प्लान ‘बी’ को अमल में लाए भारत
गुत्थी इतनी उलझी हुई नहीं है जितनी की दिखती है। जरूरत है नजरिया बदलने की। नजरिया अगर मौजूदा घटनाआं के बजाए दूरगामी परिणामों को सोचकर बनाया जाए तो काफी कुछ समझ में आ जाता है। बस जरूरत रह जाती हैउस पर चलने कीऔर ठोस तरीके से चलने की।
भारत में अमेरिका के पूर्व राजनयिक रोबर्ट ब्लैकविल ने अपनी सरकार को सलाह दी है कि अगर तालिबानियों पर नकेल नहीं लग पा रही है तो बेहतर है अफगानिस्तान के टुक़डे कर दिए जाएंं। ब्लैकविल ने कोई नई बात नहीं की है। ऐसी बात पहले भी उठती रही हैं। लेकिन ब्लैकविल ने यह जरूर बता दिया है कि ‘गुड’ और ‘बैड’ तालिबान की फूट डालो और राज करो की नीति के बाद अब वाशिंगटन और लंदन के दिमाग में क्या चल रहा है। इन दोनों से इससे ज्यादा कुछ उम्मीद भी नहीं की जा सकती।
ओबामा को २०१२ में चुनावों का सामना करना है। इसलिए वह अपने सवा लाख सैनिकों की अफगानिस्तान से रवानगी जुलाई २०११ से करना चाहते हैं। व्हाइट हाउस इन सैनिकों की विदाई के लिए ड़ेढ साल का समय मान कर चल रहा है। लंदन के आम चुनाव मई २०१५ में है। इसलिए उसने अपनी तारीख २०१४ रखी है। ठीक है। सबके अपनेअपने हित हैं। और इन्हीं सब बातों को ध्यान में रखकर हामिद करजई को कहा गया है कि २०१४ तक अफगानिस्तान की आंतरिक और बाहरी सुरक्षा का जिम्मा उनके देश की सेना और पुलिस को सौंप दिया जाएगा।
इस लेनदेन के हाल यह हैं कि बीते आठ साल में अमेरिकी सेना ने अफगानी पुलिस को ट्रेन करने के नाम पर ६ बिलियन अमेरिकी डॉलर खर्च करके मात्र वर्दी महुैया कराई है। जब आठ साल में वर्दी मिली है तो अगले चार साल में तीन लाख अफगानी सैनिकों और पुलिस आर्मी को क्या मिलेगा। अंदाजा लगाया जा सकता है। ओबामा और कैमरून को इस बात से फर्क नहीं प़डता है। दोनों देश भयंकर मंदी के दौर से गुजर रहे हैं। ब्रिटेन तो इस साल अपने सुरक्षा खर्च में २० फीसदी की कमी लाने पर विचार कर रहा है। दोनों देश अच्छे तरीके से जानते हैं कि वे एक हारी हुई ल़डाई ल़ड रहे हैं। लेकिन वाशिंगटन और लंदन में वे यही दिखलाना चाहते हैं कि अलकायदा को उन्होंने नेस्तनाबूद कर दिया है और काबुल में बगदाद की तरह लोकतांत्रिक सरकार बैठा दी गई है।
पहले सलमान बशीर और अब शाह महमूद कुरैशी की बेअदबी के बाद भारत , अमेरिका को बताने जा रहा है कि अफगानिस्तान पाक नीति के बारे में वो क्या सोचता है। सरकार में अफगान पाक मामलों के विशेष राजनयिक सतींदर लांबा वाशिंगटन जा रहे हैं। ये सतींदर लांबा वही है जिनके नेतृत्व में २००४ से २००७ के बीच भारतपाकिस्तान के बीच रिश्तों में मिठास बनी थी। कश्मीर और आतंकवाद सरीखे सभी मुद्दों पर ना सिर्फ बात हुई बल्कि उनके हल के बारे में भी सहमति बनी।
१९४० में पेशावर में जन्में सतींदर लांबा की सीमा के दोनों ओर अच्छी खासी इज्जत हैऔर उनकी राय को पूरी तवज्जों के साथ सुना जाता हैऔर अमल में लाया जाता है। सतींदर सुलझे हुए इंसान हैंऔर दूर की सोचकर चलते हैं।
