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एचआईवी और चेचक का अंतर्संबंध

Swatantra Vaartha  Fri, 30 Jul 2010, IST

एचआईवी और चेचक का अंतर्संबंध

भारत में सन्‌ १९७५ में चेचक के खिलाफ ऑपरेशन ‘चेचक रहित भारत’ या ‘स्माल पाक्स जीरो’ के प्रारंभ होते ही संयुक्त राष्ट्र संघ के एक अधिकारी ने कहा कि यदि भारत से चेचक को समाप्त कर दिया गया तो वे ‘जीप का टायर खा लेंगे।’ कहते हैं चेचक की समाप्ति के पश्चात इस कार्यक्रम के निर्देशक डीएहेंडरसन ने उन्हें जीप का एक टायर भेजा था। ९ दिसंबर १९७९ को यह प्रमाणित कर दिया गया था कि विश्वभर में चेचक का समूल नाश हो गया है। परंतु आधुनिक औषधि विज्ञान द्वारा प्रदत्त यह पहली राहत बहुत कम समय दिलासा दे पाई। टीकाकरण अभियान के विशेषज्ञों को इस बात का भान नहीं था कि अफ्रीका के जंगलों में एक अन्य वायरस ‘चेचक’ के जाने का इंतजार कर रहा है। जल्दी ही इस वायरस का तेजी से संक्रमण फैलाने का लंबा इंतजार समाप्त हुआ और यह १९८० के दशक में एचआईवी के रूप में सामने आया और अभी तक लोगों को अपना शिकार बना रहा है।

जार्ज मेसन विश्वविद्यालय के बायो सुरक्षा कार्यक्रम के रेमंड वेनस्टेन का सवाल है कि ‘कल्पना कीजिए कि १९३० के दशक में पश्चिमी अफ्रीका के छोटे से क्षेत्र में पहली बार एड्‌स का वायरस उत्पन्न हुआ। यह भी सोचिए की १५ वर्ष की अल्प अवधि में यौन संबंधों से फैलने वाली एक बीमारी, वायु के माध्यम से फैलने वाली के मुकाबले इतनी तीव्रता से कैसे फैल जाती है ? यह विचारणीय है कि १९७० के दशक के बाद एकाएक ऐसा क्या हो गया ?’

चेचक के नाश और इसके एड्‌स के कीटाणुआें से मिलकर तेजी से फैलने के समयकाल पर वेनस्टेन का ध्यान अवश्य आकृष्ट हुआ। यह भी सच है कि अनेक सामाजिकआर्थिक पहलू जैसे असुरक्षित यौन संबंध एवं नशीली दवाएं इसके लिए जिम्मेदार हैं, लेकिन वेनस्टेन की टीम सीसीआर नामक उस प्रोटीन की अनदेखी नहीं कर पाई जो कि दोनों वायरस में अनिवार्य रूप से पाया जाता है।

इस विषय पर अध्ययन कर रहे दल के सदस्य एवं केलिफोर्निया विश्व विद्यालय में आनुवांशिकी विभाग के माइकल वेनस्टेन का कहना है कि ‘सीसीआर५ एवं सीएक्ससीआर४ कोशिका ही सतह पर विद्यमान दो ग्राही हैं, जो कि प्रतिरोधी कोशिकाआें को संक्रमित स्थान पर ले जाने में मददगार होते हैं। एचआईवी अपने जीवनचक्र के एक भाग के रूप में इनका इस्तेमाल कोशिकाआें पर आक्रमण करने हेतु करता है। एक अन्य अध्ययन साझीदार एवं अमेरिका के जार्ज वाशिंगटन विश्वविद्यालय के सूक्ष्म जीवविज्ञान, प्रतिरक्षक तंत्र शास्त्र एवं लाक्षणिक औषधि विज्ञान विभाग के उपाध्यक्ष माइकल बकरिंसी का कहना है कि कुछ यूरोपीय व्यक्तियों ने सीसीआर५ कोशिकाआें में परिवर्तन किया जिससे वे एचआईवी प्रतिरोधी बन गई। पूर्व में किए गए शोध में भी यह दर्शाया गया था कि चेचक वायरस भी संक्रमण फैलाने के लिए उसी मार्ग का इस्तेमाल करते है जिसका कि एचआईवी वायरस करता है। यदि चेचक किसी व्यक्ति की असंक्राम्य कोशिकाआें को व्यस्त रख सकता है, तो वह व्यक्ति एचआईवी प्रतिरोधी भी बना रह सकता/सकती है। इस सिद्धांत के प्रतिपादन हेतु नौसेना में कार्यरत १९ से ४१ वर्ष के मध्य के २० युवकों को चयन किया गया। उन २० में १० को चेचक का टीका लगाया गया था। उनकी सफेद रक्त कोशिकाआें के नमूने लिए गए और उन्हें एचआईवी से संक्रमित किया गया। जिन कोशिकाआें में चेचक टीके को ग्रहण किया था उनें रोगवाहक संक्रमण में काफी कमी आई। बीएमसी इम्युनोलाजी के १८ मई के संस्करण में लिखा है कि जब इनमें अतिरिक्त सीरम डाला गया तो इसके परिणामस्वरूप केवल बिना टीकाकरण वाले जीवाणु समूह में ही एचआईवी में वृद्धि हुई।

इस प्रश्न के जवाब में कि अध्ययन उन एचआईवी संक्रमित व्यक्तियों के संबंध में क्या स्पष्टीकरण देता है, जिन्हें चेचक का टीका लगाया गया था ? इस पर बकरिसी का कहना है ‘टीकाकरण के बाद इसमें अंशतः गिरावट आई है। हमारे मामले में टीके द्वारा स्वाभाविक रूप से दी गई प्रतिरक्षा से बचाव तो हुआ, परंतु कम समय के लिए। परंतु एक वर्ष पश्चात इससे प्राप्त होने वाला बचाव रोमांचित कर सकता है। अमेरीका के नेशनल इंस्ट्‌िटयूट ऑफ एलर्जी एवं इन्फेक्टिशयस डिसीज की गीता बंसल का कहना है ‘एचआईवी के प्रतिरोधक के रूप में विभिन्न रोगवाहकों का इस्तेमाल ध्यान देने योग्य है।’ वैसे विषाक्त विज्ञानी टी जेकबजान की सोच है कि शोध ने जो संबंध स्थापित किए है वह महज अटकलबाजी है। वहीं क्रिश्चियन मेडिकल कॉलेज के चिकित्सकों का कहना है कि ‘कल्पना कीजिए की चेचक का टीका १९८० के दशक एवं उसके बाद भी प्रयोग में आता रहता तो कुछ मामलों में इसके ‘साइड इफेक्ट’ जीवन के लिए खतरनाक सिद्ध होते। हम खुशकिस्मत हैं कि एचआईवी संक्रमण चेचक के समाप्त हो जाने के बाद प्रकाश में आया।’ हंडरसन इससे सहमति जताते हुए कहते हैं कि ‘मेरे विचार से यह रोचक आकलन है। लेकिन अभी इसमें इतना दम नहीं है कि इसे प्रयोग में लाया जा सके।’

सुस्मिता डे

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