आशकाआें से िघरा नया साल
नये साल में वेश करते समय देश की आम जनता में कोइ उमग आर उसाह दिखाइ नहीं दे रहा ह। देश के बडे शहरों आर कुछ होटलों में नये साल का जन मनाया जाता ह, लेकिन आम जनता हताश आर निराश ह। उसका मन कइ तरह की आशकाआें से घिरा हआ ह। यह ठीक ह कि मदी से बाहर निकलकर देश के आथिक मोचे पर आगे बढने की आशाए ह, वही कइ बेहद मुकिल चुनातिया भी ह। मदी के भयानक दार से देश निकल चुका ह। निवेश में व हो रही ह आर आाेगिक उपादन भी लगातार बढ रहा ।
घरेलू पूजी निमाण आर विदेशी पूजी वाह एक बार फिर गति पकड चुका ह। ऐसे में भारतीय अथयवथा की विकास दर में सुधार के सकेत साफ दिखाइ दे रहे ह। लेकिन खा वतुआें की कीमतों में लगातार व आर भाचार ने देश की बहसयक जनता की उमीदों पर पानी फेर दिया ह। दुनिया की सबसे अधिक उपजाऊ भूमि आर ाकतिक ससाधन वाले देश की खा सुरक्षा खतरे में ह। खाा के मोर्चे पर सुधार की कोइ उमीद दिखाइ नहीं दे रही ह। हमारी शासनिक आर यायिक यवथा पतन की पराकाा पर पहच गयी ह। आज देश के सामने सबसे बडी चुनाती योय आर सक्षम राजनीतिक नेतव की ह। जो देश में सुशासन की यवथा को लागू करके जनता को याय दे सके। पडोसी देशों से भी हमारे सबध बिगडे हए ह आर देश के भीतर भी विभाजनकारी शयाि सिर उठा रही ।
छाेेटे रायों की आहट साफ सुनाइ दे रही ह। तेलगाना की माग से शु हआ आदोलन गोरखालड तक पहच चुका ह। वातव में के आर राय सरकारें यदि अपनी जनता को विकास में भागीदारी का समान प से हिसेदार नहीं बना सकती ह, तो नये वष में जातीयता आर पिछडापन का सघष हिंसा के नये दार में वेश कर सकता ह। मामला सिफ रायों के बटवारे का ही नहीं ह। इसके पीछे विकास की चाहत ह। यदि इसके लिए उचित माहाल आर अवसर नहीं बनाये जायेंगे तो आदोलन आर हिंसा का सिलसिला खम नहीं होगा। आथिक विकास की दर ऊची होने के बावजूद देश की अधिसय जनता गरीबी, लाचारी आर विवशता का जीवन जी रही ह। गरीबी, शोषण, राजनतिक अवसरवाद, भाचार आर नसलवाद हमारी लोकताकि यवथा के लिए खतरा बनकर उभरे ह। इन खतरों का मुकाबला करने की क्षमता आर हमारे राजनेताआें में दिखाइ नहीं देती ह। हमारी शासनिक आर यायिक यवथा वत हो चुकी ह। राजनेता जनता के लिए रोजीरोटी का इतजाम करने के बजाय फूट डालो आर राज करो की नीति पर चल रहे ह। एक राय के मुयमी ने तो खुद बेहतर शासन यवथा के लिए अपने राय के तीन टुकडे करने का सुझाव दिया ।
कुछ साल पहले देश को पचास छोटे रायों आर नगर देशों में बाटने की भी एक योजना आयी थी। पर या देश आर देश की जनता की समयाआें का समाधान छोटे राय ह ? झारखड, उाराखड, छाीसगढ की जनता की समयाए एव यथा या अय रायों की अपेक्षा कम हइ ह ? फिलहाल इस बात के कहीं कोइ सबूत नहीं मिले ।
वातव में हमारा सकट राजनीतिक नेतव के मोर्चे पर गहराता जा रहा ह । राजनीति में साित आर विचारधारा की बातें तो बहत होती ह, लेकिन अब वहा यगित हित ही सबसे महवपूण हो गया ह आर दूर सिफ इस बात तक सीमित हो गयी ह कि साा पर पकड बनाये रखी जाए। इसमें वोट बक की राजनीति के लिए कोइ भी दल किसी भी सीमा तक नीचे जा सकता ह। इसके लिए समाज को जाति आर सदाय में बाटने से भी कोइ परहेज नहीं किया जा रहा ह, बकि विभि दलों में इसके लिए होड बढ गयी ह। राजनीति की यह अधी दाड देश को विभाजन की ओर ले जा रही ह। इसलिए देश में नसली हिंसा आर आतकवाद की घटनाआें का वितार हो रहा ह। जिस देश में ४० फीसदी लोग गरीबी रेखा से नीचे रहते हो आर ३० फीसदी लोग गरीबी रेखा के आसपास गुजर बसर कर रहे ह, वहा यदि उनकी तरी के लिए केद आर राय सरकारें कोइ ठोस योजना बनाकर लागू नहीं कर सकती ह, तो उनके होने न होने से या फक पडता ह ?
