दोनों कठपुतली पाटिया
भारत में राजनीतिक पाटिया तो दो ही ह एक कागेस आर दूसरी भाजपा। कागेस अपने सवा सा साल मना रही ह। भाजपा चाहे तो लगभग उससे आधे साल अपने मना सकती ह। ये दोनों पाटिया जितनी लबी चलीं, देश में कोइ अय पार्टी नहीं चली। यदि भाजपा आर जनसघ को हम दो अलग पाटिया मानने लगेंगे तो कागेस को तो हमें कम से कम छह अलगअलग पाटिया मानना पडेगा। एओ ूम से लेकर तिलक, गाधी, नेह, इदिरा, नरसिंहराव आर अब सोनिया कागेस जसे अलगअलग कइ नाम रखने पडेंगे, एक ही कागेस के। यहा मेरा निवेदन सिफ इतना ह कि आप कपया इन दोनों पाटिया की निरतरता पर यान दें।
निरतरता तो कयुनिट पार्टी में भी रही, लेकिन उसके दो मुय टुकडे हए आर वे आज भी कायम ह। एक टुकडे ने बगाल, केरल, पुिरा जसे ातों में राज जर किया, लेकिन उसका अखिल भारतीय प कभी नहीं उभर पाया आर जो प उभरा वह भी सायवादी नही, थानीय उपरावादी (बगालीमलयाली) रहा। सोपा, ससोपा, वत पार्टी जसी कइ पाटिया कट हइ आर अपने आप अतधान हो गइ। देश में जो अनेक छोटेमोटे दल दिखाइ देते ह, वे दलदल के अलावा या ह ? वे भाषा, जाति या परिवार की सीमाआें में सिकुडे हए ह। ऐसी हालत में जब हम कागेस आर भाजपा को देखते ह, तो सीने में राहत की सास चलने लगती ह। कागेस कइ बार टूटी, लेकिन देश का साभाय ह कि वह आज भी सही सलामत ह। भाजपा तो कभी टूटी ही नहीं। यह उसकी अतिरि विशेषता कही जा सकती ह।
इन दोनों पाटियों ने पूरे देश को जोड रखा ह। यदि ये अखिल भारतीय पाटिया नहीं होतीं, तो या भारत एक रह पाता ? शायद अब तक अनेक भारत बन जाते। सोवियत सघ का या हआ ? दुनिया का यह दूसरा सबसे शशािली देश टुकडेटुकडे यों हो गया ? योंकि सोवियत कयुनिट पार्टी भग हो गइ। पार्टी वह रसा ह, जो पूरे देश को बाधकर रखता ह। यह रसा टूटा आर देश बिखरा। नाकरशाही सिफ सरकार को बाधे रखती ह, लेकिन पाटिया नागरिकों को बाधे कर रखती ह। सिफ रा की एकता ही नहीं, लोकत आर सविधान की रक्षा भी इहीं पाटियों के कारण हइ ह। या वजह ह कि एशिया आर अफीका के दजनों रााें में फाजी ततापलट हो गए आर भारत में लगातार लोकत का सूय दनदना रहा ह। या वजह ह कि भारत के छोटेछोटे पडोसी रााें में चारचार, छहछह बार सविधान बदल चुके ह आर भारत का मूल सविधान आज भी पवि आर उपयोगी बना हआ ह ? इसका एक बडा कारण ह, हमारी पार्टीयवथा। या यह कम बडी बात ह कि भारत के रापति के पद पर मुसलमान, दलित, सिख आर महिला भी बठ सकती ह, धानमी का पद किसी महिला, किसी सिख, किसी दक्षिण भारतीय के ारा सुशोभित हो सकता ह आर रापति का पद किसी मुसलमान सान आर पीकर का पद किसी दलित देवी आर कयुनिट नेता के ारा अलकत हो सकता ह। इसका श्रेय मुयत भारत की धारावाहिक पार्टी यवथा को दिया जाना चाहिए।
