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क्या भाजपा का बिगडा चरित्र सुधर सकेगा

Swatantra Vaartha  Wed, 10 Mar 2010, IST

क्या भाजपा का बिगडा चरित्र सुधर सकेगा

भारतीय जनता पार्टी के नूतन अयक्ष नितिन गडकरी ने विधिवत दायिव सभालने के बाद इदार में उस भाषा का योग किया है, जो कभी हमारे देश के राजनीतिक आचरण का मूलम हआ करता था, जिसके क्षरण का सकेत मिलने के कारण १९५१ में डाटर यामासाद मुखर्जी के नेतव में जनसघ की थापना हुइ थी। ‘पहले देश फिर पार्टी आर म सबसे बाद में’ राजनीति में यह ाथमिकता बदलती गइ आर ‘पहले हम फिर पार्टी, देश सबसे बाद मे’ का आचरण हावी होता गया। इसके जो परिणाम हए है, उसे हम भाचार आर परिवारवाद आदि के प में पहचानने तो जर लगे ह, लेकिन ऐसे लोगों का अनुशरण करने में किसी कार की आचरणहीनता नहीं मानते। राजनीतिक आचरण में बदलाव का ताव समाज में महामारी की तरह फलता जा रहा है। सब ओर आथाहीनता का या बढता जा रहा है तथा सोच निजी हित तक सीमित होती जा रही है। इसलिए यह आचयजनक तो है कि महगाइ की बढती विभीषिका के खिलाफ राजनीतिक दलों के अभियान में योगदान देने से यों समाज पूव की भाति भागीदारी नहीं कर रहा है, साथ ही चिंताजनक भी, योंकि जिस समाज को अयाय, अयाचार आर कुशासन के ति कोध भी नहीं आता वह समाज अपनी वव खोता जाता है। भारतीय जनसघ की थापना वव के अतिव का भाव जमाने के लिए हआ था। भारतीय जनसघ काल के उसके ाण दीनदयाल उपायाय भारतीय जनता पार्टी के लिए आदश रहे ह। आज भी ह, लेकिन बीच के काल में पार्टी ने उनकी इस चेतावनी का सज्ञान लेना छोड दिया था कि ‘यदि पार्टी अपने आदशा] से युत हो गइ तो वे जनसघ को भग कर देंगे।’ नितिन गडकरी ने इदार में यह कहकर कि ‘पाटी की समया नेता है, कायकता नहीं’ दीनदयाल जी की अभिय की गभीरता का फिर से सज्ञान लिया है।

गडकरी ने यह कहने में कोइ सकोच नहीं किया कि नेताआें के आचरण से भाजपा की वीकायता का क्षरण हआ है। सामायतया समीक्षकों ने गडकरी के आमालोचन को नजरदाज कर राम मदिर के मुददे पर मुलिम समुदाय से की गइ अपील को ही अधिक चचा का विषय बनाया है, योंकि उससे मतभेद उभारने का अवसर मिलता है, लेकिन उनके पार्टी की पहच बढाने आर देश पहले की ाथमिकता को वह महव नहीं दिया जो मिलना चाहिए। शायद इसका कारण यह हो सकता ह कि पिछले कुछ दशक से राजनीति इतनी य केंति हो गइ ह कि आदश, साित, नाि आचरण की शुचिता आदि की चचा सिर के ऊपर से गुजर जाता ह तथा ऐसी बात करने वालों को किसी अय दल के ‘नेताआें’ के यास की तुलना में खडा करके ताला जाता है। यही कारण है कि इदार अधिवेशन में सादगी के पयास को राहल गाधी के राजनीतिक अभियान का उार मानकर उभारा गया।

भारतीय जनता पार्टी का चरि भी रहा है आर उसके केींय साा तक पहचने का कारण भी, ‘पार्टी विद डिफरेस’ का दावा। इस दावे पर अवाम का विवास उसके नेताआें के निवाथ आचरण आर देश पहले की ाथमिकता को कें बिदु बनाने के कारण था। निजी जीवन की शुचिता आर साित नाि भाजपा कायकताआें को राजनीतिक विरोधियों में भी समानजनक भाव दान करता रहा है। विभि रायों आर फिर केींय साा का दायिव सभालने के बाद ‘माहाल की अपरिहायता’ के नाम पर आचरणीय शुचिता आर सातिक नाि में क्षरण को नजरदाज किए जाते रहने के कारण नेतव आम राजनीतिक चलन बन गए उन लोगों से घिरता गया जो हा में मिलाते रहने के अयत थे। बोलचाल की भाषा में उहें चापलूस कहा जाता है। भाजपा नेतव चाहे केींय तर का हो या राय काजो अमूमन मनोनयन के ारा थापित होता रहा हऐसे लोगों से घिरकर अपने सपक का दायरा सकुचित करता गया। उसने घेरे रहने वालों के अलावा उन लोगों की चिंता छोड दिया जो ‘बिना काज दाहिने बाये’ बने रहने में विवास नही रखते। फलत भाजपा का बहुत बडा वग जो आचरणीय शुचिता आर सातिक नाि की तिबता की अनुभूति रखता ह, निकय होता गया आर उन लोगों का दबदबा बढता गया जो ‘म पहले’ में जाने अनजाने विवास रखते है।

