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लोकतंत्र के मंदिरों का अराजक माहौल

Swatantra Vaartha  Fri, 30 Jul 2010, IST

लोकतंत्र के मंदिरों का अराजक माहौल

संसद और राज्य विधायिकाआं के सदनों को संसदीय लोकतंत्र का मंदिर कहा जाता है। पिछले कुछ समय से देश में राज्य विधायिका रूपी इन मंदिरों में इसके सदस्यों (यानी पुजारियों) द्वारा जिस प्रकार का आचरण किया जा रहा है और इनकी जो तस्वीर देशदुनिया के सामने आ रही है, उसके बाद इनके बारे में हमारी क्या धारणा बननी चाहिए ? अगर इन मंदिरो में कभी देवता थे तो यही कहना होगा कि वे आज के पुजारियो के आचरण के कारण कूच कर चुके है। सोमनाथ चटर्जी जब तक लोकसभा अध्यक्ष रहे, पूरा देश न जाने कितनी बार सांसदों के अमर्यादित आचरण पर उनकी तीखी टिप्पणियां सुनता था। एक बार तो उन्होंने कह दिया कि हमारे सांसद लोकतंत्र को खोखला करने के लिए ओवरटाइम कर रहे हैं। विधानसभाओ में जो कुछ हो रहा है उन पर यह टिप्पणी चस्पा की जा सकती है। इस समय बिहार विधानसभा अपने कृत्यो के कारण सुर्खियों में है।

पहले १६ विधायक और बाद में ६७ विधायकों का कार्रवाई से निलंबन हो चुका है। यह पहली बार है जब विधानसभा के अंदर किसी सदस्य ने अध्यक्ष पर चप्पल फेंक दी, किंतु यह अकेला राज्य नहीं है जहां ऐसा हुआ। इसके पूर्व इस महीने के पूर्वार्ध में हम कर्नाटक विधानसभा में सदस्यों के बीच गुत्थमगुत्थी देख चुके हैं। जनता दल सेक्यूलर एवं कांग्रेस के सदस्यो द्वारा कथित अवैध खनन पर लगातार आक्रामक रुख अपनाने का कुछ सत्ताऱुढ भाजपा विधायकों ने विरोध किया और मामला बिग़ड गया। १३ जुलाई को तो जदसेक्यूलर के कुछ सदस्य पीले रंग का वह हेल्मेट पहनकर सदन में आए, जिसे इंडस्ट्रियल सेफ्टी हेल्मेट कहते हैं।

उन्होंने विधानसभा के अध्यक्ष से बुलेटप्रूफजैकेट की मांग की। नियमो का हवाला देकर अध्यक्ष को हेल्मेट हटाने का आदेश देना प़डा। उनकी टिप्पणी थी कि हम सदन के अंदर कार्रवाई कर रहे हैं, गलियों में नहीं, लेकिन क्या पिछले कुछ महीनों से अनेक राज्य विधायिकाओं के अंदर जो दृश्य दिखा है, वे गलियों के संघर्ष से अलग प्रभाव पैदा कर रहे हैं ? समुद्र किनारे गोवा से लेकर, पूर्वाेेत्तर सीमा के त्रिपुरा, उ़डीसा, आंध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, कश्मीर, केरल, महाराष्ट्र तक पूरे देश की सूची बनाते जाइए, आप देखेंगे कि एक दो राज्य ही ऐसे मिलेंगे जहां इन मंदिरो को नेताआंे यानी पुजारियों ने अपने आचरण से अपवित्र नहीं किया है। इनको मत देकर विजय दिलाने वाली राज्यों की जनता स्वयं को शर्मसार महसूस कर रही है।