पिछले वष केीय साा में यूपीए की दोबारा जोरदार वापसी को सबसे बडी राजनीतिकउपलधि के प में याद किया जायेगा। नेह युग के बाद यह तीसरा माका था, जब डामनमोहन सिंह के नेतव में कागेस अपने सहयोगी दलों के साथ आर मजबूत होकर लगातार दूसरी बार साा में लाटी।
इस साल देश के मतदाताआें ने दो धुवीय राजनीति की वापसी के साफ सकेत दिये तो दूसरी तरफ क्षेीय दलों की पकड राजनीति में ढीली होती गयी। लेकिन यदि राीय दल अपनी कायशली में सुधार नही करते ह, तो क्षेीय आकाक्षाआें को जोर पकडते देर नहीं लगेगी। साा सभालने के बाद यूपीए सरकार जिस मोर्चे पर बुरी तरह विफल रही ह, वह आम जनता के लिए सबसे यादा असतोष आर चिंता का कारण ह। पूरे साल लोग बढती महगाइ से त होते रहे। कभी मदी तो कभी मासमी मार से उपादन में कमी के बहाने गिनवाए गये। दूसरी तरफ विपक्ष ने जनता को यह जताने की कोशिश की कि वायदा कारोबार की वजह से यादा महगाइ बढी ह। पर कुल मिलाकर सरकार अपनी तमाम कोशिशों के बावजूद महगाइ पर लगाम लगाने के मामले में तो असफल ही रही। कहने को जमाखोरों आर कालाबाजारियों के खिलाफ मुहिम भी चली आर आम उपभोतावतुए राशन की दुकानों पर उपलध कराने के दावे भी हए पर गरीबों की दालरोटी पर सरकारकी पहल जमीनी तर पर कही रग लाती दिखाइ नहीं दे रही ह।
यूपीए सरकार ने वतु एव सेवा कर (जीएसटी) को नये साल में लागू करने का फसला किया ह, लेकिन जीएसटी की वितत दरों पर अलगअलग राय सामने आयी ह। तेरहवें वाि आयोग ने जहा १२ फीसदी की दर की सिफारिश की ह, वहीं रायों के वाि मयाेिं की अधिकार ा समिति ने करों का दोहरा ढाचा अपनाने का फसला किया ह। रायों को एकल कर पर सहमत करना आसान नहीं होगा। राय शराब, खाा आर पेटोलियम उपाद जसी वतुआें पर मिलने वाले राजव को छोडने के लिए तयार नहीं ह। इसलिए जीएसटी को कियावित करने की चुनातिया बडी ह। इसके लिए सविधान सशोधन की जरत पडेगी, जिससे के आर राय सरकारों को अपने टस आधार को वितत करने की अनुमति मिलेगी, जो अभी पूरी तरह प आर परिभाषित नही ह। चुनातिया खास तार से सेवाआें के मामले में होंगी, जहा असर यह परिभाषित करना मुकिल होता ह कि किस माा में सेवा दान की गयी।
बहरहाल करों के मोर्चे पर आज हवा को छोडकर रोटी के एक टुकडे से लेकर पानी तक कोइ भी चीज नही बची ह, जिस पर सरकार आम जनता से कर (टस) न वसूल रही हो आर हर साल इस कर की दरें बढ जाती ह।
लेकिन आम जनता के लिए चिंता की बात ह कि उसके दिये गये कर (टस) का जिस तरह से सरकार अपने कमचारियों, मयाेिं के वेतन भो को बढाकर आर भटाचार की छूट देकर दुपयोग कर रही ह, उसकी दुनिया में कोइ मिसाल नहीं मिलती ह। हमारी गिनती दुनिया के भतम देशों में होती ह। आम आदमी का जब भी किसी सरकारी विभाग से काम पडता ह, तो उसकी जेब खाली हो जाती ह। तेलगी टाप घोटाला, सयम घोटाला, दूरसचार घोटाला, चारा घोटाला, ताबूत घोटाला, हवाला काड आर बोफोस जसे बडेबडे घोटाले इस देश में हो चुके ह ।
इन घोटालों ने न सिफ इस देश की आथिक बुनियाद को हिलाकर रख दिया, बकि अथनीति की दशा आर दिशा को भी बदलकर रख दिया। विस बकों में खरबों पये अवध तरीके से जमा करने वाले लोगों के नाम हमें आज तक पता नहीं चल सके ह। जो धन आम जनता के काम आना चाहिए था, इस धन को हडपकर विस बकों में जमा कर दिया गया ह। निचित तार से ये घोटाले अथयवथा के सामने बडी चुनाती पेश कर रहे ह आर देश के विकास में सबसे बडी बाधा बन गये ह। इन घोटालों आर भाचार पर लगाम लगाने के बजाय सरकार पानी, बिजली आर आम जनता की सेवाआें पर कर (टस) का बोझ बढाकर अपनी अक्षमता आर निकमेपन को छिपाती ह। सरकार के मी आर अधिकारी यदि जनता के दिये करों से लबीलबी तनखाहें आर सुविधाए ा कर रहे ह, तो जनता को भाचार रहित, निपक्ष आर बेहतर शासनिक सेवाए उपलध कराना उनका ाथमिक कतय ह। यदि हम अपनी जनता को निपक्ष शासन आर याय नहीं दान कर सकते ह, तो नसली आर आतकवादी हिसा को कसे रोका जा सकता ह ? यूपीए का भविय इस बात पर तय होगा कि वह इन चुनातियों से कसे निपटती ह।
