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बाजार से रोजगार बनाइये

Swatantra Vaartha  Tue, 9 Mar 2010, IST

बाजार से रोजगार बनाइये

यूपीए सरकार का आम आदमी के प्रति नरम रुख है। रोजगार गारंटी कार्यक्रम से गरीबतम लोगों को निश्चित रूप से राहत मिली है। दो घंटा आधा अधूरा काम करके १०० रुपये मिल जाते हैं। पहले गांव में दिह़ाडी १००१२० रुपये थी। रोजगार गारंटी के लागू होने के बाद श्रमिक ८ घंटे मजदूरी करने के लिये १४०१५० रुपये की मांग कर रहे हैं। आम आदमी की आय में यह वृद्धि सुखद प्राप्ति है। कुछ विश्लेषकों का मत है कि इस कार्यक्रम के कारण लोग निकम्मे हो रहे हैं। उनकी काम करने की रूचि समाप्त हो गयी है। मेरा मानना है कि यह दुष्प्रभाव अल्पकालिक होगा। हर व्यक्ति की सुख हासिल करने की कामना होती है। कुछ दिन आराम करने के बाद गरीब के मन में टेलीवीजन आदि देखने की इच्छा अवश्य उत्पन्न होगी और वह पुनः रोजगार की तलाश में निकलेगा। अर्थव्यवस्था का मूल उद्‌देश्य आम आदमी को राहत पहुंचाना है। अतः आम आदमी को मिल रही राहत को अनदेखा नहीं करना चाहिये।

रोजगार गारंटी कार्यक्रम की मुख्य समस्या दूसरे स्थान पर है। इस कार्यक्रम को पोषित करने के लिये ब़डे शहरी उद्योगों पर टैक्स लगाया जाता है। अर्थ हुआ कि रोजगार गारंटी कार्यक्रम तब ही चलाया जा सकता है जब ब़डे उद्योगों को लाभ उन्नत हों। इन लाभों को कमाने के लिये ब़डे उद्योगों द्वारा ऑटोमेटिक मशीनों का उपयोग किया जायेगा और रोजगार का भक्षण होगा। ब़डे उद्योगों द्वारा पैदा की गयी बेरोजगारी की समस्या को इन्हीं उद्योगों पर टैक्स लगा कर हल करने का प्रयास किया जा रहा है। यह प्रक्रिया अंततः सफल नहीं होगी। आम आदमी को जितनी राहत रोजगार से मिलेगी उससे ज्यादा कष्ट ऑटोमेटिक मशीनों के उपयोग से होगा।

यूपीए सरकार के सामने मुख्य चुनौती है ऑटोमेटिक मशीनों से उत्पन्न होने वाली बेरोजगारी पर ही फुलस्टाप लगाया जाये। बाजार के माध्यम से ही रोजगार सृजन किया जाये जिससे रोजगार गारंटी जैसे कार्यक्रम की जरूरत ही न प़डे। तब न तो श्रमिकों में निकम्मापन आयेगा और न ही सरकारी तंत्र को भ्रष्टाचार में लिप्त हाेेने का अवसर मिलेगा। इस दिशा में अनेक कदम उठाये जा सकते हैं। जिस माल के उत्पादन में श्रम का योगदान ज्यादा है उस पर एक्साइज ड्‌यूटी, आयकर और सेल्स टैक्स की दरें कम कर दी जायें। सघन उद्यमों पर इन्हीं करों की दरों को ब़ढा दिया जाये। ऐसा करने से टैक्स की औसत दर पूर्ववत्‌ बनी रहेगी। परंतु उद्यमियों के लिये श्रमिकों से काम कराना लाभप्रद हो जायेगा। जो उद्योग ज्यादा संख्या में रोजगार बनायेंगे उन्हें टैक्स कम देना होगा। श्रम के अधिक उपयोग में हुये व्यय की भरपायी टैक्स में छूट से हो जायेगी। जिस प्रकार कंपनियों को इनर्जी ऑडिट कराना प़डता है उसी प्रकार रोजगार की ऑडिट कराई जा सकती है। सरकारी ठेकों एवं खरीद में श्रम सघन उत्पादन करने की शर्त लगाई जा सकती है। जो उद्यमी अधिक रोजगार देते हैं उन्हें पद्‌मश्री सरीखे सम्मान से नवाजा जाये।

वर्तमान में विश्व व्यापार का संचालन डब्लूटीओ के द्वारा किया जा रहा है। डब्लूटीओ में अमीर देशों के सेवा बाजार को जबरन खोलने की व्यवस्था नहीं है जबकि विकासशील देशों के कृषि एवं मैन्यूफैक्चर्ड माल के बाजार को जबरन खोलने की व्यवस्था है। अमीर देशों का प्रयास है कि डब्लूटीओ की परिधि को कृषि और औद्योगिक माल तक सीमित रखा जाये। सेवाआें को खोलने के विषय को सदस्य देशों की स्वेच्छा पर छ़ोड दिया गया है। भारत को तमाम विकासशील देशों को इस मुद्‌दे पर लामबन्द करना चाहिये और अमीर देशों में हमारे श्रमिकों के प्रवेश की मांग पर अ़डना चाहिये।

