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ठगी का शिकार हो रही जनता

Swatantra Vaartha  Fri, 12 Mar 2010, IST

ठगी का शिकार हो रही जनता

अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर छाई मंदी जहां ब़डेब़डे उद्योगों तथा कारपोरेट जगत से ज़ुडे लोगों को आर्थिक संकट से ठीक तरह से उबरने नहीं दे रही है, वहीं बेतहाशा ब़ढती महंगाई ने भी आम लोगों की कमर त़ोड कर रख दी है। हालांकि सरकार द्वारा मंदी व महंगाई को लेकर तरहतरह के तर्क पेश किए जा रहे हैं, परंतु हकीकत तो यही है कि अब आम जनता पर इन आर्थिक हालात का प्रभाव प़डता साफ दिखाई दे रहा है। आम लोगों के खाने की थाली में या तो दाल व सब्जियों की कटोरी की संख्या में कमी आते देखी जा रही है या फिर इनकी मात्रा घटती जा रही है। कोई नाश्ता करना बंद कर महंगाई से जूझने के तरीके अपना रहा है, तो कोई भोजन की मात्रा में ही कमी करने को ही मजबूर है। परंतु इन्हीं हालात के बीच देश में एक वर्ग ऐसा भी सक्रिय है, जिस पर मंदी या महंंंगाई का कोई असर नहीं देखा जा रहा है और यह वर्ग जनता में लालच पैदा कर तथा उन्हें तरह तरह के विज्ञापनों के माध्यम से अपनी ओर आकर्षित कर उनकी जेब पर डाका डालने का काम कर स्वयं खूब धन कमा रहा है। इनके द्वारा महंगाई व मंदी की परवाह किए बिना जनता से मोटे नोट वसूले जा रहे हैं।

ठग सम्राट नटवर लाल के एक कथन का यहां उल्लेख करना उचित होगा। काफी पहले नटवरलाल ने पूरे आत्मविश्वास के साथ यह कथन प्रस्तुत किया था कि जब तक संसार में लालच जिंदा है, तब तक ठग कभी भूखा नहीं मर सकता। निश्चित रूप से आज चारों ओर उसी कथन की पुष्टि होती दिखाई दे रही है। रोजमर्रा के प्रयोग में आने वाली अधिकांश दैनिक उपयोगी वस्तुआें की बिक्री हेतु जो ऑफर दिए जाते हैं, उनमें फ्री शब्द का उल्लेख ब़डे मोटे अक्षरों में किया जाता है। उदाहरण के तौर पर यदि आप एक टूथपेस्ट खरीदते हैं, तो उसके साथ टूथब्रश फ्री होने का लालच कंपनी द्वारा दिया जाता है। इस प्रकार के अनेकों उत्पाद ऐसे हैं, जो दो के साथ एक फ्री या चार के साथ एक फ्री आदि अलगअलग शता] व नियमों के हिसाब से बेचे जा रहे हैं। यहां तक कि अब तो ग्राहक स्वयं ऐसी फ्री योजनाआें वाली वस्तुआें की मांग करने लगा है। लगता है भारतीय बाजार की इस नब्ज की न केवल ब़डे व मध्यमवर्गीय उद्योगों द्वारा पहचान कर ली गई है, बल्कि छोटे स्तर पर भी उपभोक्ताआें की इसी कमजोरी का फायदा उठाया जाने लगा है।

