हरये बेलगाम यूरोकेटस
हिरयाणा में डीआइजी पद पर रहते हए एसपीएस राठार एक उभरती हइ टेनिस खिलाडी चिका के साथ छेडछाड करते ह। राजथान में एक आर डीआइजी मधुकर टडन एक महिला के साथ बलाकार का आरोपी ह आर पिछले १३ बरसों से फरार ह। कुछ साल पहले उडीसा में होमगाडस के तकालीन पुलिस महानिदेशक बाि भूषण मोहती के साहबजादे एक जमन महिला के साथ बलाकार करते ह आर बाद में अपने बेटे को बचाने के लिए मोहती अपनी पूरी दम लगा देते ।
इडियन एसेस की पकार शिवानी भटनागर की हया के मामले में एक आइपीएस अधिकारी रविकात शमा सजा काट रहे । ये जनाब भी बहत दिनों तक अपने तबे का इतेमाल कर खुद को बचाने की कोशिश करते रहे। बात सिफ छेडछाड, बलाकार आर हया के मामलों तक ही सीमित नही, उार देश के एक कबिनेट सचिव आर उनके भाइ पर एक दलित की करोडों पये की जमीन हडपने का मामला भी सामने आया ह। भारतीय शासनिक सेवा आर भारतीय पुलिस सेवा से जुडे ऐसे अफसरो की लबी चाडी फेहरित ह, जो खुद को कानून से बडा समझते ह। आजादी के इतने बरसों के बाद भी ऐसा यों ह कि एक आम आदमी को पुलिस थाने में शिकायत दज कराने से पहले सा बार सोचना पडता ह ?
सवाल ये उठता ह कि यों बेलगाम होते जा रहे ह ये यूरोकेटस ? दरअसल, अगेजों ने ऊचे ओहदे पर बठे नाकरशाहों को जरत से यादा अधिकार दिए हए थे, योंकि इन पदों पर या तो वो खुद बठे हए थे या फिर उनकी चापलूसी करने वाला कोइ दूसरा शस। इन नाकरशाहों के जरिए अगेजों की तानाशाही चलती थी आर इनका शिकार होते था आम भारतीय। अगेज तो चले गए, लेकिन उनका बनाया गया नाकरशाहों का ढाचा अब भी देश पर राज कर रहा ह। हालाकि नाकरशाहों की फाज में चद बेहतर लोग भी ह, जो इमानदारी से अपनी जिमेदारियों को बखूबी निभा रहे ह, लेकिन असर ऐसे लोगों को इमानदारी का इनाम नहीं, बकि उसकी सजा भुगतनी पडती ह। किरण बेदी जसी महिला अधिकारी को वरिता के बाद भी दीि पुलिस का कमिनर नहीं बनाया जाता, योंकि लोगों को भय रहता ह कि कहीं इमानदारी के चर में उनकी अपनी खटिया ही न खडी हो जाए। बात सिफ किरण बेदी की ही नहीं, देश में ऐसे तमाम काबिल आर इमानदार आइएएस आर आइपीएस अफसर ह, जिहे अहम जिमेदारिया देने के बजाय हाशिए पर डाल दिया जाता ह, योंकि ऐसे अफसर बडे राजनेताआें की नाक में दम कर देते ह या फिर उनकी अनुचित मागों के आगे घुटने टेकने से इनकार कर देते ह। माजूदा समय में उहीं अफसरों की पूछ ह, जो राजनेताआें के साथ कदमताल करते नजर आए। चिका के साथ छेडछाड के मामले में खुद हरियाणा के पूव गह सचिव जेके दुगल का मानना ह कि राजनीतिक हतक्षेप की वजह से ही इस मामले में एसपीएस राठार के खिलाफ कडे कदम नहीं उठाए गए। भारतीय आडिट एड अकाउट सविसेज की पूव अधिकारी नू घोष का आय से अधिक सपा के मामले में अदालत उहें दोषी ठहरा