महाशक्ति के बदलते तेवर
रिचर्ड होलब्रुक के इस बेहद असंवेदनशील बयान कि काबुल हमला विशेष रूप से भारतीयों को लक्ष्य करके नहीं किया गया था, में कुछ ऐसा नहीं है जिनकी होलब्रुक से उम्मीद न की जाए। भाषा सचमुच काफी भद्दी और शर्मनाक थी, ‘मैं यह स्वीकार नहीं करता (कि यह उस तरह का हमला था, जैसा भारतीय दूतावास पर किया गया था) और फटाफट निष्कषा] पर मत कूदिए।’ वस्तुतः ऐसी बेबाक, खुरदरी भाषा उनकी पहचान है। होलब्रुक की ऐसी छवि है कि जिस समय उनकी नियुक्ति की घोषणा हुई, एक पूर्व अमेरिकी प्रतिनिधि ने मुझसे कहा, ‘जब आप लोग होलब्रुक के साथ व्यवहार करना सीखेंगे तो आपको पता चलेगा कि मैं तो एक कूटनीतिक व्यक्ति था।’ इससे साफ तौर पर यह पता चलता है कि अमूमन जो बात आघात पहुंचाने वाली असंवेदनशीलता की हद तक जान प़ड रही है, उसमें कुछ भी ऐसा विचित्र और असामान्य नहीं है। वह किस तरह के इंसान हैं ? जब आतंकी हमले के शिकार हुए चार भारतीय अब भी अस्पताल में जिंदगी के लिए जूझ रहे हैं, वह इस तरह से बात करते हैं। उनका बात करने का लहजा उपेक्षापूर्ण था। लगभग उन लोगों को डांटनेफटकारने और उपदेश देने जैसा, जो इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि यह हमला विशेष रूप से भारतीयों को लक्ष्य करके किया गया था। सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण और ध्यान दिए जाने लायक है उनका दो बार ध़डाध़ड अपनी बातों को पलटना और उससे पीछे हटना।
मूर्खतापूर्ण बयानबाजी करने के एक दिन के भीतर ही उन्होंने लगभग इस तरह के शब्दों में अपनी बातों की सफाई दी कि वह लगभग माफी मांगने जैसा प्रतीत हो रही थी और निश्चित तौर पर यह माफी मांगना भी होलब्रुक की छवि के मुताबिक नहीं था। दुनिया के तमाम रिचर्ड होलब्रुक इस तरह करते हुए नहीं पाए जाएंगे, ‘ओह, मैंने इस मसले पर कुछ ज्यादा ही तीखा बोल दिया।’ तो इस तरह अचानक पाला बदलने से हम क्या निष्कर्ष निकालें ? क्या हम यह महसूस करते हुए घर लौट जाएं कि चलो सब दोष, सब पाप धुल गए और यह सोचकर खुशी महसूस करें कि होलब्रुक ने इतनी जल्दी कारणों को समझ लिया ? या फिर ये सोचें कि यह भी एक जल्दबाज और बिना सोचे समझे की गई टिप्पणी ही थी और भगवान का शुक्र है कि जल्द ही वे उस टिप्पणी से पलट भी गए और अपना बयान वापस ले लिया ? या फिर हम चिंतित होने लगें, अपनी नींद गंवा दें और बैठकर विकल्पों का आकलन करें ? सारे मौजूदा तथ्य आखिरी विकल्प की ओर इशारा करते हैं। अगर हम होलब्रुक के बिना किसी ऱीढ और चरित्र के लगभग माफीनामे जैसे बयान को भारत की ब़ढती हुई ताकत और कद की पुष्टि मान लेंगे तो हम एक बहुत ब़डी भूल करेंगे। सच्चाई का दूसरा पहलू यह है कि यह बयान एक नए, कमजोर और आगे औरऔर कमजोर होते जाते अमेरिका का संकेत है। होलब्रुक के दोनों शुरुआती बयानों और तत्काल उनके पाला बदलने और बयान से पीछे हटने से उस कमजोरी को रेखांकित कर दिया है।
