कर्ज में डूबी राज्य सरकारें
बंगाल, उत्तर प्रदेश सहित देश की कई राज्य सरकारें अपने खराब वित्तीय प्रबंधन और घटते राजस्व के कारण कर्ज में डूबती जा रही हैं। सरकारों की लोकलुभावन योजनाआें का असर अब राज्यों पर कर्ज के ब़ढते बोझ से जाहिर होने लगा है। दिवालिया होती इन राज्य सरकारों के कुछ कर्ज को तो केन्द्र सरकार ने माफ भी किया है, लेकिन काफी बकाया है। अब तक केन्द्र ने राज्यों का २१, ५७३ कऱोड रुपये माफ किया है। लेकिन इसके बावजूद राज्य सरकारों के काम काज के रवैये में कोई बदलाव नहीं आ रहा है। कर्ज के मामले में उत्तर प्रदेश की हालत काफी गंभीर है। अक्टूबर के अंत तक राज्य पर १,७६,५५० कऱोड रुपये का कुल कर्ज था जो मार्च तक १,८०,९९९ कऱोड रुपये हो जायेगा। प्रदेश की विधानसभा में पेश किये गये बजट के अनुसार २०११ तक यह कर्ज लगभग दो लाख कऱोड तक पहुंच जायेगा। केन्द्रीय वित्त मंत्रालय के आंक़डों के मुताबिक महाराष्ट्र की हालत भी खराब है। महाराष्ट्र पर १,६२,०७५ कऱोड, पश्चिम बंगाल पर १,३४,६४५ कऱोड, आन्ध्र प्रदेश पर १,१७,०८१ कऱोड और गुजरात पर ९६,८६४ कऱोड रुपये का कर्ज है। वित्तीय कुप्रबंधन के चलते राज्यों के राजकोषीय घाटे में भी लगातार ब़ढोत्तरी हो रही है। हालांकि आर्थिक मंदी के चलते राज्यों को २००९१० के लिए राजकोषीय घाटा लक्ष्य में केन्द्र सरकार ने छूट दी है। इसके मुताबिक राज्यों का राजकोषीय घाटा लक्ष्य सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का तीन प्रतिशत की बजाय चार प्रतिशत कर दिया गया है। हालांकि बीते सालों में राज्यों का राजकोषीय घाटा ब़ढाने में राज्यों पर ब़ढ रहे कजा] की भी अहम भूमिका है।
उत्तर भारत के अन्य राज्यों में पंजाब के कुल कर्ज को लेकर भी वित्त मंत्रालय चिंतित है। राज्य पर ६३००० कऱोड रुपये का कर्ज है। इसके अलावा उत्तरांचल पर १४,९६६ कऱोड रुपये और हिमाचल प्रदेश पर अक्टूबर के अंत तक १०,६०० कऱोड रुपये के कर्ज का बोझ था। इसी तरह जम्मूकश्मीर पर १०,८०३ कऱोड रुपये और हरियाणा पर ६,२४२ कऱोड रुपये का कर्ज है। जबकि बिहार पर १५,४०७ कऱोड रुपये का कर्ज है। मौजूदा हालात में राज्यों के कर्ज में और ज्यादा माफी मिलने की गुंजाइश नहीं है। हालांकि वित्त मंत्रालय इस बारे में विचार तभी करता है जब वित्त आयोग इसकी सिफारिश करता है। चूंकि राजस्व में कमी के चलते केन्द्र सरकार के खजाने की हालत भी बहुत अच्छी नहीं है। इसलिए सरकार किसी भी राज्य की कर्ज माफी के आवेदन को स्वीकारने की स्थिति में नहीं है। उत्तर प्रदेश की सरकार ने मूर्तियों और स्मारकों पर भारी धनराशि खर्च करके जहां राज्य की जनता पर कर्ज का बोझ ब़ढाया है वहीं अब इससे बुनियादी क्षेत्र के विकास के लिए निजी भागीदारी ब़ढाने का संकल्प व्यक्त किया है, लेकिन चीनी मिल मालिकों के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कराकर उसने उद्यमियों को जो संदेश दिया है उससे यह नहीं लगता है कि कोई उद्यमी यहां पूंजी लगाने के लिए उत्सुक होगा। पिछले सात महीनों में निजी निवेश के वार्षिक लक्ष्य का चौथाई भी वह हासिल नहीं कर सकी हैं।
कई राज्य सरकारें अनुत्पादक काया] में इतनी भारी भरकम धनराशि व्यय कर रही हैं कि वे अपने राज्य की जनता पर बोझ बन गयी हैं। इन राज्य सरकारों को अपने बजट का ६० फीसदी से अधिक हिस्सा अपने कर्मचारियों, अधिकारियों और शिक्षकों के वेतन और पेंशन पर व्यय करना प़ड रहा है। योजनागत विकास के लिए तो मामूली धनराशि ही बचती है। सबसे ब़डी बात तो यह है कि इन राज्य सरकारों के पास अपनी आय ब़ढाने के नाम पर जनता पर कर लगाने के सिवाय कोई रास्ता नहीं है। उनके अधीन जो भी कलकारखाने हैं वे भारी घाटे में हैं। कृषि और औद्योगिक विकास के जरिए राज्य की अर्थव्यवस्था को सुधारने और मजबूत बनाने की कोई काबिलियत राज्य सरकारों के मुख्यमंत्रियों और मंत्रियों में दिखाई ही नहीं देती। कभीकभी तो ऐसा लगता है कि हमारे