अक्टूबर १९९७ में वह दृश्य पूरे देश के लिए अंदर से हिला देने वाला था जब उत्तर प्रदेश विधानसभा में विधायकों ने मेज पर लगी माईक उख़ाडकर एक दूसरे पर फेंकना आरंभ कर दिया। जिसके कारण कई घायल हो गए। विधानसभाआें में अर्मादित हिंसा का यह रोग धीरेधीरे छूत के रोग की तरह पूरे देश में फैल चुका है। इन दिनों बिहार विधानसभा एवं विधान परिषद दोनों इसके खुले मैदान बने रहेहैं। विपक्ष एवं सत्ता पक्ष दोनों में जिसके हाथ जो चीजें आती थी वही अपने विरोधियों पर फेंक रहे थे। यहां तक कि रिपोर्टर की टेबल तक किसी ने उठा मारी। निस्संदेह, ये दृश्य हमारी लोकतांत्रिक प्रणाली एवं राजनीतिक प्रतिष्ठान से शतप्रतिशत जुगुप्सा पैदा करने वाले हैं । संसद या राज्य विधायिकाआंे की भूमिका बहस की है आपसी बहस द्वारा किसी निष्कर्ष पर पहुंचना तथा जनता के हित में कानून बनाना, निर्णय करना। प्रदेश की जनता की नियति तय करने वाले, जनता के प्रतिनिधियों से न्यूनतम अपेक्षा संयमित और मर्यादित आचरण की है। ऐसी कोई समस्या, घटना, रहस्योद्धाटन, आरोप, नहीं है जिन पर शांतिपूर्वक बहस नहीं हो सकती है। आखिर बिहार में नियंत्रक एवंमहालेखा परीक्षक ने अपनी रिपोर्ट में ११४१२५४ कऱोड रुपये की निकासी के एवज में खर्च का ब्योरा एवं रसीद नहीं होने का प्रश्न उठाया है। यह भी २००२०३ से २००६०७ के बीच का मामला है। यानी इसमें लालू राब़डी सरकार एवं राष्ट्रपति शासन की अवधि ज्यादा है। फिर उच्च न्यायालय ने एक फैसला दिया और सरकार भी इसके जवाब में उच्च न्यायालय गई है। इस स्थिति पर दोनो पक्ष बहस कर सकते थे। विपक्ष को सदन से बहिर्गमन का भी अधिकार है। इसके बाद की भूमिका राजनीतिक होती है जिसके लिए पूरे राज्य का मैदान प़डा है। किंतु नेतागण सदन को ही बाहर का मैदान बनाने पर उतारू हैं। जिनजिन राज्यों में हम ऐसे शर्मनाक दृश्य या उग्र हंगामा देख रहे है, उनमें ज्यादातर में सरकार के किसी सदस्य या सदस्यों पर भ्रष्टाचार का आरोप है। कर्नाटक, आंध्र, उ़डीसा, त्रिपुरा में मंत्रियों पर भ्रष्टाचार के आरोप है और विपक्ष बगैर उनके इस्तीफे के मानने को ही तैयार नहीं है। सरकार इसे स्वीकार नहीं कर रही। इस तरह सीधा टकराव दिखता है। केन्द्र में संसद एवं राज्य में विधायिकाएं संसदीय लोकतंत्र की सर्वोच्च महिमामंडित संस्था है। इनकी महिमा एवं पवित्रता इनके सदस्यों के आचरण पर ही निर्भर है। धीरेधीरे संसद की महिमा एवं पवित्रता भी सदस्यों के आपसी आचरण के कारण लुंठित हुई है, किंतु राज्य विधायिकाएं तो मानो इन्हें पूर्णतया धाराशायी करने पर उतारू हैं। विपक्ष का तर्क होता है कि जब सरकार बात सुनती ही नहीं तो चारा क्या रह जाता है ? पहली नजर में यह सही भी लगता है कि मर्यादित तरीके से बात रखने का सांन नहीं लिया जाएगा तो फिर हंगामे का ही विकल्प बचता है। किंतु जनता द्वारा निर्वाचन के बाद आप माननीय सदस्य के रूप में महिमामंडित हो चुके हैं और आपको अपना आचरण किसी महिमामंडित मंदिर के महान पुजारी की तरह रखना चाहिए। बहस के लिए केवल अपने पद की गरिमा का भान और उसके अनुरूप मानसिक संतुलन एवं धैर्य बनाए रखने की आवश्यकता है। यह कहना गलत होगा कि सारे माननीय मानसिक संतुलन बनाए नहीं रखते या आपा खो जाते है, किंतु विधानसभा या विधान परिषद के यदि बहुसंख्य सदस्य सदन के अंदर आमनेसामने मोर्चेबंदी कर ले, एकदूसरे के लिए अपशब्दों का प्रयोग करें, मारपीट करने लगे तो कोई क्या निष्कर्ष निकालेगा ? सदन के अध्यक्ष पद की गरिमा है। यद्यपि अध्यक्ष भी सदन के ही सदस्य होते है, पर संविधान ने उनका पद निष्पक्ष अभिभावक सदृश बना दिया है, जिसके लिए दोनों पक्ष बराबर है, किंतु इस समय विधानसभाओं में अध्यक्षों के फैसले को विपक्ष मानने को ही तैयार नहीं, बल्कि कई राज्यो में उनके लिए अपमानजनक शब्दों का प्रयोग किया गया है।

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