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सोनिया गांधी के राजनीतिक साहस का परिणाम

Swatantra Vaartha  Thu, 11 Mar 2010, IST

सोनिया गांधी के राजनीतिक साहस का परिणाम

एक बार फिर सोनिया गांधी के राजनीतिक साहस की प्रशंसा करनी होगी। २००८ में उन्होंने अमेरिका के साथ परमाणु समझौते को लेकर भी अपूर्व राजनीतिक साहस का परिचय दिया था। उन्होंने न केवल अपनी सरकार को दांव पर लगा दिया था, बल्कि मुस्लिम वोटों की नाराजगी का भी खतरा उठाया था। देश का मुस्लिम समुदाय अमेरिका के साथ किसी भी ऐसे करार के सख्त खिलाफ था। वामपंथी तथा अन्य विरोधी दल उसे इस मुद्दे पर भ़डकाने में भी लगे थे। सोनिया गांधी के लिए यह बहुत ब़डा जुआ था, लेकिन वह अपनी गणना में सफल हुईं और विरोधियों को मुंह की खानी प़डी। इस बार महिला आरक्षण विधेयक को लेकर भी राजनीतिक स्थिति डांवाडोल थी। सरकार को बाहर से समर्थन देने वाले तीनों प्रमुख दल समाजवादी पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल एवं बहुजन समाज पार्टी इस विधेयक के खिलाफ थे। मुस्लिम वोट बैंक का मुद्दा यहां भी सामने था। विरोधियों ने पिछ़डी जातियों (ओबीसी) के साथ अल्पसंख्यकों के प्रति अन्याय का मसला भी यहां ज़ोड दिया था। जहां अल्पसंख्यकों का मसला आ जाए और उसके आहत होने का खतरा पैदा हो जाए, वहां कांग्रेस के हाथ पांव यों ही कांपने लगते हैं, इसलिए जब सोमवार को महिला आरक्षण विधेयक राज्यसभा में नहीं पेश हो सका, तो ऐसा लगने लगा था कि कांग्रेस एक बार फिर इस मसले पर अपना कदम पीछे खींच लेगी। पार्टी नेताआें में यह सुगबुगाहट शुरू हो गयी थी कि क्या इस विधेयक के लिए सरकार को खतरे में डाला जाना चाहिए। यद्यपि उसके तत्काल अल्पमत में आने या गिरने का कोई खतरा नहीं था, फिर भी मुस्लिमों के नाराज होने तथा लोकसभा में पार्टी का बहुमत घटने का खतरा तो अवश्य था। प्रधानमंत्री भी इससे सहमत थे कि विधेयक को फिलहाल टाल दिया जाए। किंतु सोनिया गांधी ने फिर आगे आकर एक राष्ट्रनेता की तरह अपने साहस का परिचय दिया। उन्होंने सरकार के कोर ग्रुप की बैठक में साफ कहा कि अब इतनी दूर तक आगे आकर पीछे नहीं हटा जा सकता। उन्होंने पार्टी मैनेजरों से कहा कि कुछ भी हो, आज मंगलवार को राज्यसभा में यह विधेयक अवश्य पारित हो जाना चाहिए। उनके इस द़ृढ निर्णय के बाद ही पार्टी ने हंगामा करने वाले विरोधियों को मार्शल के द्वारा सदन से बाहर करने का कठोर फैसला किया। राज्यसभा के इतिहास में यह पहली बार था, जब इस तरह माननीय सदस्यों को बलपूर्वक उठाकर सदन के बाहर किया गया। इसमें दो राय नहीं कि कांग्रेस के शीर्ष पद पर सोनिया गांधी न होतीं, तो महिला आरक्षण का यह विधेयक आगे नहीं ब़ढ सकता था।

निश्चय ही अब लोकसभा में इस विधेयक को पारित कराना राज्यसभा के मुकाबले कहीं कठिन होगा, लेकिन यदि सोनिया गांधी ने इसे पारित कराने का संकल्प ले लिया है, तो यह वहां से भी अवश्य पारित हो जाएगा। यह बात अलग है कि वहां विरोधियों की ताकत कहीं अधिक है, लेकिन यह भी सही है कि कोई भी राजनीतिक दल इस समय सरकार गिराने का साहस नहीं करेगा, क्योंकि कोई भी इतनी जल्दी दूसरा आम चुनाव नहीं चाहेगा। हां, यदि राजद व सपा के सदस्यों ने लोकसभा में भी वही दृश्य पैदा करने की कोशिश की, जो उन्होंने राज्यसभा में किया था, तो मार्शलों को जरूर दिक्कत उठानी प़ड सकती है, क्योंकि यहां उनकी शक्ति दो गुना से अधिक होगी।

महिला विधेयक लोकसभा में कब आएगा, इसकी अभी कोई तिथि निर्धारित नहीं हुई है। शायद सदन में लेखानुदान की मांग पास होने के बाद इसे पेश किया जाए। हंगामा होना तो तय है, लेकिन यदि सरकार संकल्पबद्ध रहे, तो विधेयक तो पारित हो ही जाएगा। एक बार यह संसद के दोनों सदनों से पारित हो गया, तो विधानसभाआें की अ़डचनें उतनी मुश्किल नहीं रह जाएंगी। लेकिन इस सबके लिए देश की महिलाआें को सोनिया गांधी का धन्यवाद अवश्य करना चाहिए।

जद (यू) विभाजन की ओर

जनता दल (यूनाइटेड) में मतभेद तो लंबे समय से चले आ रहे थे, लेकिन महिला आरक्षण के मसले ने लगता है इसका विभाजन तय कर दिया है। संसद और विधानसभाआें में महिलाआें के आरक्षण के सवाल पर पार्टी के दो शीर्ष नेता दो विपरीत छोरों पर ख़डे दिखायी दिये। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जहां आरक्षण के पक्ष में थे, वहीं पार्टी अध्यक्ष शरद यादव उसके विरुद्ध। राज्यसभा में जद (यू) के पांच सदस्यों ने पार्टी अध्यक्ष के निर्देशों की अवहेलना करते हुए विधेयक के पक्ष में मतदान किया। रोचक यह रहा कि शरद यादव के पक्ष का समर्थन तथा नीतीश की लाइन का विरोध करने वाले अधिकांश नेता वे हैं, जो कल तक नीतीश पर यह आरोप लगा रहे थे कि वह सवणा] के हितों की अनदेखी कर रहे हैं।

बिहार में इसी वर्ष विधानसभा चुनाव होने जा रहे हैं, इसलिए अब जद (यू) के दोनों गुटों का साथ रहना प्राय: असंभव है। पार्टी भीतर से दो फ़ाड हो ही चुकी है, बस उसकी औपचारिक घोषणा भर होना बाकी है। इसलिए इस बात की पूरी संभावना है कि चुनावों के पहले नीतीश कुमार अपनी अलग पार्टी की घोषणा कर सकते हैं। पार्टी के अधिकांश सांसद व विधायक नीतीश के साथ बताए जाते हैं। शरद यादव के साथ शायद वही नेता बचे रहेंगे, जो उनकी ही तरह नीतीश की सफलता तथा लोकप्रियता से ईर्ष्या करते हैं।

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