चुकी ह। इस अधिकारी के तकालीन दूरसचार मी सुखराम से नजदीकी किसी से छिपी नहीं थी। आजादी के कुछ समय बाद तक हालात इतने बुरे नहीं थे, लेकिन इन दिनों चोरचोर मासेरे भाइ की कहावत नाकरशाहों आर राजनेताआें पर बिकुल सटीक बठ रही ह। राजनीतिक वरदहत की वजह से पुलिस विभाग से लेकर दूसरे शासनिक विभागों में अनुशासन खम होता जा रहा ह, योंकि अदने से अफसर की भी पहच अगर मी तक ह, तो उसका वरि अधिकारी चाहकर भी उसका कुछ नहीं कर सकेगा। दरअसल, इन दिनों राजनेताआें आर नाकरशाहों के बीच एक खास तरह का गठजोड बनता जा रहा ह आर इनकी आपसी साठगाठ की वजह से ही नाकरशाह बेलगाम होते जा रहे ह।
तो या माना जाए कि देश में अगेजों के समय से चले आ रहे नाकरशाही के माजूदा ढाचे को अब बदलने का व आ गया ह ? या शासनिक सुधार को सही मायनों में लागू करने की जरत ह, ताकि नाकरशाह अपनी जिमेदारियों को सही ढग से निभा सकें ? या इस बात पर अब सती नहीं बरतनी चाहिए कि नाकरशाह नाकरी की शुआत में आर हर पाच साल में अपनी सपा का खुलासा करे ? नाकरशाह आर राजनीति का गठजोड भाचार के फलनेफूलने देने के लिए नहीं विकास के काम को रतार देने के लिए होना चाहिए आर ऐसा तभी हो सकता ह, जब नाकरशाहों की जवाबदेही सही तरीके से तय हो। नियमों की अनदेखी या लापरवाही होने पर जब तक नाकरशाहों पर सती नहीं होगी, तब तक हालात नहीं सुधरने वाले आर ऐसी थिति में कोइ भी अफसर अपने मी की अनुचित माग की सिरे से खारिज कर देगा। देशों में विजिलेंस विभाग के पास अब भी आइएएस आर आइपीएस अफसरों के खिलाफ तमाम मामले ह, लेकिन सियासी पहच की वजह से कइ अधिकारियों के खिलाफ मामले दज ही नहीं हो पा रहे । उार देश के विजिलेंस विभाग की ही बात करें तो राजनीतिक हतक्षेप की वजह से साठ से यादा अफसरों के खिलाफ रपटें दज करने में विभाग को दितों का सामना करना पड रहा ह, जबकि उन अफसरों के खिलाफ कारवाइ की मजूरी मिल चुकी, जिनसे साा पक्ष किसी खास वजह को लेकर नाराज हो। बात केवल उार देश की नहीं, देश के दूसरे रायों में भी कमोबेश यही हालात नजर आते ह।
जनता के हाथ में सूचना का अधिकार तो थमा दिया गया ह, लेकिन अपनी गदन बचाने के चर में नाकरशाह इसको लेकर यादा उसाह में नहीं रहते। आज जरत इस बात की ह कि सूचना के अधिकार जसे कानून का इतेमाल करने में आम आदमी को किसी तरह की मुकिल नहीं आए, ताकि नाकरशाहों की मनमानी पर रोक लग सके। इन सबके बावजूद जब तक शासनिक यवथा को पूरी तरह राजनीति दखलदाजी से मु नहीं किया जाएगा, तब तक हालात बेहतर होने की उमीद नहीं की जा सकती ह। अब व आ गया ह कि शासनिक सुधारों को कचरे की टोकरी में डालने के बजाय उसे सही ढग से लागू किया जाए, ताकि फिर कोइ राठार, टडन या कोइ दूसरा अफसर कानून को अपनी जागीर न समझे। (लेखक