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असली तरक्की चाहते हो तो लौट चलो गांवों की तरफ

Swatantra Vaartha  Sat, 13 Mar 2010, IST

असली तरक्की चाहते हो तो लौट चलो गांवों की तरफ

आजकल आर्थिक प्रगति की बहुत बातें हुआ करती हैं। देश की जीडीपी अथवा विकास दर की ब़डी फिक्र रहती है, हमारे अर्थशास्त्रियों और सियासतदानों को। देश का बखूबी विकास हो रहा है, इस तथ्य से भला कौन इंकार कर सकता है। हां ! विकास सबसे अधिक हुआ हमारे वतन के सौ सबसे अमीर परिवारों का, जिनकी कुल संपदा विगत एक वर्ष में ६ लाख कऱोड से ब़ढकर हो गई है १३ लाख कऱोड और देश में विगत वर्ष २७ अरबपति थे इस वर्ष ५४ अरबपति हो गए हैं। गरीबी रेखा से नीचे जिंदगी काटने वालों की तादाद तकरीबन ३७ कऱोड से ब़ढकर ३९ कऱोड तक जा पहुंची है। यही है देश की तरक्की की असली तस्वीर। जिस महात्मा गांधी के नाम लेते हुए राजनेता थकते नहीं हैं, वो यदि देश की धरती पर स्वयं आ जाए तो गहन दु:ख में डूब जाएंगे, यह देखकर कि उनकी ‘ग्राम स्वराज’ पुस्तक की शति मनाने वाले वतन के गांव कितने बदहाल हो चुके हैं। अन्नदाता कहलाने वाला किसान आज भी कितना बेबस और कंगाल और कर्ज में डूब हुआ है। प्रेमचंद के होरी की किस्मत है कि बदलने का नाम ही नहीं लेती। उसके दौर का किसान आत्महत्या तो कदाचित नहीं करता था, किंतु इस तरक्की के दौर का किसान तो आत्मघात के लिए विवश हो रहा है। पिछले पंद्रह साल में दो लाख किसानों ने खुदकुशी कर ली और प्रत्येक वर्ष इस संख्या में इजाफा हो रहा है।

भारतीय गणतंत्र की असली आत्मा देश के गांवों और किसानों में निहित ही रही है, जिनकी तादाद आज भी तकरीबन अस्सी कऱोड है। आजादी के दौर के ६२ सालों के आद्यौगीकरण के बावजूद किसान अकसरियत में विद्यमान हैं। ‘है सच्चा हिंदुस्तान कहां है ! वह बसा हमारे गांवों में’ पंडित सोहनलाल द्विवेदी की ये पंक्तियां आज भी अत्यंत प्रासंगिक हैं। कथित ग्लोबलाइजेशन ने विगत २० वषा] में देश के किसान की कमर ही त़ोड डाली। जो देश खाद्यान्न के क्षेत्रों में आत्मनिर्भर रहा, वह अब खाद्य सामग्री आयात करने के लिए मोहताज हो चला है। सरकार के ही आंक़डे बता रहे हैं कि देश के लगभग बीस कऱोड नागरिकों को भरपेट भोजन तक नसीब नहीं हो रहा है। देश के नीति नियंताआें की प्राथमिकता में कहीं किसान और गांवदेहात हैं ही नहीं। दो दशकों से उनकी तव्वजों का मरकज बन चुका है, केवल कारपोरेट सेक्टर। देश के नीति निर्माताआें की स्पष्ट सोच रही है कि कारपोरेट सेक्टर तरक्की करेगा तो स्वतः ही उसकी तरक्की टपक कर गरीबों को निहाल कर जाएगी और उनकी बदहाली खुद ब खुद मिट जाएगी।