इसी प्रकार फर्जी व ठगी से परिपूर्ण कारोबार में लालच में फंसाने की शुरुआत टोल फ्री टेलीफोन नंबर का आकर्षण दिखाकर शुरू होती है। आम जनता टोल फ्री नंबर के झांसे में आकर संबंध कंपनी से बात तो कर लेती है, परंतु इसके पीछेेे के इस रहस्य को वह अनदेखा कर देती है कि कंपनी अपने ऑफिस या उद्योग का पूरा पता प्रकाशित या प्रसारित करने के बजाए केवल टोल फ्री नंबर से ही आखिर क्यों अपना काम चलाना चाह रही हैऔर यही टोल फ्री नंबर किसी भी ग्राहक को अपनी ओर आकर्षित करनेे में वही भूमिका अदा करता है,जो कि मछली फंसाने हेतु कांटे में लगाए गए चारे की होती है। आईए अपनी बात की शुरुआत प्रसिद्ध स्काईशॉप द्वारा विभिन्न टीवी चैनल्स पर प्रसारित होने वाले विभिन्न साजोसामनों के विज्ञापनों में से एक की करते हैं। पाठकों को यह जानकर आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि मैं स्वयं ऐसी एक घटना की भुक्तभोगी हूं। स्काईशॉप द्वारा किसी चैनल पर बारबार एक विद्युत संबंधी सामग्री के दिए जाने वाले विज्ञापन ने मुझे आकर्षित किया। बहुत अच्छे व तर्क पूर्ण तरीकों से विज्ञापन द्वारा यह समझाया जा रहा था कि अमूक यंत्र खरीदने से तथा उसे अपनी विद्युत लाइन में लगाने से आपके घर की बिजली की खपत में ३० से लेकर ४० प्रतिशत तक की कमी आ जाएगी। टोल फ्री नंबर पर मैंने बात की। दूसरी ओर से भी मुझे पूरी तरह से यह समझा दिया गया कि यह दुनिया का सबसे अधिक बिकने वाला प्रोडक्ट है तथा इसकी पूरी गारंटी भी है। कोई एडवांस भी नहीं है। मैंने उस व्यक्ति को अपना नाम व पता सब कुछ बता दिया। मात्र एक सप्ताह के भीतर हमारा पोस्टमैन एक गत्ते के डिब्बे में वीपीपी डाक लेकर हाजिर हो गया। डिब्बा देखने में तो अवश्य कुछ आकार घेरने वाला अर्थात्‌ लगभग पंखे के पुराने टाइप के रेगयूलेटर जैसे साइज का था। परंतु हाथ में लेने पर उसका वजन ५० ग्राम भी प्रतीत नहीं हो रहा था। बहरहाल चूंकि हमारा नियमित रूप से आने वाला पोस्टमैन हमारे ही दिये हुए आर्डर की वीपीपी लाया था, अतः उसे छ़ुडाना लाजमी था। लगभग २५०० रुपये अर्थात्‌ निर्धारित कीमत देकर मैंने वह वीपीपी छ़ुडा ली। डिब्बा खोला तो उसमें प्लास्टिक के डिब्बे का एक सील बंद बाक्स नजर आया। उसमें दो इंडिकेटर लगे थे। उसे लगाने हेतु निर्देश पत्र भी साथ था। बहरहाल मैंने मिस्त्री बुलाया, उसे उक्त यंत्र दिखाया तथा उसने कुछ सामान मंगाकर उक्त यंत्र लगा दिया।

विज्ञापन में प्रदर्शित यंत्र के अनुसार उसमें लालबत्ती जलनी चाहिएथी,जो कि नहीं जली । जब मैंने इस बात का जिक्र पुनः टोल फ्री नंबर पर किया, तब उसने पहले तो मुझसे ही कई प्रश्न ऐसे कर डाले जिससे लगा कि मैंने ही यह यंत्र खरीदकर गलती की है। बाद में उक्त व्यक्ति ने फोन पर मुंबई का एक पता बताते हुए कहा कि इस पते पर वह यंत्र तथा उसके साथ भेजी गई मूल रसीद आदि सब कुछ पार्सल द्वारा भेज दें। यहां मुझे यह सोचने के लिए मजबूर होना प़डा कि पैसे खर्च करने के बाद जब नया यंत्र काम नहीं कर रहा है, फिर आखिर इस यंत्र व उसकी रसीद मुंबई वापस भेजने के बाद हमें क्या राहत मिल सकेगी। मुझे तब यह यकीन हो गया कि मेरे साथ ठगी हो चुकी है और मैं आज भी बिजली बचाने की लालच में २५०० रुपये खर्च कर वह इलेक्ट्रिक जैसा बोझ लेकर घर में बैठी हूं। अफसोस तो इस बात का है कि इलेक्ट्रिक सेवर को लेकर मेरे जेहन में यह बात बाद में आई कि यदि कोई ऐसा यंत्र सरकार तथा वैज्ञानिकों द्वारा प्रमाणित किया गया होता तो ऐसी चीज बाजार में बिजली के सामान संबंधी दुकानों पर उपलब्ध होती तथा महंगी बिजली के इस दौर में घरघर में लगी दिखाई दे रही होती।