क्या एसएमकृष्णा सुलझे हुए इंसान नहीं है। जीके पिल्लई समझदार नहीं है। अगर हैं तो फिर क्यों कृष्णा को कहना प़डता है कि पिल्लई ने पाकिस्तान मामले में बयान देने का समय गलत चुना। क्यों विदेश मंत्रालय को गृहमंत्रालय की चिराेेरी करनी प़डती है कि वो बताए कि पी चिंदबरम पिछले दिनों पाकिस्तान में क्या बात करके आए हैंऔर क्यों वीजा देने का गृह मंत्रालय का काम विदेश मंत्रालय करता है। यही वे बातें हैं जो बताती हैं कि आखिर रायलसीमा पह़ाडी के दोनों छोर नार्थ ब्लॉक और साउथ ब्लॉक कैसे काम करते हैं। कहीं कोई तलमेल नहीं। तालमेल को तो खैर ठीक किया जा सकता है लेकिन पीएमओ का क्या करें। काबुल के लिए बीते छह महीनों में भारत ने कूटनीतिक स्तर पर दो ब़डी कुर्बानियां दी है। पहली मुंबई हमलों पर ड़ेढ साल तक बातचीत नहीं करने का स्टैंड लेने के बाद अचानक पाकिस्तान से बातचीत के लिए राजी हो जाना। और राजी भी इस तरह की पांंच महीनों के भीतर सचिव, गृहमंत्री और विदेश मंत्री स्तर तक की बातचीत कर लेना। और बदले में बेइज्जती सहना सो अलग। दूसरी कुर्बानी थी, जो मीडिया में नहीं आ सकी, अफगानिस्तान में ‘ग़ुड’ तालिबान के स्टैंड की। जनवरी के आखिरी में लंदन सम्मेलन में जब ‘गुड’ तालिबान का जिन्न निकलकर आया था तो दिल्ली ने इसका क़डा विरोध किया था। उसके इस विरोध में ईरान और रूस उसके साथ थे। लेकिन पिछले दिनों एसएमकृष्णा जब अमेरिका गए तो हिलेरी क्लिंटन के साथ संयुक्त प्रेस वार्ता में उन्होंने ‘गुुड’ तालिबान के ब्रितानी फलसफे को स्वीकार कर लिया। क्योंकि इसका कोई जवाब नहीं है। शर्मअलशेख का भी जवाब दिल्ली ने आज तक नहीं दिया।
और ऐसे में ख्वाब ये कि जैसे हम चाहे वैसा इस्लामाबाद करे। और काबुल में हमारी भी चौधराहट चले। ऐसे नहीं होता है। सुरक्षात्मक रहते हुए कभी कोई खेल नहीं जीता जाता है। दिल्ली वाकई अगर काबुल में और इस दक्षिण एशियाई क्षेत्र में अपनी हिस्सेदारी या यूं कह लीजिए प्रभुत्व के लिए गंभीर है तो इसके लिए उसे दूरगामी रणनीति बनाकर चलना होगा।
बिसात बिछ चुकी है। कौन, कब काबुल से जाएगा यह तय हो चुका है। काबुल की सत्ता में कौनकौन संभावित भागीदार होंगे इसकी कवायद जोरों पर चल रही है। काबुल को किस हाल में छ़ोडकर जाया जाए यह फिलहाल तय नहीं हुुआ है। इस पूरे घटनाक्रम का केंद्र पाक सेना का मुख्यालय रावलपिंडी है। सारी कवायद इसी के चारों ओर घूम रही हैं। दिसंबर २००९ से पहले तक तो रावलपिंडी जैसेतैसे तालिबानियों और वाशिंगटन से अपनी जान बचाने में लगा था। लेकिन जुलाई २०११ की तारीख की घोषणा के बाद से कमान उसके हाथ में आ गई।
पाक सेना प्रमुख जनरल परवेज कयानी ने अमेरिका को साफ जता दिया कि मदद चाहिए तो दिल्ली से कहे कि वो काबुल से दूर ही रहे। खैर जो हुआ वो ठीक ही हुआ। भारत को प्लान ‘ए’ को छ़ोड ‘बी’ की तैयारी करनी चाहिए। यह तय है कि प्लान ‘ए’ कभी सफल नहीं होगा। कयानी सोचते हैं कि दो साल बाद काबुल में उनकी ही चलेगी। तो उनको यहां यह याद होना चाहिए कि काबुल में १९९६ से २००१ तक तालिबानियों की सत्ता थी। उससे पहले रूसी सेना १९८९ से अफगानिस्तान से लौटने लगी थी। यानि १९८९ से २००१ तक पाक सेना कभी भी काबुल पर अपना परचम फहरा सकतीथी। लेकिन वो ऐसा कर ही नहीं पाई। (कभी कोई जंग जीती हो तो वह करे भी) और अफगानिस्तान के ३० फीसदी हिस्से नार्दन एलायंस पर तो तालिबानियों का भी जोर नहीं था।
