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महिला विधेयक को लेकर पुरुष राजनेताआें की चिंता

Swatantra Vaartha  Fri, 12 Mar 2010, IST

महिला विधेयक को लेकर पुरुष राजनेताआें की चिंता

यद्यपि महिला आरक्षण की समर्थक सभी पार्टियां व राजनेता यह मानते हैं कि अब इससे पीछे नहीं हटा जा सकता और राज्यसभा के बाद अब इसे लोकसभा से भी पास कराना ही है, किंतु इन सबके पुरुष नेताआें में एक तरह की राजनीतिक असुरक्षा व भय का वातावरण व्याप्त है। पहले अनुमान था कि इस शुक्रवार को लोकसभा में यह विधेयक पेश किया जा सकता है, लेकिन अब यह संभावना लग रही है कि करीब एक महीने के अंतराल के बाद लोकसभा की बैठक जब फिर शुरू होगी, तो अप्रैल मध्य में यह पेश किया जा सकेगा। वास्तव में राज्यसभा में मार्शलों के प्रयोग को लेकर सांसदों के व्यापक क्षोभ व्याप्त है। महिलाआें के लिए कोटा समर्थक भारतीय जनता पार्टी के सांसदों में भी इसे लेकर रोष है, क्योंकि उन्हें भय है कि यदि सत्ता पक्ष को मार्शलों के उपयोग का खुला समर्थन मिला, तो वह कल को किसी पार्टी के खिलाफ उसका इस्तेमाल कर सकती है। भाजपा को रंगनाथ मिश्र आयोग की सिफारिशों का संसद में विरोध करना है। इस आयोग में धर्मांतरित अल्पसंख्यकों को भी आरक्षण की सुविधाएं देने की सिफारिश की गयी है, भाजपा जिसके सख्त खिलाफ है। उसने यह घोषणा कर रखी है कि वह रंगनाथ मिश्र आयोग की सिफारिशों को लागू करने वाले प्रस्ताव को पारित नहीं होने देगी। ऐसे में सत्ता पक्ष उसके सांसदों की खिलाफ भी मार्शल का उपयोग कर सकती है। वैसे लोकसभा में किसी भी ब़डी पार्टी के खिलाफ मार्शलों का प्रयोग करना आसान नहीं है, फिर भी आशंका तो है। इसलिए सत्ता पक्ष के मैनेजरों को लोकसभा में महिला आरक्षण विधेयक लाने के पूर्व सांसदों के बीच व्याप्त उत्तेजना के माहौल को शांत करने का प्रयत्न करना होगा अथवा इसके लिए प्रतीक्षा करनी होगी कि स्थिति शांत हो और फिर से वह वातावरण बने, जिसमें विधेयक लाया जा सके।

वातावरण सामान्य बनाने के लिए यह आवश्यक लग रहा है कि राज्यसभा के निलंबित सदस्यों का निलंबन वापस लिया जाए। सदन में विपक्ष के नेता अरुण जेटली ने कहा भी है कि विधेयक पारित हो जाने के बाद अब उनका निलंबन बनाए रखने का कोई औचित्य नहीं है। किंतु ऐसा लगता है कि कांग्रेस को इसकी कोई जल्दी नहीं है। संसदीय कार्यमंत्री एवं कांग्रेस के नेता पवन कुमार बंसल का कहना है कि यदि ये सांसद सदन के भीतर अपने कृत्य के लिए क्षमा याचना कर लें, तो उनका निलंबन वापस हो सकता है, लेकिन निलंबित सांसदों का कहना है कि वे किसी तरह की क्षमायाचना नहीं करेंगे, चाहे उनकी सदस्यता ही क्यों न चली जाए। इनमें सबसे अधिक यानी चार सदस्य समाजवादी पार्टी के (कमाल अख्तर, वीरपाल सिंह यादव, नंदकिशोर यादव, आमिर आलम खान) हैं तथा एक राजद (सुभाष यादव), एक लोक जनशक्ति पार्टी (साबिर अली) तथा एक असंबद्ध सदस्य (एजाज अली) हैं। यद्यपि इनमें प्रमुख पार्टियों, सपा व राजद का सरकार के प्रति कठोर रुख काफी नरम प़ड गया है, फिर भी वे इतना तो चाहेंगे ही कि उनके सदस्यों का निलंबन वापस लिया जाए। सपा नेता मुलायम सिंह यादव तथा राजद के लालू प्रसाद यादव ने सरकार से समर्थन वापस लेने तथा उसके खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने की धमकी दी थी, लेकिन बाद में वे इन दोनों कदमों से पीछे हट गये, फिर भी महिला विधेयक पर उनके रुख में कोई बदलाव नहीं आया है। लोकसभा में उनका विरोध उतना ही सख्त रहने वाला है, जितना की राज्यसभा में, फिर भी उनसे यह आशा जरूर की जा रही है कि वे उस तरह का कोई दृश्य लोकसभा में प्रस्तुत नहीं करेंगे, जैसा कि राज्यसभा में पेश किया था।

अब रही बात पुरुष राजनेताआें के भय के निराकरण की, तो उसका कोई समाधान फिलहाल सरकार के पास नहीं है। ज्यादातर राजनेताआें की दुविधा यह है कि वे न तो खुलकर आरक्षण का विरोध करने की स्थिति में हैं और न इसे स्वीकार ही कर पा रहे हैं। इसलिए राज्यसभा से पारित होने के बाद भी यह संदेह बना हुआ है कि क्या यह लोकसभा से भी पारित हो पाएगा। और यहां से पारित हो भी गया, तो क्या कोई और बहाना तलाश नहीं किया जाएगा कि यह संविधान का अंग न बनने पाए। लोकसभा से पारित होने के बाद इसे कम से कम आधी विधानसभाआें का समर्थन चाहिए। वहां भी किसी भारी अ़डंगे से इनकार नहीं किया जा सकता। वास्तव में आरक्षण का चक्रीय व्यवस्था सबसे ब़डी समस्या बनी हुई है। पुरुष नेताआें को लग रहा है कि यदि यह व्यवस्था लागू हुई, तो संसदीय राजनीति में महिलाआें की संख्या केवल एक तिहाई नहीं बल्कि उससे कहीं अधिक हो जाएगी। पहली बार मान लें केवल १८१ सीटें ही उन्हें मिलें, लेकिन अगली बार स्वत: उनकी संख्या ब़ढ जाएगी। एक तो नई १८१ सीटें उनकी हो जाएंगी, दूसरे पहले चक्र की सभी महिला सांसदों को तो बदला नहीं जा सकेगा। उनमें से कुछ दुबारा भी उम्मीदवार बनेंगी। दोतीन चक्र में शायद आधी से अधिक सीटें केवल महिलाआें के कब्जे में आ जाएं। राजनीति में अपना कैरियर तलाशने वाले पुरुषों के लिए यह बहुत त्रासद है। यह विधेयक पारित हो गया, तो बहुत से पुरुष राजनेता अपनी बहन, बेटी व बीवी के सहारे ही राजनीति में रह जाएंगे। इस कोटे को १५ साल की सीमा में भी बांधना कठिन है, क्योंकि स्त्रियां अपना यह विशेषाधिकार उसके बाद भी भला क्यों छ़ोडने लगीं। निश्चय ही यह विधेयक यदि संविधान का अंग बन गया, तो इसे स्त्रियों के लिए भारतीय पुरुषों का बहुत ब़डा बलिदान माना जाएगा।

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