इसी प्रकार के टोल फ्री नंबर देकर आजकल सेक्स संबंधी दवाएं बेचने का दावा किया जा रहा है। कोई गंजों के सिरों पर बाल उगा रहा है, तो कोई मर्दाना ताकत ब़ढाने की दवाई बेच रहा है । कोई दवाईयों से मोटापा कम कर रहा है, तो कोई शरीर की लंबाई ब़ढाने की लालच दे रहा है। कोई बालों का झ़डना रोक रहा है, तो कोई काली चम़डी को गोरी करने के उपाय बता रहा है। जादू टोना, ज्योतिष, बेऔलाद को औलाद, पत्थरी का शर्तिया इलाज जैसे तमाम फर्जी विज्ञापनों की तो मानों ह़ोड लगी हुई है। ज्योतिषियों तथा नगपत्थर आदि के विक्रेताआें के नेटवर्क ने तो हद ही खत्म कर दी है। इनके विज्ञापन देखिए तो आपको लगेगा कि मात्र एक नग धारण करने से ही आपको आपकी मनचाही हर वह चीज मिल जाएगी जो कि आपको आपके अथक प्रयासों के बावजूद अब तक नहीं मिल सकी है। चाहे वह नौकरी हो या वरवधू, स्वास्थ्य हो या अन्य किसी ब़डी समस्या से छुटकारा। यहां तक कि धन संपत्ति, रोजगार और तो और प्रेमप्रसंग में सफलता का झंडा ग़ाडने का दावा भी ज्योतिषियों के यह विज्ञापन करते हैं।

जनता के हित में यहां मैं एक रहस्योद्‌घाट्‌न यह करना चाहती हूं कि टोल फ्रह फोन नंबर अथवा किसी विज्ञापन के समर्थन में प्रकाशित होने वाले ग्राहकों के बयानों से आप पूर्णतया सचेत रहें, क्योंकि जिस ग्राहक की फोटो, किसी विशेष दवा अथवा अन्य प्रोडक्ट के पक्ष में उसे प्रयोग में लाने का दावा करने वाला उसका वक्तव्य तथा उसका फोन नंबर आदि जो कुछ भी आप देख रहे हैं, वह सब कुछ फर्जी हो सकता है। कॉल सेंटर में काम करने वाले युवक युवतियों की तरह ही ठगी के धंधे में लगी कंपनियां ऐसे साधारण प़ढलिखे बेरोजगार युवकों की बाकायदा भर्ती करती हैं, जो समाचार पत्र में किसी उत्पाद के समर्थन में प्रकाशित फोन नंबर व नाम की फोन कॉल लेते हैं। उन्हें इस बात की ट्रेनिंग दी जाती है कि वे किस प्रकार फोनकर्ता को यह बताकर संतुष्ट करें कि अमुक दवाइयां उत्पाद बिल्कुल सटीक, फायदेमंद तथा तुरंत परिणाम देने वाला है और इसी झांसे में आकर कोई भी सीधासादा परेशान हाल ग्राहक मजबूरी में इनका शिकार हो जाता है और यदि मामला सेक्स अथवा गुप्त रोग संबंधी हो फिर तो वह ग्राहक शर्म के मारे किसी से कुछ बताने अथवा शिकायत करने योग्य भी नहीं रह जाता। लिहाजा जनता को चाहिए कि वह ऐसे फर्जी विज्ञापनों के झांसे में हरगिज न आएं। आज ऐसे धंधों को संचालित करने वाले लोग सैक़डों कऱोड की संपत्ति के मालिक बन बैठे हैं, जबकि देश का आम आदमी महंगाई के बोझ तले निरंतर दबता जा रहा है और दुर्भाग्यवश यही आम आदमी ठगी का नेटवर्क चलाने वाले सरगनाआें के निशाने पर भी है।

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