सरकार श्रम कानूनों को सरल और लचीला बनाना चाहती है। परंतु कुछ मध्यधारा विद्वानों का दबाव है कि घटते रोजगारों की स्थिति में श्रम कानूनों को सरल बनाना और घातक हो जायेगा। इस विचार में समस्या है। रोजगार भक्षण में मूल समस्या का समाधान क़डे श्रम कानून से हासिल नहीं होता है। बल्कि सख्त श्रम कानून बनाने से बचने के लिये उद्यमियों द्वारा ऑटोमेटिक मशीनों का उपयोग ज्यादा किया जा रहा है। श्रम कानून की दवा ही बेरोजगारी को ब़ढावा दे रही है। भूख से पी़डत व्यक्ति को एयरकंडीशंड कमरे में रखकर नहीं जिलाया जा सकता है। उसे भोजन खिलाने से ही जीवन दान मिलेगा। उसी प्रकार पूंजी सघन उत्पादन पर सख्त श्रम कानून लगाकर रोजगार उत्पन्न नहीं किया जा सकता है। श्रम सघन उत्पादन को प्रोत्साहित करने से ही समस्या का निदान होगा। उद्यमी के लिये अधिक संख्या में रोजगार उत्पन्न करने को आसान एवं सुखद बनाना होगा। साथसाथ रोजगार को प्रोत्साहित करने की दूसरी नीतियां लागू करना जरूरी है अन्यथा श्रम कानूनों का सरलीकरण जहर बन जायेगा।

प्रश्न उठता है कि वैश्वीकरण के युग में बाजार में ऐसी दखल टिक सकती है क्या ? रोजगार को प्रोत्साहन देने की इस पॉलिसी के कारण भारत में श्रमसघन उत्पादन की लागत ब़ढेगी जबकि हमारे प्रतिद्वन्दी देशों में पूंजीसघन उत्पादन से लागत न्यून रहेगी। यह समस्या वास्तविक है, परंतु इसका दूसरा निदान उपलब्ध है। दूसरे देशों के पूंजीसघन उत्पादन पर आयात कर ब़ढाना होगा और अपने श्रमसघन उत्पादन पर निर्यात्‌ सब्सीडी देनी होगी। मान लीजिये कप़डे के पूंजी सघन उत्पादन की लागत २० रु प्रति मीटर आती है। विश्व बाजार में कप़डे का यह मूल्य है। भारत के श्रम सघन उत्पादन में लागत २५ रु आती है। ऐसे में कप़डे पर ५ रु का अतिरिक्त आयात कर एवं निर्यात्‌ पर ५ रु की अतिरिक्त निर्यात सब्सीडी देनी होगी। तब हमारा श्रमसघन उद्योग वैश्विक प्रतिस्पर्धा में टिक सकेगा। हमें समझ लेना चाहिये कि आर्थिक वैश्वीकरण का अर्थ बेरोजगारी का भी वैश्वीकरण होता है। विश्व के सभी देशों को उस देश के बेरोजगारी के मानकों को स्वीकार करना होगा जो कि अधिकाधिक बेरोजगारी उत्पन्न करता है। अमेरीका के न्यून रोजगार के दबाव से सम्पूर्ण विश्व के श्रमिकों में हाहाकार मचा हुआ हम प्रत्यक्ष देख सकते हैं। इस समस्या के निदान के लिये वैश्वीकरण को संतुलित मात्रा में अपनाना होगा।

दुर्भाग्य है कि वित्त मंत्री द्वारा हाल में पेश किये गये बजट में रोजगार के सृजन पर तनिक भी ध्यान नहीं दिया गया है। वास्तव में रोजगार गारंटी कायक्रम में भी केवल दिखावटी वृद्धि की गयी है। पिछले वर्ष २००९१० के बजट में इस कार्यक्रम को ३९,१०० कऱोड रुपये आवंटित किये गये थे। आगामी वर्ष २०१०११ में इसे ब़ढाकर ४०,१०० कऱोड कर दिया गया है। १० प्रतिशत महंगाई को देखते हुये इस कार्यक्रम के अंतर्गत दी जाने वाली दिह़ाडी को १०० रुपये से ब़ढा कर कम से कम ११० रुपये करना था।

परंतु वित्तमंत्री ने आवंटित राशि पूर्ववत्‌ रखकर आम आदमी के साथ दोहरा छलावा किया है। पहले रोजगार को बाजार से उत्पन्न करने के स्थान पर रोजगार गारंटी के सरकारी कार्यक्रम के माध्यम से पैदा किया गया है। आम आदमी को बाजार की स्वतंत्रता से वंचित कर सरकारी अधिकारियों के हवाले कर दिया गया है। फिर उनकी दिह़ाडी पर प़ड रही महंगाई की मार से रक्षा नहीं की गयी है। यदि सरकारी कर्मचारियों को डीए मिलता है तो रोजगार गारंटी में भी मिलना चाहिये। अतः सरकार को इस कार्यक्रम में उलझने के स्थान पर बाजार को रोजगार की ओर म़ोडना चाहिये।

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