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कचर के बाहर सात िदन

swatantravartha  Fri, 1 Jan 2010, IST

कचर के बाहर सात िदन

कोलकाता में पिछले पह वषा] से एक अनोखा साकतिक अभियान चल रहा ह। इसे नाम िदया गया िहंदी मेले का। लेकिन यह साधारण मेला नहीं ह, हालाकि इसमें मेले जसा रसरग ह। इसे साकतिक मेला भी नहीं कह सकते, हालाकि इसका गहरा सबध सकति के पुननिमाण से । वातव में यह युवा रचनामकता का उसव । इस उसव के मायम से अपसकित, कुसकित आर सकतिहीनता के खिलाफ एक बडी लडाइ लडी जा रही ।

उपभाेावाद की ओर तेजी से भागते हए समाज में युवा पीढी को न केवल उसकी श्रे साकतिक विरासत से परिचित कराया जा रहा ह, बकि उसे इस विरासत में अपनी ओर से भी कुछ जोडने के लिए ाेसाहित भी किया जा रहा ह। हिंदी मेला २००९२०१० (२६ दिसबर २००९ से १ जनवरी २००१०) के वप पर नजर डालते ही आयोजकों का लय प हो जाएगा।

ना तियोगिताए ह लघु नाटक तियोगिता (विषय पयावरण की समया, आतकवाद, ी सशीकरण, किसान समया, राीय भावना आर साकतिक सुधार), काय आवा तियोगिता (निराला, दिनकर, अज्ञेय, मुबाेिध, नागाजुन, केदारनाथ अगवाल, भवानी साद मिश्र, धूमिल, सर्वेर दयाल ससेना, केदारनाथ सिंह, राजेश जोशी आर अण कमल में से किसी एक कवि की रचना की आवा), हिंदी ज्ञान तियोगिता, काय सगीत तियोगिता (साद, पत, निराला, महादेवी वमा, कबीर, नागाजुन, नजीर अकबराबादी, बन, दुयत, कुमार आर शिवमगल सिंह ‘सुमन’ में से किसी एक कवि की गीत रचना का गायन), लोकगीत तियोगिता (हिंदी क्षे की भाषाआें बोलियों के लोकगीतों की सगीतमय तुति), काय नय तियोगिता, कविता लेखन तियोगिता, चािकन तियोगिता (शिशु वग के लिए विषय का बधन नहीं, बाकी के लिए विषय बाजार में खरीदार) आर कविता पोटर तियोगिता (हिंदी के किसी मुख कवि के कविता अश पर चािकन)।

एक कायकम युवा कवि समेलन का ह आर एक मु कला मेले का, जिसमें वाय से सगीत तुति, मूक अभिनय, एकल नाटय तुति आदि की एकल तुति होगी। अतिम दिन युवा शिखर समान वितरित किए जाएगे। इस वष के कायकम की एक विशेषता ह ‘समकालीन कविता का भविय’ पर कवियों की राीय सगोठी आर फिम दशन। कविता पर वय देंगे चचित युवा कवि नवल शुल, एकात श्रीवातव, बीनारायण, बोधिसव, राकेश रजन, मनोज कुमार झा, निमला पुतुल आर निशात।

युवा कवियों आर उदीयमान रचनाकारों आर कलाकारों के बीच भी सवाद का पुल तयार करने का यास ह। हमें अपनी परपरा आर विरासत को ही नहीं जानना ह, बकि समकालीन परिय के साथ भी जीवत रिता बनाना ह। ऐसे ही आयोजन के लिए पूरे आमविवास के साथ घोषणा की जा सकती ह हिंदी मेला युवाआें की आखों का अपना सपना ह। यदि सबसे खतरनाक ह, हमारे सपनों का मर जाना तो हम कहेंगे हिदी सकति जिंदा ह, हमारे सपने जिंदा ह। पाप कचर के बाहर के ये सात दिन वातव में साकतिक काति के लिए आान ह। हर साल कोलकाता के कूलों के सकडों बे यह आान सुनते ह आर इसके वर में अपना वर मिलाते ।

सर सयद अहमद के बारे में, जिहोंने मुसलमानों में आधुनिक शिक्षा फलाने के लिए अनेक सथानों को जम दिया, कहा गया ह, यहा बातें ही बातें ह, सयद काम करता था। इस समय उपभाेावाद, अपसकति, बाजारीकरण, चि भता, अथवाद, परिवार आर समाज का विघटन, पचिमी सकति की भोंडी नकल, मूयहीनता आदि के वि बहत चचा हो रही ह आर इसके लिए नवउदारवादी अथयवथा, उछखल पूजीवाद आदि को कोसा जा रहा ह। अपमूयों को घरघर फलाने वाला मीडिया भी आरोपों के घेरे में ।

सवाल ह कि बढते हए अधेरे को कोसने भर से या अधकार दूर हो जाएगा ? हमारे देखतेदेखते हमारी अपनी दुनिया जिस कदर अलील आर वीभस हो रही ह, उसका इतना तिरोध ही या काफी ह कि इस विषय पर लेख लिखे जाए, कहानिया आर कविताए रची जाए तथा राीय सेमिनार आयोजित किए जाए ? यह सब जरी ह, ताकि वतमान सकट को उसकी सभी रगतों में पहचाना जा सके, लेकिन जमीनी तर पर बदलाव तो कुछ करने से ही होगा। बदलने के लिए याया किया जा सकता ह, इसका माडल पेश कर रहे ह कोलकाता में हिंदी मेला के आयोजक।

इस अभियान को ाे शभुनाथ, मानिक बछावत, डा राजेश मिश्र, यिकर पालीवाल, मयुजय, महेश जायसवाल, नीलू पाडेय, ममता पाडेय, डा इदु सिह आदि का नेतव ा ह तथा शहर के सभी सकति आर हिंदी ेमी विभि कार से सहयोग करते ह, अयथा इतना बडा वाषिक आयोजन न चल सकता था, न सफल हो सकता था। इसकी सबसे बडी खूबी ह, युवा पीढी को दिशा देना। यहा न झडे ह, न जुलूस ह, न नारे ह। सारी कोशिश ह युवा रचनामकता को उभारना। जब सूय की किरणें धरती पर उतरती ह, तो अधेरा अपने आप दफा होने लगता ह। जब साहियिक आर लोकगीतों का रस लेने की क्षमता सिर उठाने लगती ह, तो भोडे फिमी गीत अपना आकषण खो बठते ह। जब वातविक सकति से परिचय होता ह, तब अपसकति का जादू बेअसर होने लगता ह।

जब सामूहिकता की साविक श का आनद मिलने लगता ह, तब यवािद में रस नहीं रह जाता। गाधीजी ने विदेशी कपडों की होली जलाने का आान किया, तो उसका विकप भी दियाखादी। बिना विकप तुत से सघष नहीं किया जा सकता।

कोलकाता के सकति ेमी यही कर रहे ह। जरी नहीं कि अय क्षेाें के लोग इसकी नकल करें। वे इससे सीख जर सकते ह आर अपनेअपने इलाके में साकतिक विकास का काम अपने ढग से कर सकते ह। मूल बात यह ह कि अपनी जमीन से, अपने लोगों से, अपनी कलाआें से, अपनी सकति से अनुराग ह या नहीं। अनुराग ह, तो या करना चाहिए, यह अपने आप गट हो जाएगा।

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