आधुनिकता के नाम पर क्याक्या परोसा जा रहा है
मैं भारतीय मान्यताआें के प्रति आदर और आस्था रखने वाला हूं, इसलिए हो सकता है कि तथाकथित आधुनिकता के पक्षधर मेरे विचारों को ब़ूढबक कहकर खारिज कर दें। फिर भी विचारों की अभिव्यक्ति की आजादी के पक्षधर यही आधुनिकतावादी दूसरों के विचारों पर भी कभी गौर करेंगे तो बेहतर होगा।
आजकल की लगभग सभी पत्रपत्रिकाआें में और विज्ञापनों में किसी ‘अध्ययन में ऐसाऐसा कहा गया’ जैसे वाक्यों से समाचार या विज्ञापन को समर्थन दिया जाता है। हाल ही में प़ढा कि ‘लंदन में कहीं हुए अध्ययन में बताया गया है शादी के दो साल ग्यारह महीने और आठ दिनों में यानी लगभग तीन साल में वैवाहिक जीवन का आनंद फीका होने लगता है ’ वगैरह, वगैरह । अव्वल तो यह समझ में नहीं आया कि ब्रिटेन (जिन्होंने हम पर दो सौ वषा] तक गुलामी लाद कर रखी थी) के किसी महानगर के चार हजार पतिपत्नियों के विश्लेषण पर आधारित ऐसे उटपटांग नतीजे के लिए भारत के अखबार अपनी जगह क्यों बर्बाद कर रहे हैं ? दूसरी बात, अंत में यह संदेशसा दिया जा रहा है कि तीन साल बाद शादी के संबंध कटुतापूर्ण हो जाते हैं तथा ये पतिपत्नी मदिरापान आदि व्यसनों में लिप्त हो जाते हैं।’
मेरा मानना है कि ऐसे समाचार, ऐसी कपोल कल्पित घटनाआें के फिल्मी और टीवी कार्यक्रमों के प्रचार के कारण अनेक युवा ऐसे गलत कदम उठा रहे हैं, जिनके कारण भारतीय समाज की आधारशिला मानी जाने वाली विवाहसंस्था कमजोर होने लगी है और समाज में तलाक, विवाहेतर संबंध बिना विवाह के और बिना किसी दायित्व के युवा मदा]औरतों का साथ रहना आदि आत्मघातक प्रवृत्तियां ब़ढती जा रही हैं।
हमारे देश के साहित्य में सदैव पावित्र्य व संयम का उद्घोष रहा। समाज के, ऊंचेनीचे हर वर्ग में पतिपत्नी और परिवार के मधुर संबंधों की अपेक्षा, आज भी की जाती है।
लेकिन समाचार माध्यमों, मनोरंजन के माध्यमों की दृष्टि में इन अच्छे रिश्तों की अहमियत नहीं होती। वे तो झग़डे, तलाक, खून, हिंसा, त़ोडफ़ोड, ईर्ष्या, वहशीपन, नग्नता, बेहयायी को प्राधान्य देकर अपनी तथाकथित ‘कला’ प्रदर्शित करते हैं। दिग्गज फिल्मकार रचनाकार, साहित्यकार भी ऐसी घिनौनी प्रस्तुतियों की तारीफ करते हैं । इन ब़डेब़डों के नाम देखकर लोग उस कलाकृति पर अपना पैसा और समय तो बर्बाद करते ही हैं, पर साथ में अपने घर ले आते हैं कुसंस्कार और कुविचार !
हाल ही में मेरे हमउम्र (६५ साल के) एक मित्र ने मुझे एक भारतीय ल़डकी द्वारा लिखी गयी एक अंग्रेजी कहानियों की किताब दी और कहा, ‘बंधु ! इस पुस्तक की तारीफ कई अखबारों में आयी है। फिल्म जगत के एक बहुत ब़डे लेखक, कवि, निर्देशक, गीतकार ने इसकी तारीफ में प्रस्तावना लिखी है प़ढकर देखिए’ मैं वह कथा संग्रह घर ले आया। बिल्कुल बेकार कथाएं ! जिसमें आधुनिक, नवश्रीमान, धनी परिवार की औरतों की बातचीत और कुछ शॉपिंग के किस्से, किसी परिवार में आलसी औरतों का तिरस्करणीय व्यवहार जैसी फूह़ड कहानियां हैं । ४५ कहानियां ब़डी मुश्किल से प़ढ ली और फिर वह पुस्तक लौटा दी। तब मेरे मित्र ने पूछा, ‘कैसी लगी कहानियां ?’ मैंने कहा, ‘यार तुम कब से ऐसे साहित्य में रस लेने लगे और तुम्हें यह सब प़ढने का धैर्य कैसे हुआ ?’
मित्र ने कहा, ‘बंधु ! मैंने कब कहा कि यह पुस्तक मैंने प़ढी ? मैंने तो अखबारों में इसकी तारीफ आयी है और एक बहुत आदरणीय, मशहूर गीतकार ने इस पुस्तक के आरंभ में इसे प़ढने की पुरजोर सिफारिश की है ऐसा बताया । मैं स्वयम् एक ही कहानी ब़डी मुश्किल से प़ढ पाया ।’
खैर, आजकल नये लेखक, फिल्मकार तो फालतू चीजों का जुग़ाड कर कुछ पेश करते ही हैं, लेकिन कुछ पुराने और नामचीन लोग भी ऐसा कचरा ढोने का काम ब़डी लगन से करते हैं।
मैं यह नहीं कहता कि नयी प़ीढी के सभी रचनाधर्मी ऐसे हैं, इनमें आमीर खां जैसे कुछ श्रेष्ठ अपवाद भी हैं, जिनका मैं आदर करता हूं।
यहां मुझे १९७०७१ का एक प्रसंग याद आ रहा । हमारे दफ्तर में कोई कार्यक्रम था। मुख्य अतिथि थे हरीन्द्रनाथ चट्टोपाध्याय (सरोजिनी नायडू के भाई) उस समय वे लगभग सत्तर के थे। उन्होंने ‘प्रेम’ पर अपने विचार प्रकट करते हुए कहा था, ‘स्त्रीपुरुष अर्थात पतिपत्नी में सही मायनों में प्रेम, पचास वर्ष की आयु पार करने के बाद शुरू होता है, जब दैहिक प्रेम से भी ऊंचे स्तर पर पहुंचते हैं वे दोनों’ हमारे वैवाहिक बंधन को, यहां के साहित्य में सभ्यता में, बिल्कुल फिल्मी कहानियों में भी, जन्मोंजन्मों का बंधन माना गया है। लाखों, कऱोडों ज़ोडों में से कोई सौपचास ज़ोडे (हो सकता है सही कारणों से) विवाहविच्छेद तक पहुंचते हैं, लेकिन ऐसी स्थिति में, समाज में जब टीवी या सिनेमा मनोरंजन के सहज उपलब्धि सामान बने हैं और पत्रपत्रिकाआें को आज भी एक जरूरत के रूप में प़ढने वालों की बहुत ब़डी संख्या है, तो ऐसे गलत विचारों को प्रस्तुत करने वाले समाचार या वृत्त देने नहीं चाहिए और अगर कहीं से ऐसे विचार देखनेसुनने में आते हैं, तो उनका विरोध होना चाहिए। समाज की सेहत बिग़ाडने वाली बातों को अभिव्यक्ति स्वातंत्र्य के नाम से प्रकाशित/प्रसारित करना राष्ट्रद्रोह की श्रेणी में आता है।
