न्ययाय यवथा पर उठती उगलिया
पिछले दिनों समाचार पढने को मिला कि पाच पये के एक मामले में एक ९ साल से अदालत के चर काट रहा था। ९ साल बाद अदालत ने उस य को यह कहते हए बरी कर दिया कि पाच पये से किसी को कोइ नुकसान नहीं हआ। इसके बाद भी उसे आडरे की कापी अभी तक नहीं मिली। महीनों से वह कोट के लटीकल टाफ के चर काट रहा है , लेकिन हर बार उसे कोइ न कोइ बहाना बनाकर नइ तारीख दे दी जाती है ।
इस घटना से दो बातें साफ हइ कि याय पाना आसान नहीं आर छोटे से मामले में भी लोगों की जिंदगी बीत जाती ह, पर याय नहीं मिल पाता। एक बात आर कि ताकतवर आदमी जद आर मनमाफिक याय पा सकता ह। भारत के मुय यायाधीश केजी बालाकणन ने भी जजों पर टिपणी करते हए कहा था कि भाचार से याय यवथा भी अछूती नहीं । मुय यायाधीश की यह टिपणी बहत हद तक बहत कुछ कह जाती ह। उनका इशारा साफ ह कि पसे आर रसूख वाला गुनाहगार जदी से फसता नहीं ह, बकि बच निकलता ह, जबकि आम आदमी याय की आस में जिंदगी गुजार देता ह। कइ मामले तो ऐसे भी सामने आए ह, जिनमें दूसरी पीढी मुकदमा लडती रहती ।
आज भी आम आदमी का याय पर भरोसा ह। जब उसका भी याय यवथा पर से भरोसा उठा जाएगा, तब या होगा? आज लोगों का नेता, अफसर, पूरे सरकारी त से इसलिए विवास उठ चुका ह, योंकि इनकी जडें सीधी भाचार की खाद में फलफूल रही ह। ऐसे में लेदेकर आम आदमी को याय यवथा से ही आस ह। अगर यह आस भी टूट जाती ह, तो देश आर समाज में अराजकता की आशका अधिक बढ जाने का खतरा ।
अभी हाल ही में किसी ने बटला हाउस मुठभेड काड की यायिक जाच कराने के लिए कोट में याचिका दायर की थी। इस पर दीि हाइकोट ने यह कहते हए याचिका निरत कर दी कि इससे पुलिस का मनोबल गिरेगा। तब या पुलिस याय से ऊपर ह? या वह अयाय करेगी तो कोट उसेे अनदेखा कर देगा ? हम यह नहीं कह रहे कि पुलिस का मनोबल गिरे आर अपराधी उस पर हावी हो जाए, बकि हमारा उेय ह कि जनता में ऐसा सदेश न जाए कि कोट से भी कोइ ऊपर ।
मालेगाव बम विफोट के आरोपियों से मकोका हटा दिया गया, जबकि अय आतकियों की तरह इन पर भी देशोह का मुकदमा चलना चाहिए था। उनसे हमदर्दी यों ? इस तरह के मामले याय यवथा पर नचि लगाते ह, सदेह पदा करते ह पक्षपात का। देश की सबसे बडी मडर मिटी ‘आषि हयाकाड’ याय आर कानून यवथा पर सबसे बडा सवाल उठाता ह। देश की सबसे बडी जाच एजेंसी सीबीआइ आज तक खाली हाथ ह, यों ? जो इस केस में मुकदमा दज किया गया ह आर अब तक जो नतीजा सामने आया ह, वह या ह ? या यह सब लीपापोती इसलिए की जा रही कि यह एक धनी डाटर का मामला था? पहले ओनर किलिंग का मामला बताया गया। फिर नाकरों पर उगली उठाइ गइ आर केस को उलझा दिया गया।
जब यादा हायताबा मची तो सीबीआइ की पूरी जाच टीम ही बदल दी गइ। इसका मतलब या हआ ? या वह टीम नाकारा थी ? या उसने केस की जाच में भ राता अपनाया। आर अब जो जाच टीम आइ ह, उसकी या गारटी ह कि वह निपक्ष रिपोट देगीं ? इसी कार निठारी काड का मामला सामने ह। या हो रहा ह उसमें? एक मामले में मोहिदर सिंह पढेर बरी हो चुका ह। अब लोगों को लगने लगा ह कि पढेर तो देरसवेर पूरी तरह बरी हो ही जाएगा। गोवा के मडगाव मामले में शिथिलता यों बरती जा रही ह ? लोगों को यह मानने में कोइ हज नहीं कि जितने मामले देश भर में अदालतों में चल रहे ह, उसके अनुपात में जजों की सया कम ह, लेकिन या तारीख पर तारीख देते रहना उस समया का हल ह? इससे तो आम आदमी को याय बहत देर से मिल पाएगा आर मिल रहा है ।
जनता सभी जजों पर सवाल नहीं उठा रही ह, लेकिन कुछ यायाधीशों की कायणाली पर सवाल उठते रहे ह। सबसे यादा चाकाने वाला मामला उपभाका फोरम का ह। उपभाेा फोरम की थापना का उेय यह था कि जिस आदमी को कानून की एबीसीडी नहीं आती, वह भी अपनी भाषा में शिकायत दज कर याय पा सकता ह, लेकिन वहा या हो रहा ह? वहा हजारदो हजार पये का केस सालदो साल चलना तो मामूली सी बात ह, जबकि नियम के तहत ९० दिन यान तीन महीने में पीडित को याय मिल जाना चाहिए। शु में ऐसा हआ कि जद याय मिला, सही फसले हए, लेकिन अब कहीं न कहीं माननीय यायाधीश महोदय का झुकाव बडीबडी कपनियों की तरफ होता दिख रहा ह। इसी के तहत लोग यायाधीशों की इमानदारी पर भी सवाल उठाने लगे।
अभी एक मामले के सिलसिले में मुझे कमीर गेट (दीि) थित उपभाकाफोरम में जाना पडा। वहा देखा तो आइसीआइसीआइ बक के खिलाफ मामलों की लाइन लगी थी। इस फोरम में ९५ तिशत से भी अधिक मामले इस बक के खिलाफ थे। बाकी ५ तिशत में दूसरे मामले थे। दो मेबर तटथ थे, जबकि अयक्ष महोदय का ख अधिकाश शिकायकताआें के ति उदार देखने को नहीं मिला। यही कारण ह कि तारीखें खम होने का नाम नहीं लेती। एक महिला की गाडी बक ने गुडों से उठवा ली, लेकिन फोरम जद फसला सुनाने को तयार नहीं। बक लगातार तारीख डलवा देता ह। इस तरह से एक बाइक उठा लेने का मामला चलते सवा साल हो गया। ऐसे मामलों को देखकर दूसरे पीडित लोग जदी शिकायत करने का मन ही नहीं बनाते।