हम इस पार्टी यवथा के ऋणी ह, लेकिन इस पर इतराने का कोइ कारण नहीं ह। या यह सच नहीं कि देश की ये दोनों पाटिया लोकताकि पाटियों की तरह नहीं, बकि ाइवेट लिमिटेड कपनियों की तरह चल रही ह ? दोनों ‘रिमोट कटोल’ से चलती ह। एक १० जनपथ से आर दूसरी नागपुर के हेडगेवार भवन से। किसे टिकट मिले, कान चुनाव लडे, कान मुयमी बने आर धानमी बने, यह भी मुटठी भर लोग ही तय करते ह।
इसका परिणाम या होता ह ? हमारा लोकत शीषासन करने लगता ह। हमारे विधायक, सासद, मी, मुयमी आर यहा तक कि धानमी भी उस जनता के ति उारदायी नहीं होते, जो उहें चुनकर भेजती ह, बकि वे उन पार्टीदादाआें के इशारे पर थिरकते ह, जो उहें टिकट आर पद दिलवाते ह यानी असली मालिक को तो पीछे धकिया दिया जाता ह आर नकली मालिक जन तिनिधियों को अपनी कठपुतली बना लेते ह। असली मालिक को अपना कोडा फटकारने के लिए पाच साल इतजार करना होता ह आर नकली मालिक विधायकों, सासदों आर सरकारों को अपनी उगलियों पर रोज नएनए नाच नचाता ह। इसी का परिणाम ह कि कठपुतली पाटिया ऊपर से थोपे हए नेताआें को चुपचाप वीकार कर लेती ह, आपातकाल जसी चीजों पर आख मींचकर मुहर लगा देती ह आर सतत भटाचार पर अपने होंठ सिले रहती ह।
जब तक हमारी पार्टीयवथा का यह मूल दोष दूर नहीं होगा, भारत का त विकास सभव नहीं होगा। समतामूलक समाज का निमाण तो लगभग असभव ही होगा, योंकि आज भी इन दोनों पाटियों का नेतव जनता में से उगा हआ नहीं ह, ऊपर से थोपा हआ ह। यदि राजनीतिक दलों के अदर मु आतरिक चुनाव हों, तो इन दलों का नेतव शहरी, ऊची जात आर अगेजीदा लोगों तक सिकुडा हआ नहीं रहेगा। या हमने कभी सोचा कि ये दोनों दल जब साा में होते ह, तो इनका आचरण एक जसा यों हो जाता ह ? इसलिए कि इनके नेतव का वग चरि एकजसा ही होता ह। ऊपर से थोपे हए नेतव के कारण ही हमारे देश में दो तरह की शिक्षा, दो तरह की चिकिसा आर दो तरह की जीवनशली विकसित हो रही ह। हमारा देश ‘भारत’ आर ‘इडिया’ में बट गया ह। इडिया मलाइ उडा रहा ह आर भारत भूखों मर रहा ह। हमारा नेतव भारत की सुध सिफ चुनाव के मासम में ही लेता ह। जरी यह ह कि हमारे नेता जनता के मालिक नहीं, से सेवक बनें।
यदि जनमत सगह आर जन तिनिधियों की वापसी के ावधान सविधान में जोड दिए जाए तो हमारे राजनीतिक दल अधिक सतक, अधिक सकिय, अधिक विनम होंगे। वे अपने असली मालिक की रोज परवाह करेगे। यदि इन दलों मे आतरिक लोकत बढेगा तो ये दल सचमुच अखिल भारतीय भी बनेंगे। १९६७ में कागेस की अखिल भारतीय श या घटी, आज तक देश में एक भी दल ऐसा नहीं उभरा, जिसका सगठन देश के हर जिले में मजबूत हो। कागेस आर भाजपा जसे तथाकथित अखिल भारतीय दलों की उपथिति कइ जिलों आर ातों में भी शूय ह। यह चिंता का विषय ह। इसीलिए भारत में बिटेन आर अमेरिका की तरह दोदलीय यवथा की जगह दोधुवीय यवथा बन रही ह। यदि ये दोनों धुव थोडे आर मजबूत हो यानी ये दोनों धुवपाटिया तगडी बनें तो हमारा लोकत अपने आप तगडा हो जाएगा।