टीवी पकार ह)ियाणा में डीआइजी पद पर रहते हए एसपीएस राठार एक उभरती हइ टेनिस खिलाडी चिका के साथ छेडछाड करते ह। राजथान में एक आर डीआइजी मधुकर टडन एक महिला के साथ बलाकार का आरोपी ह आर पिछले १३ बरसों से फरार ह। कुछ साल पहले उडीसा में होमगाडस के तकालीन पुलिस महानिदेशक बाि भूषण मोहती के साहबजादे एक जमन महिला के साथ बलाकार करते ह आर बाद में अपने बेटे को बचाने के लिए मोहती अपनी पूरी दम लगा देते ह। इडियन एसेस की पकार शिवानी भटनागर की हया के मामले में एक आइपीएस अधिकारी रविकात शमा सजा काट रहे ह। ये जनाब भी बहत दिनों तक अपने तबे का इतेमाल कर खुद को बचाने की कोशिश करते रहे। बात सिफ छेडछाड, बलाकार आर हया के मामलों तक ही सीमित नही, उार देश के एक कबिनेट सचिव आर उनके भाइ पर एक दलित की करोडों पये की जमीन हडपने का मामला भी सामने आया ह। भारतीय शासनिक सेवा आर भारतीय पुलिस सेवा से जुडे ऐसे अफसरो की लबी चाडी फेहरित ह, जो खुद को कानून से बडा समझते ह। आजादी के इतने बरसों के बाद भी ऐसा यों ह कि एक आम आदमी को पुलिस थाने में शिकायत दज कराने से पहले सा बार सोचना पडता ह ?
सवाल ये उठता ह कि यों बेलगाम होते जा रहे ह ये यूरोकेटस ? दरअसल, अगेजों ने ऊचे ओहदे पर बठे नाकरशाहों को जरत से यादा अधिकार दिए हए थे, योंकि इन पदों पर या तो वो खुद बठे हए थे या फिर उनकी चापलूसी करने वाला कोइ दूसरा शस। इन नाकरशाहों के जरिए अगेजों की तानाशाही चलती थी आर इनका शिकार होते था आम भारतीय। अगेज तो चले गए, लेकिन उनका बनाया गया नाकरशाहों का ढाचा अब भी देश पर राज कर रहा ह। हालाकि नाकरशाहों की फाज में चद बेहतर लोग भी ह, जो इमानदारी से अपनी जिमेदारियों को बखूबी निभा रहे ह, लेकिन असर ऐसे लोगों को इमानदारी का इनाम नहीं, बकि उसकी सजा भुगतनी पडती ह। किरण बेदी जसी महिला अधिकारी को वरिता के बाद भी दीि पुलिस का कमिनर नहीं बनाया जाता, योंकि लोगों को भय रहता ह कि कहीं इमानदारी के चर में उनकी अपनी खटिया ही न खडी हो जाए। बात सिफ किरण बेदी की ही नहीं, देश में ऐसे तमाम काबिल आर इमानदार आइएएस आर आइपीएस अफसर ह, जिहे अहम जिमेदारिया देने के बजाय हाशिए पर डाल दिया जाता ह, योंकि ऐसे अफसर बडे राजनेताआें की नाक में दम कर देते ह या फिर उनकी अनुचित मागों के आगे घुटने टेकने से इनकार कर देते ह। माजूदा समय में उहीं अफसरों की पूछ ह, जो राजनेताआें के साथ कदमताल करते नजर आए। चिका के साथ छेडछाड के मामले में खुद हरियाणा के पूव गह सचिव जेके दुगल का मानना ह कि राजनीतिक हतक्षेप की वजह से ही इस मामले में एसपीएस राठार के खिलाफ कडे कदम नहीं उठाए गए। भारतीय आडिट एड अकाउट सविसेज की पूव अधिकारी नू घोष का आय से अधिक सपा के मामले में अदालत उहें दोषी ठहरा चुकी ह। इस