होलब्रुक के शुरुआती बयान में जो तल्खी थी, वह इस अभिमानपूर्ण दावे के कारण नहीं थी कि उनके पास ज्यादा बेहतर जमीनी जानकारी है, बल्कि भारत के प्रति यह तल्खी इस कारण से थी कि वह एक ऐसी सत्ता का प्रतिनिधित्व कर रहे थे, जो कमजोर हो रही है, जिसके पास कोई नया विचार और विकल्प नहीं है और जो लगातार अपना प्रभाव और उसे अमल में लाने की इच्छाशक्ति, दोनों खो रही है। ओबामा के इस रवैए कि, ‘मैं और ज्यादा सेनाएं भेजूंगा, लेकिन तयशुदा समय सीमा में उन्हें वापस बुला लूंगा’ ने उस क्षेत्र में अमेरिका की स्थिति को कमजोर कर दिया है और न सिर्फ तालिबान, बल्कि पाकिस्तान भी अपनी जीत को महसूस कर रहा है।
हालांकि यह विश्वास और स्थिति बहुत तेजी के साथ बदल भी सकती है, फिर भी पाकिस्तान अब यह विश्वास करता है कि अमेरिका (और होलब्रुक सरीखे उसके प्रतिनिधियों) के लिए एक ही रास्ता बाकी रह गया है कि वे कुछ ऐसी ज़ोडगांठ करें और एक तरह की ‘विजय’ की घोषणा करके वापस लौट जाएं। यह पाकिस्तान द्वारा चुने और नियंत्रित किए गए तालिबान के साथ समझौता करके ही मुमकिन हो सकता है। बेशक तब पाकिस्तान यह सुनिश्चित करने का वायदा करेगा कि काबुल के नए शासक अमेरिका और उनके सहयोगियों को कोई नुकसान नहीं पहुंचाएंगे। इस सफलता को सूंघकर पाकिस्तानी इतने साहसी हो गए हैं कि वे फिर से खुलकर अफगानिस्तान की अपनी जरूरत के बारे में बोलने लगे हैं। अफगानिस्तान में भारतीय मिशनों की ‘गतिविधियों’ के खिलाफ उनके हमलेे ब़ढ गए हैं और अमेरिकी उन हमलों का जवाब देने के प्रति कम से कम जज्बा दिखा रहे हैं। अगर होलब्रुक के दुनियावी नजरिए से देखें तो इससे किसी को कोई नुकसान नहीं होगा, यदि भारतीय ‘ब़डे परिदृश्य’ को ध्यान में रखते हुए ‘थ़ोडा और विवेकपूर्ण’ रवैया अपनाएं।
होलब्रुक अब ऐसी कमजोर हो रही महाशक्ति के लिए बोल रहे हैं, जो अपने हित के लिए अपनी सीमाआें से बाहर जाकर ल़डाई ल़डने के लिए कतई द़ृढप्रतिज्ञ नहीं है और जो हथियारों को दफनाने और शांति स्थापित करने के लिए लालायित है। दिक्कत ये है कि पाकिस्तानी, जो इस पराजयवादी रणनीति की सफलता के केंद्र में हैं, वे चाहेंगे कि उन हथियारों को भारत के पिछव़ाडे में दफनाया जाए। भारत के गुस्से के कारण होलब्रुक का इस तरह अपने बयान से पाला बदलना भी इच्छाशक्ति की उस कमी को दर्शाता है। ये संकेत काफी समय से दिखाई दे रहे हैं। इस हफ्ते की घटनाएं पाकिस्तान के ब़ढते आत्मविश्वास की ओर इशारा करती हैं कि उसने अमेरिका को (और संभवतः भारत को भी) वहां रख दिया है, जहां वह उन्हें रखना चाहता है। यह दिखाता है कि ओबामा के अमेरिका में अब न तो वह आत्मविश्वास है और न ही महाशक्ति की ऱीढ है।
कमजोर होते अमेरिका को हमारे दोनों ही विपक्षियों चीन और पाकिस्तान की मदद की जरूरत है। चीन और पाकिस्तान दोनों ही देशों ने अलगअलग तरीकों से भारत के प्रति अपने रुख को क़डा करते हुए होलब्रुक के इस पाला बदल की प्रतिक्रिया दी है। चीन फिर से सीमा के विवादों को अपना लक्ष्य बना रहा है और पाकिस्तान मुशर्रफ के समय कश्मीर को लेकर हुई अस्पष्ट बातों को मानने से इनकार कर रहा है। हमें इस नए यथार्थ को स्वीकार करने और समझने की जरूरत है। पाकिस्तान तिहरे स्तर पर खेल कर रहा है। वह पाकिस्तानियों, अफगान तालिबान और भारत स्थित लश्कर के साथ अलगअलग तरीके से व्यवहार कर रहा है। इसलिए अब वक्त आ गया है कि हम भी अपना रुख बदलें। अपनी राय को फिर से आकार दें और अपनी रणनीति को फिर से तय करें। अंततः सबसे मुश्किल और कठिन प़डोसियों के साथ भी हम अपने दम पर ही अपना मुकाम बनाएंगे।
