डाकटरों के लिए जरुरी समहिता
भारतीय चिकिसा परिषद की ओर से चिकिसकीय पेशेवरों के लिए जारी नइ आचार सहिता का वागत है । इसका ठीक से पालन करना पेशे के लिए गारव की बात ह आर मरीजों के लिए राहत की। दरअसल, डाटरों के लिए दवा के असर पर हए निजी अययन में हिसा लेना या किसी खास दवा बाड की सिफारिश करना या फिर कपनी से किसी तरह की सहलियतें वीकार करनाजितनी जदी हो सके, अतीत की बात बन जाएयह चिकिसा सेवा के हित में है।
पिछले कइ महीने से पेशे में आइ विसगतियों को खम करने का यास चल रहा था। इस सिलसिले में इडियन मेडिकल काउसिल ‘ाेफेशनल कडट, एटिकेट ऐड एथिस रेगुलेशन, २००२ में सशोधन की जरत भी शित से महसूस कर रही थी। रेगुलेशन में सशोधन डाटरों की नतिकता के लिहाज से अपरिहाय हो गया था। यह अपरिहायता डाटरों ारा अपनी पेशेगत लापरवाही के कारण नहीं, बकि उनके आसपास फामायूटिकल कपनियों ारा रचे गए जाल के मामले में यादा था। कपनिया उन डाटरों को आज महगे से महगे तोहफे देने से गुरेज नहीं करतीं, जो उनकी मनाफिक दवाइया लिखते ह। कपनियों के कइ उपाद तो गुणवाा से कहीं अधिक डाटरों की कलम पर चलने लायक होते है।
नइ आचार सहिता आने के बाद डाटरों को खुद ब खुद कपनी आर उसके मेडिकल रिजेंटेटिव से दूरी बनाकर रखनी चाहिए। यह पूरी चिकिसा सेवा के हित में ह कि वे अछी आर सती दवाए लिखें। म समझता ह कि चिकिसकों के लिए नतिक नियम होने चाहिए, योंकि यह लाभ से अधिक सेवा आधारित क्षे है। लेकिन आचार सहिता बना देना ही काफी नहीं ह। इस तरह के मामलों पर कडी नजर रखी जानी चाहिए आर दवा कपनियों के सदभ में भी कुछ खास ावधान बनने चाहिए, जिससे वे लोभन आधारित यवथा न बना सकें।
नए ावधान लागू होने के बाद मेडिकल रिसच टडी आदि बाधित न हो, इसका भी हमें याल रखना होगा। हालाकि भारतीय चिकिसा परिषद ने मायता ा सथाआें से नियमो के मुताबिक, फडिंग लिये जाने के ावधान की बात की ह आर समक्ष अधिकारी से इजाजत लिये जाने के बाद किसी भी मेडिकल टिशनर के लिए फामा कपनी आर सहयोगी हेथकेयर इडटी से रिसच करने का भी ावधान खुला रखकर चिकिसा सेवा बाधित न हो, इसका भी याल रखा ह, लेकिन फामा या हेथकेयर इडटी के साथ डाटरों को यह यान रखना होगा कि इससे उनकी पेशेवर आजादी या मेडिकल पेशे की वतता या उन पर किसी तरह की आच न आने पाये।
हमें समझना होगा कि चिकिसकों से समाज को काफी आशाए ह। वाय क्षे को लेकर सरकार की लापरवाही आर कारपोरेट अपतालों की फलती सकति के बीच मरीजों, खासकर गरीब मरीजों को डाटरों से काफी उमीदें है। डाटरों इन उमीद पर खरे उतरते भी ह, लेकिन उनका दामन पूरी तरह साफ होइसके लिए दवा कपनियों के बढते दबदबे के बीच उहें अपनी नतिकता पर आए सकट से आर मजबूती से निपटना होगा। इधर, सरकार गामीण क्षेाें में डाटरों की पया यवथा के लिए नइ नीति बनाने की ओर चल पडी है। उमीद है कि अगर वह गावों में समुचित माहाल बनाए तो कोइ कारण नहीं कि डाटर वहा न जाना चाहें। वे कही भी कायरत हों, अगर वे सही मायनों में अपनी सेवा की क करना जानते ह, तो गावों में जाकर मरीजों की सेवा भी करना उसका धम ह। हालाकि समाज में हो रहे परिवतन से वे भी अछूते नहीं ह, लेकिन फिर भी म मानता ह कि इस पेशे में सामाजिक गिरावट का असर अब भी सबसे कम है।
डा धम काश