महात्मा गांधी अंत्योदय अर्थात अंतिम व्यक्ति के उत्थान की बात किया करते थे। उनका बस नाम लेने वाले राजनेता देश में कारपोरेट का संपूर्ण वर्चस्व स्थापित करने की नीयत के साथ अग्रसर हो रहे हैं। कृषि विकास दर ब़ढाने की चिंता ही किसे है ? जो कि विगत कुछ वर्षों में तेजी के साथ गिरकर मात्रा दो प्रतिशत तक जा पहुंची है। योजना आयोग के पास और देश के वित्तमंत्री महोदय के पास कृषि विकास के लिए धन ही कहां बचा है। शासक वर्ग द्वारा खेतीब़ाडी को अलाभकारी बनाने की यह बहुत ही सोची समझी साजिश है, ताकि किसान अपनी आर्थिक बदहाली से तंग आकर खुद ही अपनी धरती कारपोरेट सेक्टर को औनेपौने दामों में बेच डाले और शहरी मजदूर बन जाए। बहुत तेजी के साथ औद्योगिकरण करने का यह अत्यंत कारगर कारपोरेट तरीका रहा है, जिसे लातिन अमेरिकी देशों में बखूबी आजमाया जा चुका है और भारत में भी उसका बाकायदा परीक्षण किया जा रहा है। इससे तरक्की बहुत तेजी के साथ होती है, किंतु बस कारपोरेट सेक्टर पर काबिज कुछ लाख लोगों की। बाकी कऱोडों को तो गुरबत की निर्मम चक्की में पिसना प़डता है।

देश की असली तरक्की तो आम नागरिकों से संलग्न रही है। जिसमें किसानों की तादाद ही सबसे अधिक है। खाद्यान्न वस्तुआें की महंगाई को लेकर हाहाकार मच रहा है, किंतु उनकी महंगाई का संपूर्ण लाभ तो कुछ तिजोरियों में ही जा रहा है। देश का किसान तो कंगाल ही रहा, उसे आखिर क्या मिला? ऐसे मुनाफाखोरों का ही धन ही तो स्विस बैंकों में जमा है। जिसे कि सौ लाख कऱोड तक करार दिया जा रहा है। यदि यही धन किसी तरह वापस आ जाए और उसे आम जनमानस में वितरित किया जाए तो ५० कऱोड भारतवासियों के हिस्से में प्रत्येक के पास लगभग एक लाख आएगा।

गरीबी की रेखा के नीचे जीने वाले सबसे अधिक लोग गांवों में ही है और उनकी तादाद तकरीबन २५ कऱोड है। नरेगा योजना जिसे अब महात्मा गांधी के नाम के साथ ज़ोड दिया गया है, जो कि सरकारी भ्रष्टाचार के कुछ नए आयाम बना रही है। यह योजना गांव के गरीबों के अंगूठे चस्पा कराके सरकारी अफसरों और नरेगा के ठेकेदारों को मालामाल करने में इस्तेमाल की जा रही है। नरेगा योजना लागू होने के बाद से ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल की सन्‌ २००९ की एक रिर्पोट में हमारा देश कुछ और तरक्की करके भ्रष्ट देशों की सूची में ८४ वें पायदान पर पहुंच गया है। गांव के गरीबों के धन की सबसे अधिक लूट मची हुई है, इस देश में। खुद राहुल बाबा ही कह रहे कि पिताश्री राजीव गांधी के समय में तो सरकारी खजाने के एक रुपये में से महज १५ पैसे देश के विकास के लिए खर्च हो भी जाते थे, अब तो सिर्फ पांच पैसों तक यह आंक़डा आ चुका है। अब क्या करे ? अब भ्रष्टाचारियों को त्वरित एवं सख्त सजा प्रदान करने के लिए क्या यूएनओ आएगा हमारे देश में ! वास्तविक तरक्की चाहते हो, तो गरीब किसानों और गांवों की ओर लौट चलो ! यही नारा हमारे वतन का होना चाहिए। गांवदेहात प्रगति करेंगे तो संतुलित विकास की अवधरणा साकार हो उठेगी अन्यथा एक ओर कऱोडों की कंगाली ब़ढती जाएगी, दूसरी तरफ चंद परिवारों की अमीरी ।

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