हामिद करजई को कयानी फूटी आंख नहीं सुहाते। इसके बावजूद सत्ता में पाक सेेना के अलावा पाकिस्तानी तालिबानी हक्कानी समूह, अफगान तालिबानी क्वेटा शूरा भी प्रमुख भागीदारों में होंगे। उत्तरी वजीरिस्तान में नाटो सेनाआें के खिलाफ सक्रीय हक्कानी समूह के प्रमुख सिराजुद्दीन के छोटे भाई मोहम्मद हक्कानी को बीती फरवरी में मरवाकर कयानी ने हक्कानी समूह से तो नाराजगी मोल ले ही ली है। इसी तरह अफगान तालिबानी क्वेटा शूरा में मुल्ला उमर के बाद नंबर दो माने जाने वाले मुल्ला अब्दुल गनी बरादर को भी फरवरी में कराची से नाटो सेेनाआें के हाथों पक़डवाकर कयानी ने यहां भी आफत मोल ले ली है। इसलिए इस हालात में अंदाजा लगाया जा सकता है कि कयानी किस कंटीले ताज का सपना बुन रहे हैं। और तय हैै कि यह गठज़ोड ना लोकतंत्र की बैसाखी (जिसे ओबामा, करजई को देकर जाएंगे) पर टिकने वाला है और ना ही किसी और तंत्र पर। जिसकी जहां तक चलेगी वहीं का राजा होगा। यहां जिस राजा की बात हो रही है वहीं से भारत का प्लान ‘बी’ शुरू होता है। जिसकी तैयारी साउथ ब्लॉक को पीएमओ के साथ मिलकर अभी से कर देनी होगी।इस खेल में तीन महत्वपूर्ण चीजें हैं। पहला सामरिक, दूसरा आर्थिक और तीसरा कूटनीतिक। सामरिक पहलू में अफगानिस्तान की भौगोलिक और सामाजिक स्थिति। जो इसे हमेशा से अस्थिर बनाए हुए है। और इसी वजह से हर कोई इस पर शासन करने की सोचता है। यह तय मानकर चलिए की आने वाले कई दशकों तक अफगानिस्तान की मौजूदा स्थिति में कोई खास सुधार नहीं होने वाला है। अमेरिका भी इस बात को जानता है। और इसीलिए वह कह रहा है कि दुनिया में शांति के लिए इसके टुक़डे करना बेहतर होगा। अमेरिका इसके टुक़डे ना भी करे तब भी अफगानिस्तान टुक़डों में ही जीएगा और यहीं भारत के प्लान ‘बी’ की जरूरत आती है। इसके तहत अफगानिस्तान में जितने भी प्रभुत्व वाले समुदाय हैंं भारत को उनके सीधे संपर्क में रहनाहै। पश्तून, अफगानिस्तान की आबादी में करीब ४५ फीसदी की हिस्सेदारी रखते हैं। करजई भी इसी समुदाय से हैं। तो अफगान तालिबानी भी इसी समुदाय का प्रतिनिधित्व करते हैं। इसके अलावा दूसरे नंबर पर करीब ३० फीसदी ताजिक आते हैं। सोवियत संघ से अलग हुआ ताजिकिस्तान इन्हें अपने में समेटने में लगा हुआ है। (ग्रेटर तजाकिस्तान का ख्वाब) इसके बाद नौ से दस फीसदी के स्तर पर हजारों उज्बेक आदि आते हैं। बलूच और तुर्कमन भी ठीकठीक तादाद में है। भारत, करजई, कयानी और ओबामा पर जोर ना देकर इन समुदायों से रिश्ते मजबूत करने के ही नहीं बल्कि प्रग़़ाढ करने पर जोर दे। इसके अलावा अफगानिस्तान के उत्तर में इसके ३० फीसदी हिस्से पर कब्जा करने वाले नार्दन एलायंस से अपने रिश्ते और मजबूत करे। प्लान ‘बी’ में ईरान, तुर्कमेनिस्तान , उज्बेकिस्तान, तजाकिस्तान (तीनों शंघाई ६ समूह में हैं) से भी कूटनीतिक और आर्थिक रिश्ते मजबूत करने की योजना शामिल है। रूस को भी साथ में लिया जा सकता है।
