यसभा और लोकसभा दोनों में महिला आरक्षण बिल के लिए जरूरी दोतिहाई बहुमत बन गया है। सोनिया गांधी और राहुल गांधी दोनों ने निजी तौर पर इस बिल के साथ जैसे अपनी प्रतिष्ठा जोडी है उसके चलते कांग्रेस के संसदीय मैनेजरों के लिए ज्यादा से ज्यादा पार्टियों को पक्ष में बनवाना जरूरी हो गया है। मोटेतौरे पर राज्यसभा की मौजूदा २३३ सांसदों की संख्या में दोतिहाई बहुमत का मतलब १५५ सांसद है। लेकिन बिल के पक्ष में पहले से ही १६४ सांसद है। उधर ५४४ सांसदों की लोकसभा में दोतिहाई के लिए ३६३ सांसदों का आंकडा चाहिए और बिल के पक्ष में ४१० सांसदों के समर्थन का आंकडा बना हुआ है।
यादव नेताआें का महिला विरोध
शरद यादव और लालू यादव की राय में राहुल गांधी की राजनीति गमले में खेती उगाने जैसी है। इसी गलतफहमी में लालू यादव ने बिहार में कांग्रेस को धत्ता बता कर अकेले चुनाव लडने की गलती की। अब फिर वैसी ही कर रहे हैं। महिला आरक्षण बिल को भी लालू यादव राहुल गांधी की गमले में राजनीति का एक हिस्सा मानते हैं। असलियत में यह कांग्रेस का बहुत मारक औजार होगा। बिहार के आगामी विधानसभा चुनाव में लालू यादव की जमीन खिसकेगी। उन्हें अपना खेत दिखलाई देगा और न गमला। इसलिए कि पिछलेे चार सालों में बिहार के गांव और बूथ स्तर तक महिलाएं भारी सक्रिय है।
नीतिश कुमार ने ५० फिसदी आरक्षण करके महिलाआें को पंच बनाया, उन्हें जागरूक किया। लोकल सत्ता में काबिज ये पचास फीसदी महिलाएं देख रही है कि कैसे जहां कांग्रेस और राहुल गांधी उन्हें सत्ता दिलवाने वाला बिल ला रहे है वही लालू यादव हुडदंग मचाकर उसे पास नहीं होने दे रहे हैं। यूपीए के पहले टर्म में नौजवानों के बीच राहुल गांधी का जलवा बना था। यूपीए के इस दूसरे टर्म में कांग्रेस को महिला आरक्षण बिल बिहार और उत्तरप्रदेश दोनों में ख़डा करवाएगा। यदि कांग्रेस ने कायदे से महिला आरक्षण की उपलब्धि का प्रचार किया तो एकएक बूथ और पंचसरपंच के स्तर पर लालू और मुलायमसिंह यादव के खिलाफ महिलाएं गोलबंद होगी। एक जानकार कांग्रेस नेता के अनुसार इस सत्र में बिल राज्यसभा में पास होगा। लोकसभा में बिल पास कराने के लिए मानसून सत्र का इरादा है। ताकि ठीक बिहार विधानसभा से पहले लालू और शरद यादव का विरोध बिहार के गांवगांव की महिलाआें के बीच पहुंचे और आरजेडी, जदयू की हवा खराब हो। लालू के महिला विरोधी चेहरे को कांग्रेस बिहार के चुनाव में ब़डा मुद्दा बनाएगी । कांग्रेस के लिए फारवर्ड, नौजवान और महिलाआें के वोटों का आधाअधूरा गणित भी उसे ख़डा करवा देने वाला होगा। बहरहाल हैरानी की बात लालू यादव के सुर में जदयू के ललनसिंह का लोकसभा में महिला बिल का विरोध था। दरअसल नीतिशकुमार ने पंचायतों में महिलाआें के आरक्षण का जो साहसिक फैसला किया था उस पर पानी फेरना ललनसिंह का अब एक मकसद है। नीतिश कुमार महिला आरक्षण के नाम पर वोट लेना चाहेंगे वहीं ललनसिंह एंड पार्टी ऐसा नहीं होने देगी।
झारखंड में अगला सीएम हेमंत
झारखंड की राजनीति में गजब हो रहा है। शिबू सोरेन अभी विधायक नहीं है। छह महिने बाद वे तभी मुख्यमंत्री बने रह सकते है जब विधायक चुन कर आएं। लेकिन तीन महिने होने को है उन्होंने अपने चुनाव के लिए सीट खली नहीं कराई है। इसलिए कि छह महिने बाद वे मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देंगे। अपने बेटे हेमंत सोरेन को बतौर मुख्यमंत्री शपथ दिलवाएंगे। भाजपा के आला नेताआें में हेमंत सोरेन को मान लेने की सहमति बन गई है। भाजपा को फायदा यह है कि हेमंत सोरेन के मुख्यमंत्री बनने से कुछ तो फाइलें चलेगी। काम होगा। भाजपा आला नेताआें के अनुसार सोरेन परिवार की झारखंड मुक्ति मोर्चा बिखराव के दौर में है। विधायकों और कार्यकर्ताआें में विद्रोह है। बीमार शिबू सोरेन की वजह से बाद में उनका आदिवासी आधार भाजपा की तरफ शिफ्ट होगा। अगले एकडेढ साल जैसेतैसे साथ रह कर जेएमएम के जन आधार को भाजपा से जोडने की रणनीति है। इसके लिए अर्जुन मुंडा को प्रदेश अध्यक्ष बनाने का सुझाव