अधिकारी के तकालीन दूरसचार मी सुखराम से नजदीकी किसी से छिपी नहीं थी। आजादी के कुछ समय बाद तक हालात इतने बुरे नहीं थे, लेकिन इन दिनों चोरचोर मासेरे भाइ की कहावत नाकरशाहों आर राजनेताआें पर बिकुल सटीक बठ रही ह। राजनीतिक वरदहत की वजह से पुलिस विभाग से लेकर दूसरे शासनिक विभागों में अनुशासन खम होता जा रहा ह, योंकि अदने से अफसर की भी पहच अगर मी तक ह, तो उसका वरि अधिकारी चाहकर भी उसका कुछ नहीं कर सकेगा। दरअसल, इन दिनों राजनेताआें आर नाकरशाहों के बीच एक खास तरह का गठजोड बनता जा रहा ह आर इनकी आपसी साठगाठ की वजह से ही नाकरशाह बेलगाम होते जा रहे ह। तो या माना जाए कि देश में अगेजों के समय से चले आ रहे नाकरशाही के माजूदा ढाचे को अब बदलने का व आ गया ह ? या शासनिक सुधार को सही मायनों में लागू करने की जरत ह, ताकि नाकरशाह अपनी जिमेदारियों को सही ढग से निभा सकें ? या इस बात पर अब सती नहीं बरतनी चाहिए कि नाकरशाह नाकरी की शुआत में आर हर पाच साल में अपनी सपा का खुलासा करे ? नाकरशाह आर राजनीति का गठजोड भाचार के फलनेफूलने देने के लिए नहीं विकास के काम को रतार देने के लिए होना चाहिए आर ऐसा तभी हो सकता ह, जब नाकरशाहों की जवाबदेही सही तरीके से तय हो। नियमों की अनदेखी या लापरवाही होने पर जब तक नाकरशाहों पर सती नहीं होगी, तब तक हालात नहीं सुधरने वाले आर ऐसी थिति में कोइ भी अफसर अपने मी की अनुचित माग की सिरे से खारिज कर देगा। देशों में विजिलेंस विभाग के पास अब भी आइएएस आर आइपीएस अफसरों के खिलाफ तमाम मामले ह, लेकिन सियासी पहच की वजह से कइ अधिकारियों के खिलाफ मामले दज ही नहीं हो पा रहे । उार देश के विजिलेंस विभाग की ही बात करें तो राजनीतिक हतक्षेप की वजह से साठ से यादा अफसरों के खिलाफ रपटें दज करने में विभाग को दितों का सामना करना पड रहा ह, जबकि उन अफसरों के खिलाफ कारवाइ की मजूरी मिल चुकी, जिनसे साा पक्ष किसी खास वजह को लेकर नाराज हो। बात केवल उार देश की नहीं, देश के दूसरे रायों में भी कमोबेश यही हालात नजर आते ह।
जनता के हाथ में सूचना का अधिकार तो थमा दिया गया ह, लेकिन अपनी गदन बचाने के चर में नाकरशाह इसको लेकर यादा उसाह में नहीं रहते। आज जरत इस बात की ह कि सूचना के अधिकार जसे कानून का इतेमाल करने में आम आदमी को किसी तरह की मुकिल नहीं आए, ताकि नाकरशाहों की मनमानी पर रोक लग सके। इन सबके बावजूद जब तक शासनिक यवथा को पूरी तरह राजनीति दखलदाजी से मु नहीं किया जाएगा, तब तक हालात बेहतर होने की उमीद नहीं की जा सकती ह। अब व आ गया ह कि शासनिक सुधारों को कचरे की टोकरी में डालने के बजाय उसे सही ढग से लागू किया जाए, ताकि फिर कोइ राठार, टडन या कोइ दूसरा अफसर कानून को अपनी जागीर न समझे। (लेखक टीवी पकार ह)