राज्यों के मुख्यमंत्रियों के पास अपना कोई आर्थिक नजरिया ही नहीं है। हालांकि वह अपना औद्योगिक और कृषि उत्पादन ब़ढाकर एवं निर्यात करके अपने राज्य को खुशहाल बना सकते हैं। लेकिन कर्जदार राज्यों की भारी आबादी जहां रोजीरोटी और महंगाई के चक्रव्यूह में फंसी है वहीं उसके राजनेता देखते ही देखते मालामाल हो जाते हैं। कुल मिलाकर शासन व्यवस्था के नाम पर कई राज्यों में ऐसी अराजकता व्याप्त है कि उनकी हालत बद से बदतर होती जा रही है। राज्य सरकारें अपनी राजकोषीय जरूरतों को पूरा करने के लिए न सिर्फ बाजार से संसाधन जुटाती है, बल्कि केन्द्र सरकार भी राज्यों को वित्तीय सहायता के तौर पर राशि मुहैया कराती है। वित्त आयोग की सिफारिशों के अनुसार राज्यों को केन्द्र से मिलने वाली वित्तीय सहायता में से ७० प्रतिशत राशि कर्ज के तौर पर और ३० प्रतिशत राशि अनुदान के रूप में मिलती है। मगर राज्यों की बिग़डती राजकोषीय हालत और खराब वित्तीय प्रबंधन ने राज्यों का कर्ज प्रबंधन बिग़ाड दिया है।
अर्थव्यवस्था की टिकाऊ और समावेशी प्रगति यह दर्शाती है कि राज्य व्यापक और बुनियादी सम्पन्नता के लिए अपने वित्तीय संसाधनों का किस तरह प्रबंधन करता है। राज्य की प्रति व्यक्ति जीडीपी सम्पन्नता नापने के तीन पैमाने हैं। पहला शहरीकरण, दूसरा गरीबी रेखा से ऊपर रहने वाली जनसंख्या, तीसरा सरकारी निवेश का लक्ष्य सबकी आय में सुधार करना है और इसे प्रति व्यक्ति पूंजी खर्च द्वारा नापा जाता है। लेकिन सरकारी खर्च कर्ज कीमत पर न किया जाए। बुनियादी सुविधाआें में हुई प्रति व्यक्ति ब़ढोत्तरी एक अन्य पैमाना है जिसे टिकाऊ और समावेशी प्रगति मापने के लिए किया जाता है। इन सभी पैमानों के आधार पर बिहार, उत्तर प्रदेश, उडीसा, मध्य प्रदेश, असम, झारखंड, राजस्थान और बंगाल की गिनती क्रमशः सबसे पिछ़डे राज्यों में होती है। अब यह जाहिर हो चुका है कि कोई भी राज्य अब विरासत के लाभों पर निर्भर नहीं रह सकता है। राज्यों के सामने अपने प्रदेश की जनता के लिए रोजीरोटी का बेहतर प्रबंधन करने से लेकर पानी, बिजली, स़डक, अस्पताल और शिक्षा की सुविधा मुहैया कराने की चुनौतियां हैं। राज्य सरकारें अपनी जनता से तमाम तरह के कर (टैक्स) तो वसूलती हैं, लेकिन जवाबदेही, ईमानदारी और पारदर्शिता पर टिकी शासन प्रणाली के बजाय मनमाने ढंग से राजस्व का दुरुपयोग भी कर रही है। आखिकार कोई मंत्री या विधायक, सांसद बनते ही रातों रात मालामाल कैसे हो जाता है?
जाहिर है योजनाआें के मद की धनराशि का एक बहुत ब़डा हिस्सा भ्रष्ट राजनेता और अधिकारी खुद ह़डप लेते हैं। हैरान करने वाली बात यह है कि विशेष योजनाआें के बावजूद सबसे अधिक कर्जदार और फिसड्डी राज्यों की हालत नहीं सुधर रही है। उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश जैसे राज्य जो कृषि के मामले में दूसरे राज्यों की तुलना में प्राकृतिक दृष्टि से फायदे की स्थिति में हैं, तो भी काफी पिछ़डे हुए हैं। छत्तीसग़ढ, झारखंड और उ़डीसा की भी हालत खराब है। बीमार राज्यों में अतीत की विरासत पिछ़डेपन का ब़डा कारण है, लेकिन दुःख की बात यह है कि इन राज्यों ने उपलब्ध केन्द्रीय योजनाआें से लाभ लेने का प्रयास तक नहीं किया। आंक़डों के विश्लेषण से पता चलता है कि ये राज्य ग्रामीण क्षेत्र, प्राथमिक शिक्षा और ग्रामीण सम्पर्क के लिए उपलब्ध पैसे को खर्च करने के मामले में भी पिछ़डे हैं। निजी निवेश और विकास के मामले में गुजरात ने देश के अन्य राज्यों को नई राह दिखाई है। गुजरात में लोह की खदाने नहीं हैं, लेकिन वहां मजबूत इस्पात उद्योग है। राज्य में हीरे की खदाने भी नहीं है, लेकिन वैश्विक हीरा कारोबार में उसकी भारी भागीदारी है। अपनी जनता को पानी, बिजली मुहैया कराने में भी गुजरात अन्य राज्यों के लिए एक उदाहरण है। जाहिर है कि प्रदेश का मुख्यमंत्री ईमानदार, कर्मठ और कल्पनाशील हो तो वह अपने राज्य की दशा और दिशा बदल सकता है।