है, ताकि जेएमएम की बैकग्राउंड के अर्जुन मुंडा शिबू सोरेन के बाद उनके आधार को भाजपा से ज़ुडवा दें। लेकिन झारखंड में भाजपा की अंदरूनी खिंचतान अर्जुन मुंडा को झारखंड से दूर रख कर दिल्ली में महासचिव बनवाने की राजनीति भी हो रही है। उधर जेएमएम में पुराने नेता हेमलाल आदि चाह रहे हैं कि छह महिने बाद शिबू सोरेन इस्तीफा देकर अपनी पत्नी रूपी सोरेन को मुख्यमंत्री बनाए। रूपी सोरेन के चलते पार्टी वाले काबू में रहेंगे। रूपी सोरेन खुद भी बनना चाहती है । जो हो, शिबू सोरेन का मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा तय है।
नीतिश के सांसद
बिहार के मुख्यमंत्री नीतिशकुमार ने अपनी ताकत पर जिन चेहरों को राज्यसभा भेजा वे कैसे एकएक कर उनकी मुसबीत बने है, इसकी उनकी पीडा इन दिनों देखते बनती है। यह सुनकर अपने को भी हैरानी हुई कि एनके सिंह से भी नीतिश बहुत खफा है। कहते है एक समारोह में एनकेसिंह और नीतिशकुमार का आमनासामना हुआ तो नीतिश बोले बहुत उड रहे है इन दिनों आप। मेरे खिलाफ बहुत गंदगी फैला रहे हैं। यदि यह किस्सा सही है तो एनके सिंह भी अब ललनसिंह के साथ है। इन दोनों को नीतिश कुमार ने कभी सिर पर बैठाया था। ललनसिंह की अपनी कोई राजनैतिक हैसियत नहीं थी। दोस्त होने की वजह से नीतिश कुमार ने ललनसिंह की दुकान सजवाई। प्रदेश अध्यक्ष बना कर नीतिश कुमार ने पार्टी नेताआें और कार्यकर्ताआें के लिए ललनसिंह की सुपर सीएम वाली हैसियत बनवाई। ललनसिंह ने खुद अहंकार में बिहार के जदयू नेेताआें को औकात बताई। अब वही ललनसिंह नीतिशकुमार के लिए भस्मासुर बने हुए है। बहरहाल ललनसिंहएनकेसिंह ने यह थीसिस दी हुई है कि बिहार में नीतिश कुमार को कैसे चलना चाहिए। एनकेसिंह के अलावा नीतिश कुमार ने किंग महेंद्र को भी राज्यसभा सांसद बना कर भेजा था। एक मायने में दोनों नीतिशकुमार के इस दावे का जवाब है कि मेरी कोई टकसाल नहीं है। किग महेंद्र और एनकेसिंह के अलावा एजाज अली, अनवर अली को भी नीतिशकुमार ने राज्यसभा भिजवाया। ये कैसे और कितने उपयोगी साबित हुए होंगे, इसका जवाब ढूंढे तो यही निकलेगा कि सभी के पर निकल आए है। खूब हवा में उड रहे है। यह भी जान लें कि राज्यसभा वाले ही नहीं, बल्कि नीतिश कुमार के बनवाए लोकसभा के भी कई सांसद उड रहे है। कांग्रेस ही लिफ्ट नहीं दे रही है।
ऐसी सुरक्षा का मैसेज
गृहमंत्री चिंदबरम और दिल्ली पुलिस देश दुनिया को यह मैसेज दे रहे है कि भारत बहुत असुरक्षित देश है। जिस तरह के सख्त सुरक्षा बंदोबस्तों में विश्व कप हॉकी का आयोजन हुआ है उसका देश और दुनिया को यही मैसेज है कि भारत में आतंकी हमलों का जबरदस्त खतरा है। दिल्ली का नेशनल स्टेडियम पुलिस लाइंस सा बना हुआ है। पांच हजार पुलिसकर्मी, १०० कमांडों और एक हजार पैरामीलिट्री फोर्स से स्टेडियम का चप्पाचप्पा कवर है। क्या पत्रकार हो और क्या हॉकी संगठन के अधिकारी, सभी लोग सुरक्षाकर्मियों की नाकेबंदी को बारबार झेल रहे हैं। पत्रकारों ने एक्रीडेशन कार्ड में पुलिसिया लेटलतीफी और प्रैक्टीस मैचों में पहुंच नहीं होने के विरोध में प्रेस कांफ्रेसों का बहिष्कार हुआ।
यही नहीं हॉकी महासंघ एफआईएच के अध्यक्ष लियांद्रो नेग्रे को भी सुरक्षाकर्मियों ने रोका। मशीनगन ताने कई घेरों के सुरक्षा कर्मियों में खिलाडी और दर्शक कैसा महसूस करते होंगे, इसका अनुमान लगाया जा सकता है। चार टायर का सेक्यूरिटी अरेंजमेंट है। दर्शक के लिए स्टेडियम जाने की पहली पुलिस चैक बहुत दूर इंडिया गेट पर है। फिर स्टेडियम के मेन गेट, उसके बाद स्टेडियम के ब्लाक और फिर सीट की तरफ जाने पर चैकिंग होती है। कोई सौ सीसीटीवी कैमरा लगे है। जिस मैरिडियन होटल में खिलाडी है वहां एक्सरे स्कैनर से लेकर कमांडों फोर्स के बंदोबस्त है। एक हॉकी आयोजन के लिए जब इतना बंदोबस्त है तो कॉमनवेल्थ के लिए कैसे बंदोबस्त होंगे इसका अनुमान लगा सकते हैं। कहीं ऐसा नहीं हो कि विश्व कप के इस डरावने अनुभव पर कॉमनवेल्थ देश कह दें हम दिल्ली में खेलने को तैयार नहीं है।