इसके कारण भाजपा की साख गिरती गइ। लोकसभा का २००४ में चुनाव हारने के बाद २००९ के लोकसभा चुनाव तक भाजपा ‘आफ द रिकाड’ बोलने वाले नेताआें के आचरण से इतना अधिक सराबोर हो गइ कि कुछ लोगों को यह कहने पर विवश होना पडा कि नेता अपना अतिव बनाये रखने के लिए समाचार पों पर निभर हो गए ह। सवमाय नेता अटल बिहारी वाजपेयी की अवथता के कारण जेता आर श्रेता के आधार पर पार्टी के माग दशक की भूमिका निभाने वाले लालकण आडवाणी की छवि बिगाडने का काम पहले ‘म’ के बढते भाव ने ही किया। अयथा आज भी ससद में डेढ सा से अधिक सदय वाली मुय विपक्षी पार्टी जिसकी छह रायों में अपने बहमत के आधार पर सरकार है तथा तीन मुख रायों की सरकारों में मुख प से भागीदार है तथा कइ रायों में मुय विपक्षी दल की भूमिका निभा रही है, के ति वसी निराशाजनक भावना का उदय नहीं होता जसा पिछले कुछ वषो से बढता जा रहा है। गडकरी ने कहा है कि कायकताआें की पहचान दिली का चर लगाने से नहीं, गावगाव सकियता के आधार पर होगी। यह तभी सभव है, जब परिकमा के पराकम से तािपित होने की परपरा को समा किया जाए।

नितिन गडकरी ने इस माहाल का ठीक से सज्ञान लिया है, इससे इकार नहीं किया जा सकता, लेकिन यह अपेक्षा करना कि उनके हाथ में कोइ जादुइ छडी ह, जिसे घुमाकर एक दिन में माहाल बदल देंगे, अनुचित होगा। उनके ारा पार्टी में पहले म का सज्ञान पर लेने से आम कायकताआें में पठ गइ निराशा दूर हइ ह, इसमें सदेह नहीं ह। अब आवयकता ह कि जो बिना काज दाये बाये बने रहकर भाजपा की छवि बिगाडते रहे ह, ऐसे लोगों से सगठन को मु दिलाकर उन हनुमान भावना वाले कायकताआें को सकिय करने का जो दिए हए दायिव को निभाने के लिए समु पार कर सकने की क्षमता रखते ह आर कोइ दायिव न मिलने पर घर बठकर भजन करते है। न मागते ह आर न दायिव निभाने से इनकार करते ह। गडकरी के लिए ऐसे लोगों को सकिय करने की चुनाती सबसे महवपूण है। उहोंने अब तक अपने आचरण की सहजता आर अभिय की भाषा से इसी दिशा में बढने का सकेत दिया है।

आडबरयु आचरण से भाजपा कायकताआें को परहेज रहा है, आज भी है। आडबरहीन सहजता भाजपा की वीकायता का कारण बनी है, योंकि इसी से इस विवास को बल मिलता है कि कथनी आर करनी में कोइ अतर नहीं ह। भाजपा की सरकारों की तुलनामक शसा हो रही है। इतना ही काफी नहीं है, उसकी चचा तुलनामक नहीं गुणामक ढाचे से होनी चाहिए। इसके अलावा भाजपा को सगठनामक वप ‘मेरे लिए अनुकूलता’ के बजाय भाजपा के मूल भाव देश पहले फिर पार्टी म सबसे बाद में के आधार पर खडा होना चाहिए। गडकरी के लिए सबसे बडी चुनाती उस बिहार से भी (जहा इस वष चुनाव होने जा रहे है) अधिक उार पदेश ह, जहा से लोकसभा के लिए असी सदय चुने जाते है। इस राय में पाटी पहले से खिसक कर चाथे थान पर इसलिए पहच गइ ह, योंकि ‘मेरे लिए अनुकूलता’ की ाथमिकता के आधार पर उसका वप खडा किया जाता रहा ह। ययाेिं के लिए पार्टी के पदों का सजन करने के बजाय पार्टी के लिए पदों पर ययाेिं के चयन का जसा वप उभरेगा, भाजपा को उसकी पूव मायता दिलाने में गडकरी को वसी सफलता मिल सकेगी। उनसे भाजपा कायकताआें को ही नहीं, पार्टी के आलोचकों को भी ऐसी ही दिशा में बढने की अपेक्षा ह। पिछले दिनों लालकण आडवाणी ने कहा ह कि राजनीतिक लोगों के बारे मे आम धारणा है कि वे बेइमान ह। नये आयाम में भाजपा को इस माहाल को बदलने की भी चुनाती है, जिसका उार आचरण की शुचिता आर जनहित की ाथमिकता से दिया जा सके, सुनिचित करना होगा।



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